वृन्दावन के श्री बांके बिहारी लाल जी की लीला



॥ जय जय श्री राधे ॥

वृन्दावन के श्री बांके बिहारी लाल जी की लीला,

बात आज से नौ वर्ष पूर्व वृन्दावन के मोतीझील स्थान के एक वैष्णव ब्राह्मण परिवार की है।
एक 14-15 वर्षीय श्वेतांक नामक किशोर दसवीं की परीक्षाएँ देने के बाद अपने नाना-नानी के यहाँ छुट्टियाँ बिताने आया। वह वृन्दावन पहली बार आया था और वृन्दावन की महिमा उसने अपने नानाजी से हमेशा से ही सुनी हुई थी। जब कभी कोई बाहर से आता तो वे सर्वप्रथम बिहारीजी के दर्शन करने को ही कहते थे और कहते :~
"बेटा ! "यहाँ तौ जो करैं सो बिहारीजी ही करैं", जाय कै सबसे पहले बिहारी जी के दर्शन करकै आओ, जो कछु हैं सो बिहारीजी ही हैं।"

एक डेढ महीने की छुट्टियों में वह यह सोचकर आया था कि वृन्दावन जाकर खूब घूमूंगा, दर्शन करुंगा। लम्बी छुट्टियों के कारण घर से भी और कोई नही आया था उसके साथ, अपने मामा जी के साथ अकेला ही आया था। अब यहाँ आने के बाद मामा जी ने उसे बिहारीजी के दर्शन करवाए और वो अपनी छुट्टियों का आनन्द लेने लगा। यहाँ घर पर नाना-नानी जी और मामा जी के अतिरिक्त घर के सदस्य के रुप में ही बाल गोपाल जी का श्रीविग्रह विराजमान था। घर पर नाना जी से बिहारीजी की चर्चा सुनता और आस-पड़ोस के हम उम्र बालकों के मित्र बन जाने से उनके साथ क्रिकेट वगैरह खेलता। घूमने के बहाने घर के कुछ छोटे-मोटे काम वगैरह भी करके ले आता क्योंकि वहाँ घर पर मामा जी के अतिरिक्त उसे घुमाने वाला और कोई नही था।

नाना-नानी जी वृद्धावस्था और अस्वस्थता के कारण से असमर्थ थे और मामा जी अपने काम में व्यस्त। एक दिन वह इसी तरह घर से निकलकर अखण्डानन्द आश्रम तक ही आया था कि बन्दरों के समूह ने उसे घेर लिया। यह देख वह बहुत ही भयभीत हो गया क्योंकि उसके लिये ये सब बिल्कुल अप्रत्याशित था।

कुछ सूझ नहीं रहा था कि तभी उसे नाना जी की कही बिहारीजी वाली बात याद आ गयी कि- "यहाँ तौ जो करैं सो बिहारीजी करैं" और वो कुछ मन में और कुछ जोर जोर से "बिहारी जी, बिहारी जी" पुकारने लगा ।अचानक उसे पीछे से आवाज सुनाई दी- "चलो भागो सब के सब।"

उसने पीछे मुड़कर देखा तो उससे तनिक छोटा हष्ट्पुष्ट एक ब्रजवासी बालक हाथ में एक लकड़ी लिये हुए सामने आ गया और बोला - "डर मत ! अब मैं आय गयो हूँ !" और क्षण भर में ही सारे बन्दर भाग गये।

श्वेतांक ने ब्रजवासी बालक से पूछा- "तुम्हें बन्दरों से डर नही लगता" तो वो हँस कर बोला - "नाँय, मोय डर नाँय लगे।"

ब्रजवासी बालक ने पूछा - "तुम कौन हो?"

श्वेतांक ने बताया- "मैं तो वृन्दावन घूमने आया था लेकिन कैसे घुमूं?"

बृजवासी बालक ने कहा- "मेरे संग चलो मैं घुमाय दूंगो"

अब वे मित्र बन गये और उस दिन वृन्दावन के कई मन्दिरों के दर्शन करवाने के बाद उस बालक ने अपने पास से ही श्वेतांक को चाट-पकौड़ी भी खिलाई और हर तरह से उसका ध्यान रखा और फिर दूसरे दिन मिलने का समय निश्चित कर दोनों वापस हो लिये।

अगले दिन वह फिर वहाँ पहुँचा तो उस बालक को हाथ में छड़ी लिये हुए हँसते हुए प्रतीक्षा करते हुए पाया।
उसके पास पहुँचते ही वो बोला - "तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रह्यौ हो।"

और फिर वही आनन्द से भरे दोनों वृन्दावन के मन्दिरों में दर्शन करते घूमते रहे और जो भी खाने-पीने का मन हुआ, खाया-पिया लेकिन प्रत्येक वस्तु का मूल्य ब्रजवासी बालक ने ही दिया और कई बार कहने पर भी देने नही दिया।

ब्रजवासी ने कहा -"अरे हमाय वृन्दावन घूमवे कूं आये हौ तो तुमै कैसे मूल्य दैवन दैंगे।"

इसी तरह चार-पाँच दिन बीत गये और लगभग वृन्दावन के सभी मन्दिरों के दर्शन हो गये थे।

एक दिन श्वेतांक ने ब्रजवासी बालक से पूछा- "तुम पैरों में जूते या चप्पल क्यों नही पहनते हो, चलो आज तुम्हारी चप्पलें ले लें।"

ब्रजवासी बालक ने जवाब दिया-"अरे भईया, बिहारी जी में चप्पल पहन कै अन्दर नाँय जावैं , याही तै नाय पहनूं।"

इन चार-पाँच दिनों में श्वेतांक ने घर में किसी से उस ब्रजवासी बालक की चर्चा नहीं की थी और उसे बताने का ध्यान भी नही आया था।

उसे तो बस एक दिन बीतने के बाद दूसरे दिन की प्रतीक्षा रहने लगी और घर पर सभी यही सोचते कि घर पर मन न लगने के कारण मित्र मण्डली के साथ क्रिकेट वगैरह खेल रहा होगा।

इधर एक दिन घूमते हुए कुछ देर हो गयी, ब्रजवासी बालक ने हँसते हुए पूछा -"अब तौ खुश हौ वृन्दावन घूम कै?"

श्वेतांक ने हँस कर "हाँ" कहा और कुछ समय और साथ रहने के लिये कहा तो ब्रजवासी लगभग दौड़कर जाते हुए बोला - "नाँय ! अब बिहारी जी खुलबे कौ समय है गयौ है।"

और वह ब्रजवासी बालक हँसता हुआ बिना कुछ पूछने का मौका दिये आँखों से ओझल हो गया।

घर देर से पहुँचने पर नाना जी नाराज़ हुए कि - "कहाँ घूमते रहते हो सारा समय, यहाँ सभी से पूछने पर उन्होंने बताया तुम चार-पाँच दिनों से इनके साथ नही खेल रहे हो, कहाँ थे?"

श्वेतांक ने जब सारी बात नाना जी को बताई तो उन्होंने पूछा - "कैसा था वो बालक"

श्वेतांक ने बताया- "तेरह-चौदह वर्ष का है, घुटनों से कुछ नीची धोती और कुर्ता या बगलबंदी पहने साथ ही एक अंगोछा सा डाले हुए, हाथ में एक लकड़ी लिये हुये।"

श्वेतांक ने बताया- "मुझ पर तो उसने बहुत पैसे खर्च किये लेकिन पैसे होते हुए भी उसने अपने लिए चप्पलें नही लीं , पता नहीं क्यों?"

उसके नानाजी ने उससे कहा कि- "कल उसे घर पर बुलाकर लाना और उसके पैसे देना।"

दूसरे दिन वह उस स्थान पर गया लेकिन उसे वह ब्रजवासी बालक कहीं नहीं मिला, बहुत ढूंढा पर वह कहीं नहीं दिखा जबकि उसने पूछने पर बताया था कि वो यहीं पर तो रहता है लेकिन अब हर जगह और हर गली में ढूंढने पर भी फिर कभी दिखाई नहीं दिया।

आज भी जब कभी श्वेतांक वृन्दावन आता है तो उसकी निगाहें, प्रत्येक स्थान पर, अपने उस मित्र को ढूंढने की कोशिश करती हैं।

बाँके बिहारी लाल की जय...जय जय श्री राधे कृष्ण..॥
बिहारी तेरी यारी पे, बलिहारी रे बलिहारी...॥

हे ईश्वर, हमारे हृदय में वो प्रेम भाव भर दो जिससे विवश होकर बिहारी जी हमें भी वृन्दावनधाम में लीलास्थली के दर्शन करवायें।                 

जय हो बिहारीजी की 


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