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Showing posts from August, 2018

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( परशुराम-अवतार ) भाग 6

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श्री परशुरामवतार-

( वाल्मीकि रामायण के अनुसार ) साक्षात ब्रह्माजी के पुत्र राजा कुश के चार पुत्रों में से कुश-नाभ दूसरे पुत्र थे । राजा कुश-नाभ ने अपने पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया जिसके फलस्वरुप गाधि नामक परम धर्मात्मा पुत्र हुआ । राजा गाधि के एक कन्या सत्यवती नाम की थी जो महर्षि ऋचीक को ब्याही गयी थी । एक बार सत्यवती और सत्यवती की माता ने ऋचीकजी के पास पुत्र कामना से जाकर, पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की । ऋचीकजी ने दो चरु सत्यवती को दिये और बता दिया कि यह तुम्हारे लिए है और यह तुम्हारी माँ के लिए है इनका तुम यथोचित उपयोग करना । यह कहकर वे स्नान को चले गये । उपयोग करने के समय माता ने कहा- बेटी ! सभी लोग अपने ही लिए सबसे अधिक गुणवान पुत्र चाहते हैं, अपनी पत्नी के भाई के गुणों में किसी की विशेष रूचि नहीं होती । अतः तू अपना चरू मुझे दे दे और मेरा तू ले ले क्योंकि मेरे पुत्र को तो सम्पूर्ण भूमण्डल का पालन करना होगा और ब्राह्मण कुमारों को तो बल, वीर्य तथा सम्पति आदि से लेना-देना ही क्या है ? ऐसा कहने पर सत्यवती ने अपना चरु माता को दे दिया । जब ऋषि को यह बात ज्ञात हुई तब …

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( वामन-अवतार ) भाग 5

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श्री वामनावतार की कथा-

भगवान की कृपा से ही देवताओं की विजय हुई । स्वर्ग के सिंहासन पर इंद्र का अभिषेक हुआ । परन्तु अपनी विजय के गर्व में देवता लोग भगवान को भूल गये विषय परायण हो गये । उधर हारे हुए दैत्य बड़ी सावधानी से अपना बल बढ़ाने लगे । वे गुरु शुक्राचार्यजी के साथ साथ समस्त भृगुवंशी ब्राह्मणों की सेवा करने लगे, जिससे प्रभावशाली भृगुवंशी अत्यंत प्रसन्न हुए और दैत्यराज बलि से उन्होंने विश्वजीत यज्ञ कराया । ब्राह्मणों की कृपा से यज्ञ में स्वयं अग्निदेव ने प्रगट होकर रथ घोड़े आदि दिये और अपना आशीर्वाद दिया । शुक्राचार्यजी ने एक दिव्य शंख और प्रह्लादजी ने एक दिव्य माला दी । इस तरह सुसज्जित हो सेना सहित उन्होंने जाकर अमरावती को घेर लिया । देवगुरु बृहस्पति के आदेशानुसार देवताओं सहित इंद्र ने स्वर्ग को छोड़ दिया और कहीं जा छिपे । विश्व-विजयी हो जाने पर भृगुवंशीयों ने बलि से सौ अश्वमेघ यज्ञ कराये । इस तरह प्राप्त समृद्ध राज्य-लक्ष्मी का उपभोग वे बड़ी उदारता से करने लगे । 
अपने पुत्रों का ऐश्वर्य राज्यादि छिन जाने से माता अदिति बहुत दुःखी हुई अपने पति कश्यपजी के उपदेश से उन्होंने पयोव्रत कि…

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( नृसिंह-अवतार ) भाग 4

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श्री नृसिंह-अवतार
जब वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष का वध कर डाला था उसकी माता दिति, उसकी पत्नी भानुमति, उसका भाई हिरण्यकशिपु और समस्त परिवार बड़ा दुःखी था । दैत्येन्द्र  हिरण्यकशिपु ने सबको समझा-बुझाकर शान्त किया, परन्तु स्वयं शान्त नहीं हुआ । हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला धधकने लगी । फिर तो उसने निश्चय किया कि तपस्या करके ऐसी शक्ति प्राप्त की जाय कि त्रिलोकी का राज्य निष्कंटक हो जाय और हम अमर हो जायें । निश्चय कर लेने पर हिरण्यकशिपु ने मन्दराचल की घाटी में जाकर ऐसा घोर तप किया कि जिससे देवलोक भी तप्त हो गये । देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने जाकर उससे अमरत्व छोड़कर अन्य कोई भी मनचाहा वर माँगने को कहा । उसने कहा कि मैं चाहता हूँ कि आप के बनाये  हुए किसी प्राणी से मेरी मृत्यु न हो । भीतर बाहर, दिन में रात में, आपके बनाये हुए प्राणियों के अतिरिक्त और भी किसी जीव के अस्त्र शस्त्र से, पृथ्वी या आकाश में कहीं भी मेरी मृत्यु न हो । युद्ध में कोई भी मेरा सामना न कर सके । मैं समस्त प्राणियों का एकछत्र सम्राट बनूँ  । इन्द्रादि समस्त लोकपालों में जैसी आप की महिमा है वैसी ही मेरी हो । तपस्वियों और…

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( कच्छप अवतार ) भाग 3

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कच्छप अवतार

जब दैत्यों के तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से देवता अमर होकर भी संग्राम में मरने लगे और प्राणों से वियोग हो जाने से फिर पृथ्वी से न उठ  सके । जब दुर्वासाजी के श्राप से इंद्र सहित तीनों लोक श्री रहित हो गये । तब इंद्रादि ब्रह्माजी की शरण में गये । ब्रह्मा जी सबको लेकर अजित भगवान के धाम को गये और उनकी स्तुति की । भगवान ने उनको यह युक्ति बताई कि दैत्य और दानवों के साथ सन्धि करके मिल-जुलकर क्षीर सिंधु को मथने का उपाय करो । मंदराचल को मथानी और वासुकी नाग को नेती बनाओ । मन्थन करने पर पहले कालकूट निकलेगा, उसका भय ना करना, और अनेक रत्न निकलेंगे उनका लोग न करना । अन्त में अमृत निकलेगा वह युक्ति से मैं तुम लोगों को पिला दूँगा । देवताओं ने जाकर दैत्यराज बलि महाराज से सन्धि कर ली । अब देवता और दैत्य मन्दराचल को उखाड़ कर ले चले परन्तु थक गये, तब भगवान प्रकट होकर उसे उठाकर गरुड़ पर रखकर सिंधु तट पर पहुँचे । वासुकी अमृत के लोभ से नेती बने । जब समुद्र-मन्थन होने लगा तब बड़े-बड़े देवता और असुरों के पकड़े रहने पर भी अपने भार की अधिकता और नीचे कोई आधार न होने के कारण मन्दराचल समुद्र में…

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( वराह अवतार ) भाग 2

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वराह अवतार

ब्रह्मा से सृष्टिक्रम प्रारम्भ करने की आज्ञा पाये हुये स्वायम्भुव मनु ने पृथ्वी को प्रलय के एकार्णव में डूबी हुई देखकर उनसे प्रार्थना की कि आप मेरे और मेरी प्रजा के रहने के लिये पृथ्वी के उद्धार का प्रयत्न करें जिससे मैं आपकी आज्ञा का पालन कर सकूँ । ब्रह्माजी इस  विचार में पड़कर कि पृथ्वी को रसातल में चली गई है, इसे कैसे निकाला जाय, वे सर्वशक्तिमान श्रीहरि की शरण में गये । उसी समय विचारमग्न ब्रह्माजी की नाक से अंगुष्ठ प्रमाण एक वराह बाहर निकल पड़ा और क्षण-भर में पर्वताकार विशालरूप गजेंद्र सारिखा गर्जन करने लगा । शुकररूप भगवान पहले तो बड़े वेग से आकाश में उड़े । उनका शरीर बड़ा कठोर था त्वचा पर कड़े-कड़े बाल थे, सफेद दाढ़े थीं, उनकी नेत्रों से निकल रहा था । उनकी दाढ़ी भी अति कर्कश थी । फिर अपने वज्रमय पर्वत समान कठोर-कलेवर से उन्होंने जल में प्रवेश किया । बाणों के समान पैने खुरों से जल को चीरते हुये वे जल के पार पहुंचे । रसातल में समस्त जीवों की आश्रयभूता पृथ्वी को उन्होंने वहां देखा जिसे कल्पांत में शयन करने के लिए उद्यत श्रीहरि ने अपने ही उदर में लीन कर लिया था । पृथ्वी को व…

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( मतस्य अवतार ) भाग 1

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मतस्य अवतार

ब्रह्माजी के सोने का जब समय आ गया और उन्हें नींद आने लगी, उस समय वेद उनके मुख से निकल पड़े और उनके पास ही रहने वाले हयग्रीव नामक दैत्य ने उन्हें चुरा लिया । ब्राह्म नामक  नैमित्तिक प्रलय होने से सारे लोक समुद्र में डूब गये । श्रीहरि ने हयग्रीव की चेष्टा जान ली और वेदों का उद्धार करने के लिए मत्स्यावतार ग्रहण किया । द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत बड़े भगवत परायण थे । वे केवल जल पीकर तपस्या कर रहे थे । ये ही वर्तमान महाकल्प में वैवस्वत मनु हुए । एक दिन कृतमाला  नदी में तर्पण करते समय उनकी अञ्जलि में एक छोटी-सी मछली आ गई, उन्होंने उसे जल के साथ फिर नदी में छोड़ दिया । उसने बड़ी करुणा से प्रार्थना की कि - मुझे जलजन्तु खा लेंगे, मेरी रक्षा कीजिये । राजा ने उसे जलपात्र में डाल लिया । वह इतनी बढ़ी कि कमण्डल में संभाजी समवाई न रही,  तब राजा ने बड़े मटके में रक्खा । दो घड़ी में वह तीन हाथ की हो गई तब उसे एक बड़े सरोवर में रख दिया । थोड़ी ही देर में उसने महामतस्य का आकार धारण किया । जिस किसी जलाशय में रखते हैं उसी से वह बड़ी हो जाती । तब राजा ने उसे समुद्र में छोड़ दिया । उसने बड़ी क…

गुरु भक्त एकनाथ जी

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भक्त एकनाथ जी
एकनाथ एक सच्चे शिष्य थे और जनार्दन स्वामी एक समर्थ गुरु । एकनाथ का अपने गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का भाव था । वे अपने गुरु को अपना सर्वस्व सौंप चुके थे । अगाध श्रद्धाभाव से वे सदा आप्लावित रहते थे । उनकी साँसे केवल अपने गुरु के लिए ही चलती थी । उनका प्रत्येक कर्म केवल अपने गुरु के लिए ही समर्पित होता था । वे स्वयं कुछ भी विचार नहीं करते थे, वरन जो गुरु-आज्ञा होती थी, उसे ही अपने जीवन का उद्देश्य मानकर उस पर चिंतन-मनन करते थे । उनके हृदय का प्रत्त्येक स्पंदन अपने गुरु के लिए ही होता था । इसके बदले में उनके गुरु का भी ऊके प्रति अगाध प्रेम था ।
एक दिन जनार्दन स्वामी ने उनसे कहा- "एकनाथ । तुम्हे कुछ चाहिए तो अवश्य बता देना । मन में कोई इच्छा हो तो भी बता देना ।" एकनाथ ने कहा- "हे गुरुदेव । मुझे कुछ भी नहीं चाहिए और न मेरे मन में कोई इच्छा है । अगर होगी तो भला आपसे कैसे आप से कैसे छिपी रह सकती है । आप तो  मेरे जीवन के सर्वस्व हैं । ऐसी कौन-सी बात हैं, ऐसा कौन सा रहस्य हैं, ऐसा कौन सा गुप्त संस्कार हैं, जो आपको पता न हो ।" जनार्दन स्वामी के अधरों पर एक मु…

Kabir Das ji Ki Jivani

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कबीर दास जी
कबीरहिंदीसाहित्यकेमहिमामण्डितव्यक्तित्वहैं।कबीरकेजन्मकेसंबंधमेंअनेककहानियाप्रचलितहैं।कुछलोगोंकेअनुसारवेरामानन्दस्वामीकेआशीर्वादसेकाशीकीएकविधवाब्राह्मणीकेगर्भसेपैदाहुएथे, जिसकोभूलसेरामानंदजीनेपुत्रवतीहोनेकाआशीर्वाददेदियाथा।ब्राह्मणीउसनवजातशिशुकोलहरतारातालकेपासफेंकआयी।
कबीरकेमाता- पिताकेविषयमेंएकरायनिश्चितनहींहैकिकबीर "नीमा' और "नीरु' कीवास्तविकसंतानथेयानीमाऔरनीरुनेकेवलइनकापालन- पोषणहीकियाथा।यहभीकहाजाताहैकिनीरुजुलाहेकोयह