श्रीहरि विष्णु के अवतार ( कच्छप अवतार ) भाग 3



कच्छप अवतार

जब दैत्यों के तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से देवता अमर होकर भी संग्राम में मरने लगे और प्राणों से वियोग हो जाने से फिर पृथ्वी से न उठ  सके । जब दुर्वासाजी के श्राप से इंद्र सहित तीनों लोक श्री रहित हो गये । तब इंद्रादि ब्रह्माजी की शरण में गये । ब्रह्मा जी सबको लेकर अजित भगवान के धाम को गये और उनकी स्तुति की । भगवान ने उनको यह युक्ति बताई कि दैत्य और दानवों के साथ सन्धि करके मिल-जुलकर क्षीर सिंधु को मथने का उपाय करो । मंदराचल को मथानी और वासुकी नाग को नेती बनाओ । मन्थन करने पर पहले कालकूट निकलेगा, उसका भय ना करना, और अनेक रत्न निकलेंगे उनका लोग न करना । अन्त में अमृत निकलेगा वह युक्ति से मैं तुम लोगों को पिला दूँगा । देवताओं ने जाकर दैत्यराज बलि महाराज से सन्धि कर ली । अब देवता और दैत्य मन्दराचल को उखाड़ कर ले चले परन्तु थक गये, तब भगवान प्रकट होकर उसे उठाकर गरुड़ पर रखकर सिंधु तट पर पहुँचे । वासुकी अमृत के लोभ से नेती बने । जब समुद्र-मन्थन होने लगा तब बड़े-बड़े देवता और असुरों के पकड़े रहने पर भी अपने भार की अधिकता और नीचे कोई आधार न होने के कारण मन्दराचल समुद्र में डूबने लगा । इस प्रकार अपना सब करा कराया मिट्टी में मिलते देखकर उन सबों का मन टूट गया । उस समय भगवान ने यह देखकर कि यह सब विघ्नराज ( गणेश जी ) की करतूत है, उन्होंने हँसकर कहा-सब कार्यों के प्रारम्भ में गणेश जी की पूजा करनी चाहिये । सो तो हम लोगों ने बिल्कुल भुला दिया । बिना उनकी पूजा के कार्य सिद्ध होता नहीं दीखता । अब उन्हीं की पूजा करनी चाहिये । लीलामय भगवान की लीला है । वे स्वयं सर्व-समर्थ हैं । परन्तु कार्यारम्भ में गणेशजी की अग्रपूजा की मर्यादा जो बांध रखी है । उसका पालन करने के लिए जब देवताओं और दैत्यों को यह परामर्श दिये तो सभी लोग श्री गणेशजी की पूजा में लगे, इधर भगवान ने तुरन्त अत्यंत विशाल एवं विचित्र कच्छप का रूप धारण कर समुद्र में प्रवेश करके अपनी एक लाख योजन वाली पीठ पर मन्दराचल को ऊपर उठा लिया । तब देवता और दैत्य फिर बढ़े वेग से समुद्र को मथने लगे । भगवान कच्छप को पीठ पर मन्दराचल का घूमना ऐसा जान पड़ता था मानो कोई और उनकी पीठ को खुजला रहा है ।

भगवान कच्छप रूप से मन्दराचल को धारण किए हुए थे, विष्णु रूप से देवताओं के साथ मथ रहे थे । एक तीसरा रूप भी धारण करके मन्दराचल को अपने हाथों से दबाये हुये थे कि कहीं उछल न जाय । मथते - मथते बहुत देर हो गई, परन्तु अमृत न निकला । अब भगवान ने  सहस्त्रबाहु होकर स्वयं ही दोनों ओर से मथना आरम्भ किया । उस समय भगवान की बड़ी विलक्षण शोभा थी । ब्रह्मा, शिव, सनकादि, जय जयकार करते हुए आकाश मण्डल से पुष्पों की वर्षा कर रहे थे । उन लोगों की ध्वनि में ध्वनि मिलाकर समुद्र भी भगवान की जय जयकार कर रहा था । समुद्र से सर्वप्रथम 'हलाहल विष' प्रगट हुआ उससे त्रैलोक्य जलने लगा तो वह देवाधिदेव महादेव को भेंट किया गया । फिर और भी रत्न निकले । उनमें से 'कामधेनु' को ऋषियों ने स्वीकार किया । उच्चै: श्रवा सेवा नामक अति सुन्दर बलिष्ठ अश्व को दैत्यों ने लिया । बाद में 'ऐरावत' नामक महान हाथी निकला वह देवताओं के राजा इंद्र को मिला । 'कौस्तुभ मणि' के प्रति सभी लालायित थे उसे भगवान ने अपने कण्ठ में धारण कर लिया । 'कल्पवृक्ष' बिना किसी की अपेक्षा किये स्वर्ग में चला गया । 'अप्सराये' भी स्वेछा से स्वर्ग को ही प्रस्थान कर गईं । 'भगवती लक्ष्मी' ने, अपनी ओर से उदासीन रहने पर भी सर्वगुण संपन्न भगवान विष्णु को वरण किया । 'वारुणी देवी' को दैत्यों ने बड़े चाव से लिया । 'धनुष' तो किसी से उठा ही नहीं । तब भगवान विष्णु ने उसे धारण किया । 'चंद्रमा' को अनन्त आकाश विचरने के लिए दिया गया । 'दिव्य शंख' को भगवान ने स्वीकार किया । अन्त में 'अमृत कलश' हाथ में लिये हुए प्रगट हुए धन्वन्तरिजी महाराज । दैत्यों ने उनसे अमृत-कलश छीन लिया, देवता उदास हो गये । तब भगवान ने मोहिनी-स्वरूप धारणकर दैत्यों को व्यामोहित कर अमृत-कलश उनसे लेकर अमृत देवताओं को पिला दिया । देवताओं की पंक्ति में सूर्य और चंद्र के बीच में एक राहु नामक दैत्य वेष बदलकर आ बैठा था । उसे अमृत पिलाया ही जा रहा था कि चंद्रमा और सूर्य से बतला दिया और तुरन्त ही भगवान के चक्र ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया । परन्तु कुछ अमृत उसे मिल चुका था अतः सिर कटने पर भी मरा नहीं । इसलिए उसे ग्रहों में स्थान दिया गया । राहु अब भी सूर्य चंद्रमा से बदला लेने के लिए उनके पर्व अमावस्या और पूर्णिमा पर आक्रमण करता है । जिसे ग्रहण कहते हैं । देवताओं ने अमृत पी ही लिया था ।  भगवान का आश्रय था ही । अतः अबकी बार संग्राम में विजय देवताओं की हुई ।

जिस समय भगवान ने कच्छप रूप धारण किया था और उनकी पीठ पर बड़ा भारी मन्दराचल  मथानी की तरह घूम रहा था, उस समय मंदराचल की चट्टानों की नोंक से खुजलाने के कारण भगवान को तनिक सुख मिला । वे सो गये और श्वांस की गति तनिक बढ़ गई । उस समय उस  श्वांस वायु से जो समुद्र के जल को धक्का लगा था उसका संस्कार आज भी उसमें शेष है । आज भी समुद्र उसी श्वांस वायु के थपेड़ों के फलस्वरुप ज्वार भाटों के रूप में दिन-रात चढ़ता-उतरता है उसे अब तक विश्राम न मिला । भगवान की वहीं परम प्रभावशाली वायु आप लोगों की रक्षा करें ।

जय कच्छप अवतार की।
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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