श्रीहरि विष्णु के अवतार ( वामन-अवतार ) भाग 5



श्री वामनावतार की कथा-

भगवान की कृपा से ही देवताओं की विजय हुई । स्वर्ग के सिंहासन पर इंद्र का अभिषेक हुआ । परन्तु अपनी विजय के गर्व में देवता लोग भगवान को भूल गये विषय परायण हो गये । उधर हारे हुए दैत्य बड़ी सावधानी से अपना बल बढ़ाने लगे । वे गुरु शुक्राचार्यजी के साथ साथ समस्त भृगुवंशी ब्राह्मणों की सेवा करने लगे, जिससे प्रभावशाली भृगुवंशी अत्यंत प्रसन्न हुए और दैत्यराज बलि से उन्होंने विश्वजीत यज्ञ कराया । ब्राह्मणों की कृपा से यज्ञ में स्वयं अग्निदेव ने प्रगट होकर रथ घोड़े आदि दिये और अपना आशीर्वाद दिया । शुक्राचार्यजी ने एक दिव्य शंख और प्रह्लादजी ने एक दिव्य माला दी । इस तरह सुसज्जित हो सेना सहित उन्होंने जाकर अमरावती को घेर लिया । देवगुरु बृहस्पति के आदेशानुसार देवताओं सहित इंद्र ने स्वर्ग को छोड़ दिया और कहीं जा छिपे । विश्व-विजयी हो जाने पर भृगुवंशीयों ने बलि से सौ अश्वमेघ यज्ञ कराये । इस तरह प्राप्त समृद्ध राज्य-लक्ष्मी का उपभोग वे बड़ी उदारता से करने लगे । 

अपने पुत्रों का ऐश्वर्य राज्यादि छिन जाने से माता अदिति बहुत दुःखी हुई अपने पति कश्यपजी के उपदेश से उन्होंने पयोव्रत किया । भगवान ने प्रकट होकर कहा कि - ब्राह्मण और ईश्वर बलि के अनुकूल है । इसलिये वे जीते नहीं जा सकते । मैं अपने अंशरुप से तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारे संतान की रक्षा करूँगा फिर तो भाद्रपद शुक्ल 12 के मध्यान्ह काल में अभिजीत मुहूर्त में भगवान प्रगट हुए और कश्यप अदिति के देखते-देखते उसी शरीर से वामन ( बौना ) ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया । ठीक वैसे ही जैसे कोई नट अपना भेष बदल ले । भगवान को वामन ब्रह्मचारी के रूप में देखकर महर्षियों को बड़ा आनन्द हुआ । उन लोगों ने कश्यप प्रजापति को आगे करके उनके जात कर्म आदि संस्कार करवाये । जब उनका उपनयन संस्कार होने लगा तब सूर्य ने उन्हें गायत्री का उपदेश दिया । बृहस्पति ने यज्ञोपवीत और कश्यप ने मेखला दी । पृथ्वी ने कृष्णमृग चर्म, वन के स्वामी चंद्रमा ने दण्ड, माता अदिति ने कौपीन और उत्तरीयवस्त्र, आकाश के अभिमानी देवता ने छत्र, ब्रह्मा ने कमण्डल सप्तर्षियों ने कुश और सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला समर्पित की । कुबेर ने भिक्षापात्र और साक्षात् जगन्माता अन्नपूर्णा ने दीक्षा दी । इस प्रकार ब्रह्मचर्य दीक्षा पूर्ण हुई । उसी समय भगवान ने सुना कि सब प्रकार की सामग्रियों से संपन्न यशस्वी बलि भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार बहुत से अश्वमेघ यज्ञ कर रहे हैं, तब उन्होंने वहां के लिए यात्रा की ।

यात्रा के प्रसङ्ग में एक बड़ी मधुर कथा आती है - श्रीवामन भगवान जब बलि के यहाँ जा रहे थे तो मार्ग में एक गहरी नदी पड़ी और आप ठहरे 'बावन अंगुल गात' उस पर भी हाथ में छतरी, लोटा,सोटा, लंगोटी । मुंजी, मेखला, कौपीन-कमण्डल । सम्हाल नहीं पाते थे एक सँभालते तो दूसरा गिरने लगता । भगवान की बड़ी अदभुत लीला है । नहीं तो भला जिनके रोम-रोम में कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिए कौपीन - कमण्डल का क्या भार । नदी पार करना है । एक दो कदम भीतर जाते फिर बाहर निकल आते । देर तक यह भीतर बाहर जाने-आने की लीला हुई । उस पार भजन में प्रवृत्त एक ब्राह्मण का ध्यान बरवस इधर आकृष्ट हुआ । तो वे  वामन ब्रह्मचारीजी के पास आकर पूछे तो इन्होंने बलि की यज्ञशाला में जाकर दान-दक्षिणा लेने की बात बताई । ब्राह्मण ने देखा ब्रह्मचारी है बड़ा तेजस्वी । बलिजी हैं बड़े उदार, दक्षिणा मोटी मिलेगी । अतः ब्राह्मण ने आधी दक्षिणा पर पार करने का ठेका किया । वामनजी ने स्वीकृति दे दी । ब्राह्मण ने वामन भगवान को कन्धे पर चढ़ा लिया । प्रभु का मृदुल संस्पर्श होते ही ब्राह्मण को अभूतपूर्व सुख मिला । दर्शन से मन मोहित था ही, स्पर्श ने और भी अधिक मोहिनी डाल दी ।

भगवान के अचित्यानन्त सौन्दर्य-माधुर्य, सौकुमार्य, संभाषण संस्पर्शन आदि के द्वारा अपहृत चित्त ब्राह्मण की दृष्टि जब भगवान के श्रीचरण-कमल-तल पर गयी तो देखा-रेख कुलिश ध्वज अंकुश सौहैं । विद्वान ब्राह्मण को समझते देर नहीं लगी । परन्तु जान गये कि यह साधारण भिक्षुक ब्रह्मचारी नहीं, ये तो सीएम भगवान् हैं । फिर क्या था । मन झूम उठा, परमानन्द के हिंडोले में । जब बीच धरा में पहुँचे तो बोले- मैंने आपको पहचान लिया, आप तो भगवान हैं । अब आपको मैं तभी छोड़ूँगा जब आप मुझे भवसागर से पार करने का वचन दे देंगे । प्रभु ने बात बनाई, पंडितजी ! आप यह क्या कर रहे हैं । मैं तो पिता श्रीकश्यपजी, माता श्रीआदितिजी का पुत्र हूँ । भिक्षा के लिए जा रहा हूँ । परन्तु ब्राह्मण ने एक ना मानी । वह तो जान चूका था, पहचान चूका था । अतः विवश होकर प्रभु ने उन्हें निज-स्वरुप का दर्शन कराकर जीवन्मुक्त कर दिया । फिर जब नदी पार हुए तो बोले- हमारे आपके बीच जो तय हुआ है सो, उसके लिए आप भी हमारे साथ-साथ चलिये । ब्राह्मण ने कहा-प्रभो ! वह तो अनजाने की बात थी । 'अब कुछ नाथ न चाहिय मोरे ।' भगवान हँसते हुए चल दिये ।

राजा बलि नर्मदा नदी के उतर तट पर भृगुकच्छ नामक क्षेत्र में भृगुवंशीयों के आदेशानुसार एक श्रेष्ठ यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे । ठीक उसी समय हाथ में छत्र, दण्ड और जल से भरा कमण्डल लिये वामन भगवान ने अश्वमेघ यज्ञ मंडप में प्रवेश किया । वे कमर में गूँज की मेखला और गले में यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे । बगल में मृगचर्म और सिर पर थी जटा । राजा बलि ने स्वागत वाणी से उनका अभिनंदन किया और चरणों को पखारकर चरणतीर्थ को मस्तक पर रखा । फिर बटुरूपधारी भगवान से बोले - ब्राह्मण कुमार । ऐसा जान पड़ता है कि आप कुछ चाहते हैं । आप जो कुछ भी चाहते हैं, अवश्य ही वह सब आप मुझसे माँग लीजिये । भगवान ने प्रसन्न होकर बलि का अभिनन्दन किया और कहा - राजन ! आपने जो कुछ कहा, वह धर्ममय होने के साथ-साथ आपकी कुल परम्परा के अनुरूप है । यह कहकर फिर बलि के पूर्वजों का यशोगान किया । बलि के पिता विरोचन की उदारता, पितामह प्रह्लाद की भक्ति निष्ठा प्रपितामह हिरण्यकशिपु - हिरण्याक्ष के अमित पराक्रम की प्रशंसा किये और बोले - मैं केवल अपने डग से तीन डग पृथ्वी चाहता हूँ । बालिजी हँस गये - 'यथा दरिद्र विबुधतरु पाई । बहु सम्पति मांगत सकुचाई ।' वही हाल आपका है । भगवान ने कहा नहीं, कम माँगने में दरिद्रता हेतु नहीं है । सन्तोष हेतु है ।

गो धन गज धन बाजि धन, और रतन धन खान ।
जब आवै सन्तोष धन, सब धन धूरि समान ।।

बलि ने कहा - अच्छा, तीन पग लेना है तो मेरे दैत्यों के पग से लीजिये । देखिये एक-एक योजन के इनके पाँव हैं । भगवान भी पूरे हठी हैं, बोले - नहीं मुझे तो अपने ही पाँव से नाप लेने हैं । क्योंकि धन का उतना ही संग्रह करना चाहिये जितने की आवश्यकता हो । जो ब्राह्मण स्वयं प्राप्त वस्तु से ही सन्तोष कर लेता है उसके तेज की वृद्धि होती है । नहीं तो पतन हो जाता है । शुक्राचार्यजी के बहुत समझाने पर भी कि यह बटुरूपधारी तुम्हारे शत्रु भगवान विष्णु है, ये सब छीनने के लिये आये हैं । अपनी जीविका छिनती देख असत्य बोलकर उनकी रक्षा करना निन्दनीय नहीं है । राजा ने असत्य बोलना, दान देने को कहकर फिल्म नकार जाना स्वीकार न किया । तब शुक्राचार्य जी ने राजा को ऐश्वर्य भ्रष्ट होने का श्राप तक दे दिया । तो भी महात्मा बलि अपने वचन से वचन से नहीं डिगे । नहीं डिगने के तीन हेतु १. प्रतिज्ञा कर चुके हैं, सोचे कि 'सुकृत जाइ जौं पन परिहरऊँ' । 2. जब ये मेरा सब लेने के लिए आये हैं तो मैं नहीं भी दूँगा तो मुझे थप्पड़ मारकर लेंगे, जैसे मेरे पूर्वजों से ले लिया करते थे । तो फिर मैं राजी-खुशी से दान ही क्यों न कर दूँ । 3. गुरुजी ने ऐश्वर्य से भ्रष्ट होने का श्राप दे दिया है तो मुझे किसी न किसी प्रकार से ऐश्वर्य रहित होना ही है तो मैं दान ही क्यों न कर दूँ । अतः बलि जी अपने निश्चय से हटे नहीं और हाथ में जल लेकर तीन पग पृथ्वी का संकल्प कर दिया ।

संकल्प होते ही वामन रूप बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ा कि भगवान की इंद्रियों में और शरीर में सभी चराचर प्राणियों का दर्शन होने लगा । सर्वात्मा भगवान में सारा ब्रह्मांड देखकर सब दैत्य भयभीत हो गये । उन्होंने एक डग से बलि की साड़ी पृथ्वी नाप ली । शरीर से नभ और भुजाओं से सभी दिशाएँ घेर लीं ।  दूसरे पग से स्वर्ग नाप लिया तीसरा पग रखने के लिए बलि की कोई भी वस्तु न बची । भगवान का दूसरा पग ही ऊपर को जाता हुआ महर्लोक, जन-लोक और तप लोक और तप लोक से भी ऊपर सत्य-लोक में पहुंच गया । श्री ब्रह्माजी ने विश्वरूप भगवान के ऊपर उठे हुए चरण का अर्ध्यपाद्य से पूजन और प्रक्षालन किया । ब्रह्मा के के कमण्डल का वही जल विश्वरूप भगवान के पद-प्रक्षालन से पवित्र होने के कारण
गङ्गाजी के रूप में परिणत हो गया ।

बलि के सेनापतियों ने, यह जानकर कि यह भिक्षुक ब्रह्मचारी तो हम लोगों का बैरी है जो अपने को छिपाकर देवताओं का काम करना चाहता है और राजा तो यज्ञ में दीक्षित होने से कुछ कहेंगे नहीं, वामन भगवान पर अस्त्र चलाया, पर भगवतपार्षदों ने उन्हें खदेड़ा । बलि ने दैत्यों को समझा-बुझाकर लड़ाई करने से रोक दिया । भगवान का इशारा पाकर गरुड़ ने वरुणपाश से बलि को बाँध दिया।  तत्पश्चात भगवान बलि से बोले- दो पग में तो मैंने तुम्हारी सब पृथ्वी और सब लोकों को नाप लिया, तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी न होने से अब तुम नरक भोगोगे । इत्यादि रीति से वामनजी ने बहुत तिरस्कार किया परन्तु राजा बलि धैर्य से विचलित न हुए । उन्होंने बड़ा ही सुन्दर उत्तर दिया, प्रभो ! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ । धन बड़ा है कि धनी ? भगवान ने कहा - चूँकि धन धनी के अधीन रहता है इसलिये धनी धन से बड़ा होता है । बलिजी ने कहा प्रभो ! आपने मेरा धन तो दो पग में नाप लिया है । रही एक पग की बात, सो वह पग आप मेरे सिर पर दीजिये । यद्यपि हूँ तो मैं दो पग से भी अधिक, परन्तु एक ही पग में मैं आपके चरणों में आत्म-समर्पण करता हूँ । भगवान बहुत प्रसन्न होकर ब्रह्माजी से बोले- मैं जिस पर बहुत प्रसन्न होता हूँ उसका धन छीन लिया करता हूँ । मैंने इसका धन छीन लिया, राजपद से अलग कर दिया, तरह-तरह के आक्षेप किये, शत्रुओं ने इसे बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ इसे भोगनी पड़ीं - यहाँ तक कि इसके गुरुदेव ने भी इसे श्राप दे दिया, परन्तु इस दृढ़व्रती ने प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी । मैंने इससे चल भरी बातें कीं, मन में छल रखकर धर्मोपदेश किया, परन्तु इस सत्यवादी ने अपना धर्म न छोड़ा ! फिर राजा बलि को सूतललोक में रहने की आज्ञा दी और अपूर्व वर दिये । राजा बलि के आप द्वारपाल बन गये । इस तरह बलि से स्वर्ग का राज्य लेकर इंद्र को देकर अदिति की कामना पूर्ण की और स्वयं उपेंद्र बनकर सारे जगत का शासन करने लगे । कश्यप और अदिति की प्रसन्नता के लिए तथा संपूर्ण प्राणियों के अभ्युदय के लिए समस्त लोकों के स्वामी के पद पर वामनजी का अभिषेक कर दिया गया

श्री वामन अवतार की जय
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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