श्रीहरि विष्णु के अवतार ( परशुराम-अवतार ) भाग 6



श्री परशुरामवतार-

( वाल्मीकि रामायण के अनुसार ) साक्षात ब्रह्माजी के पुत्र राजा कुश के चार पुत्रों में से कुश-नाभ दूसरे पुत्र थे । राजा कुश-नाभ ने अपने पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया जिसके फलस्वरुप गाधि नामक परम धर्मात्मा पुत्र हुआ । राजा गाधि के एक कन्या सत्यवती नाम की थी जो महर्षि ऋचीक को ब्याही गयी थी । एक बार सत्यवती और सत्यवती की माता ने ऋचीकजी के पास पुत्र कामना से जाकर, पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की । ऋचीकजी ने दो चरु सत्यवती को दिये और बता दिया कि यह तुम्हारे लिए है और यह तुम्हारी माँ के लिए है इनका तुम यथोचित उपयोग करना । यह कहकर वे स्नान को चले गये । उपयोग करने के समय माता ने कहा- बेटी ! सभी लोग अपने ही लिए सबसे अधिक गुणवान पुत्र चाहते हैं, अपनी पत्नी के भाई के गुणों में किसी की विशेष रूचि नहीं होती । अतः तू अपना चरू मुझे दे दे और मेरा तू ले ले क्योंकि मेरे पुत्र को तो सम्पूर्ण भूमण्डल का पालन करना होगा और ब्राह्मण कुमारों को तो बल, वीर्य तथा सम्पति आदि से लेना-देना ही क्या है ? ऐसा कहने पर सत्यवती ने अपना चरु माता को दे दिया । जब ऋषि को यह बात ज्ञात हुई तब उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि तुमने यह बड़ा अनुचित किया । ऐसा हो जाने से अब तुम्हारा पुत्र घोर योद्धा होगा और तुम्हारा भाई ब्रह्मवेत्ता होगा । सत्यवती के बहुत प्रार्थना करने पर कि मेरा पुत्र ऐसा न हो, उन्होंने कहा कि अच्छा, पुत्र तो वैसा न होगा किन्तु पौत्र उस स्वाभाव का होगा । यही कारण है कि राजा गाधि की स्त्री ने जो चरू खाया उसके प्रभाव से विश्वामित्रजी हुए जो क्षत्रिय होते हुए भी तपस्वी और ब्रम्हर्षि हुए और श्रीऋचीकजी के पुत्र श्री यमदग्निजी तो परम शान्त, दान्त ब्रह्मर्षि हुए परन्तु यमदग्नि पुत्र परशुराम बड़े ही घोर योद्धा हुए ।

श्री परशुराम जी कि मातृ-पितृ की भक्ति- एक बार यमदग्नि ऋषि ने अपनी स्त्री रेणुकाजी को नदी से जल लाने को भेजा । वहां गंधर्व- गन्धर्विनि विहार कर रहे थे । ये जल लेने गई तो उनका विहार देखने लगीं l इसमें उन्हें लौटने में देर हुई । ऋषि ने देरी का कारण जान लिया और यह समझकर कि स्त्री को पर-पुरुष की रति देखना महापाप है, अपने पुत्रों को बुलाकर ( एक-एक करके ) आज्ञा दी कि माता को मार डालो । परन्तु मातृ- स्नेहवश सातों पुत्रों ने इस काम को करना अंगीकार न किया । तब आठवें पुत्र परशुराम को आज्ञा दी कि इन सब भाइयों सहित माता का वध करो । इन्होने तुरन्त सबका सिर काट डाला । इस पर पिता ने प्रसन्न होकर इनसे वर माँगने को कहा । तब इन्होने कहा कि मेरे सब भाई माता जी उठें और इन्हें यह भी न मालूम हो कि मैंने इन्हें मारा था । हमको पाप का स्पर्श न हो । युद्ध में कोई मेरी बराबरी ना कर सके, मैं दीर्घकाल तक जीवित रहूँ । महातपस्वी यमदग्नि ने इन्हे सब वर दिये ।

माहिष्मती नगर का राजा सहस्त्रार्जुन भगवान दत्तात्रेयजी से, युद्ध में कोई सामना न कर सके, युद्ध के समय हजार भुजायें प्राप्त हो जायँ सर्वत्र अव्याहत गति हो आदि वरदान प्राप्त कर उन्मत्त होकर वह रथ और वर के प्रभाव से देवता, यक्ष और ऋषि सभी को कुचले डालता था । उसके द्वारा सभी प्राणी पीड़ित हो रहे थे । एक बार उसने केवल धनुष और बाण की सहायता से, अपने बल के घमण्ड में आकर समुद्र को आच्छादित कर दिया । तब समुद्र ने प्रगट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ-जोड़कर कहा - बीरवर ! बोलो मैं तुम्हारी किस आज्ञा का पालन करुँ । उसने कहा - यदि कहीं मेरे समान धनुर्धर वीर मौजूद हो, जो युद्ध में मेरा मुकाबला कर सके तो उसका पता बताओ । फिर मैं तुझे छोड़कर चला जाऊँगा । तब समुद्र ने कहा - महर्षि यमदग्नि के पुत्र परशुराम युद्ध में तुम्हारा अच्छा सत्कार कर सकते हैं । तुम वहीं जाओ । यह सुनकर राजा ने वही जाने का निश्चय किया । अपनी अक्षौहिणी सेना सहित राजा सहस्त्रार्जुन श्रीयमदग्नि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे ।

ऋषि ने इनका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया, जिससे वह चकित हो गया कि वनवासी के पास ऐसा ऐश्वर्य कहाँ से आया ? यह मालूम होने पर कि यह सब कामधेनु की महिमा है, उसने मुनि से गऊ माँगी, न देने पर जबर्दस्ती उसे छीन लिया और मुनि के प्राण भी ले लिये । उस समय परशुरामजी घर पर नहीं थे । घर पर आने पर उन्होंने माता को विलाप करते हुए पाया । कारण जानने पर उन्होंने पृथ्वी को निःक्षत्रिय करने का सङ्कल्प किया । कहते हैं कि विलाप में माता ने 21 बार छाती पीटी थी अतः इन्होने ने इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय किया । श्रीपरशुरामजी ने माता को ढाढ़स दे तुरन्त सहस्त्रबाहु से युद्ध किया और उसकी भुजाओं को  छिन्न-भिन्न कर उसका सिर काट डाला । इतने पर भी उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ । सहस्त्रार्जुन को मारने के बाद उसके वंश ( हैहय वंश ) का सफाया किया । पुनः पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दीया । उसका राज्य ब्राह्मणों को सौंप दिये । परन्तु कुछ काल बाद बचे- बचाये क्षत्रिय जब पुनः वृद्धि को प्राप्त हुए तो वे ब्राह्मणों को निमंत्रण खिला-खिलाकर उन्हें फुसला-फुसलाकर पुनः राज्य के लिये ।

परशुरामजी ने पुनः संहार किया । इस प्रकार इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार कर राज्य ब्राह्मणों को दिये और क्षत्रिय सहज ही उनसे राज्य ले लेते । तब परशुरामजी ने नाराज होकर ब्राह्मणों को श्राप दिया कि "तुम लोग राज्य पाकर भिक्षुक जीवन ही पसन्द करते हो तो सदा भिक्षुक ही बने रहेंगे रहोगे ।" इक्कीसवीं बार क्षत्रियों का नाश करके परशुरामजी ने अश्वमेध यज्ञ किया और उसमें सारी पृथ्वी कश्यप जी को दान में दे दी । पृथ्वी क्षत्रियों से सर्वथा रहित न हो जाए इस अभिप्राय से कश्यपजी ने उनसे कहा अब यह पृथ्वी हमारी हो चुकी, अब तुम दक्षिण समुद्र की ओर चले जाओ । चूँकि परशुरामजी के पूर्वजों ने भी यह संहार कार्य अनुचित कहकर परशुरामजी को इससे निवृत होने का अनुरोध किया था और कश्यपजी ने भी पृथ्वी छोड़ देने को कहा अतः परशुरामजी दक्षिण समुद्र की ओर ही चले गये । समुद्र ने अपने अन्तर्गत स्थित महेन्द्राचल पर इनको स्थान दिया । परशुरामजी भगवान के आवेशावतार हैं । जब श्री रामवतार हो गया । तब इनके अवतार कार्य की समाप्ति हो गई । मिथिला पुरी में श्रीरामजी द्वारा शम्भू-धनु भङ्ग सुनकर आकाश मार्ग से आये और आकर प्रथम तो धनुष तोड़ने वाले को 'बहुत भांति तिन्ह आंख दिखाये ।' परन्तु अंत में श्रीराम-तत्व को जानकर अपना वैष्णव धनुष भी श्रीराम को सौंपकर पुनः- पुनः प्रणाम करके तपस्या करने के लिए महेंद्राचल पर चले गये ।


श्री परशुराम-अवतार की जय
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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