डोंगरेजी महाराज



श्री डोंगरे जी महाराज

पत्नी के अस्थि-विसर्जन के लिए कर्णफूल मंगलसूत्र बेच दिए ।

डोंगरेजी महाराज भारत वर्ष में कथावाचक के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके हैं। डोंगरेजी महाराज कथा से ही करीब एक अरब रूपये दान कर चुके थे, वही एकमात्र कथावाचक थे जो दान का रूपया आपने पास नही रखते थे और न ही लेते थे। जिस जगह कथा होती थी लाखों रूपये उसी नगर के किसी समाजिक कार्य के लिए दान कर दिया करते थे। अपने अन्तिम प्रवचन गोरखपुर में कैंसर अस्पताल के लिये एक करोड़ रूपये उनके चौपाटी पर जमा हुए थे।

उनकी पत्नी आबू में रहा करती थी, जब उनकी मृत्यु के पश्चात् महाराज श्री को खबर लगी तब वे अस्थियां लेकर गोदावरी में विसर्जित करने मुम्बई के सबसे बड़े सेठ रति भाई पटेल के साथ गये। नासिक में डोंगरेजी ने रति भाई से कहा कि रति मेरे पास तो कुछ है ही नही, और इनका अस्थि विसर्जन की क्रिया पूर्ण करनी है। कुछ तो लगेगा ही क्या करें ? फिर बोले - इसका मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हैं बेचकर जो रूपये मिलेंगे उन्हें अस्थि विसर्जन में लगा देंगे।

इस बात को अपने लोगों को बताते हुए कई बार रोते - रोते रति भाई ने कहा कि जिस समय यह सुना हम जीवित कैसे रह गये, बस हमारा हार्ट फैल नही हुआ। हम आपसे कह नही सकते, कि हमारा क्या हाल था। जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, वह महापुरूष कह रहे थे कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिये पैसे नही हैं और हम खड़े - खड़े सुन रहे थे ? फूट - फूट कर रोने के अलावा एक भी शब्द मुहँ से नही निकल पा रहा था।

धन्य है भारतवर्ष, जहाँ एेसे वैराग्यवान और तपस्वी जन्म लेते हैं।

।।श्री हरिवंश।।

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