गुरु भक्त एकनाथ जी



भक्त एकनाथ जी

एकनाथ एक सच्चे शिष्य थे और जनार्दन स्वामी एक समर्थ गुरु । एकनाथ का अपने गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का भाव था । वे अपने गुरु को अपना सर्वस्व सौंप चुके थे । अगाध श्रद्धाभाव से वे सदा आप्लावित रहते थे । उनकी साँसे केवल अपने गुरु के लिए ही चलती थी । उनका प्रत्येक कर्म केवल अपने गुरु के लिए ही समर्पित होता था । वे स्वयं कुछ भी विचार नहीं करते थे, वरन जो गुरु-आज्ञा होती थी, उसे ही अपने जीवन का उद्देश्य मानकर उस पर चिंतन-मनन करते थे । उनके हृदय का प्रत्त्येक स्पंदन अपने गुरु के लिए ही होता था । इसके बदले में उनके गुरु का भी ऊके प्रति अगाध प्रेम था ।

एक दिन जनार्दन स्वामी ने उनसे कहा- "एकनाथ । तुम्हे कुछ चाहिए तो अवश्य बता देना । मन में कोई इच्छा हो तो भी बता देना ।" एकनाथ ने कहा- "हे गुरुदेव । मुझे कुछ भी नहीं चाहिए और न मेरे मन में कोई इच्छा है । अगर होगी तो भला आपसे कैसे आप से कैसे छिपी रह सकती है । आप तो  मेरे जीवन के सर्वस्व हैं । ऐसी कौन-सी बात हैं, ऐसा कौन सा रहस्य हैं, ऐसा कौन सा गुप्त संस्कार हैं, जो आपको पता न हो ।" जनार्दन स्वामी के अधरों पर एक मुस्कान उभर आई । वे मुस्कुराने लगे और गंभीर हो गए । शिष्य एकनाथ अपने गुरु की इस मुस्कान से परिचित थे । उनको लगा कुछ तो ऐसा है, जो उनके गुरु ने उन्हें ऐसा कहा । इसके पीछे कोई-न-कोई कारण अवश्य होगा - ऐसा उन्होंने सोचा ।

एकनाथ का जीवन विचित्रताओं से भरा था । बचपन से ही उनको गुरु की तलाश थी, जो उन्हें सत्मार्ग की और ले जाएँ । कहा जाता हैं की भानुदास के पुत्र चक्रपाणि अपने समय के प्रकांड विद्वान संत थे । वे विद्वानों का सम्मान करते थे और दिन-दुखियो की सेवा भी अवसर मिलने पर करते रहते थे । उनकी प्रबल इच्छा थी कि किसी महान संत का आगमन उनके घर में हो, जो समाज और मानवता की सेवा करे । चक्रपाणि के पौत्र संत एकनाथ जी का जन्म सन 1533 ई० में मूल नक्षत्र में हुआ था । मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाली संतान माता-पिता के लिए घातक मानी जाती हैं । एकनाथ के जन्म लेने के कुछ ही दिनों के अंतराल में उनके माता-पिता उन्हें छोड़कर सदा के लिए चले गए और वे दादा चक्रपाणि के द्वारा ही पालित-पोषित हुए ।

एकनाथ जन्म से ही भक्तिपथ पर चल पड़े थे । कुछ लोग धरती पर आकर कर्म काटकर तपस्या करके आध्यात्म के पथ पर अग्रसर होते हैं और कुछ लोग ये सब ले कर ही पैदा होते हैं । एकनाथ ऐसे ही थे । बचपन से ही उन्हें श्रेष्ठ जनो का पूर्ण संरक्षण प्राप्त हुआ था, इसलिए उनका स्वाध्याय एवं सत्संग का क्रम चल पड़ा । इनका उनके जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा । उनकी स्मरणशक्ति तीव्र थी, इसलिए जो कुछ भी वे पढ़ते या सुनते थे, उन्हें सब कुछ याद हो जाता था ।

एक बार उनको एक महात्मा ने कहा- "वत्स । जीवन में गुरु का आगमन, शिष्य के जीवन की सबसे बड़ी घटना होती हैं, परंतु गुरु को पहचाना नहीं जा सकता हैं, उन्हें समझा नहीं जा सकता, उन्हें जाना नहीं जा सकता ।" एकनाथ के मन में तीव्र उत्कंठा हुई । उन्होंने पूछा- "हे महात्मन । गुरु को पहचाना नहीं जा सकता हैं, खोजा नहीं जा सकता हैं तो फिर गुरु की प्राप्ति किस विधि से होती है ।" महात्मा ने कहा- वत्स । गुरु जब कृपा करते हैं तो ही शिष्यत्व की घटना घटती है । गुरु की कृपा से ही उनका सानिध्य प्राप्त होता है ।"

एकनाथ बचपन में शिव मंदिर में भगवान् शिव की आराधना करते रहते थे । वे जब बारह वर्ष के हुए तो शिव मंदिर में एक देववाणी सुनाई दी- वत्स । तुम यहाँ से देवगढ़ की और प्रस्थान करो । वहाँ तुम्हे तुम्हारे भावी गुरु के दर्शन होंगे । वे ही तुम्हारे गुरु जनार्दन स्वामी हैं । वे ही तुम्हे विधिवत गुरुदीक्षा देकर तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे । वे ही तुम्हारे जीवन को इस संसार-सागर से मुक्त करेंगे । इस देववाणी को सुनकर एकनाथ एक दिन चुपचाप देवगढ़ के लिए रवाना हो गए । उन्होंने बड़ी ही व्यग्रता से पैदल चलकर उस मार्ग को तय किया । बारह वर्ष के एक बालक के लिए यह अत्यंत दुष्कर कार्य था, परंतु एकनाथ तो जन्मे  ही इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए थे ।



बालक एकनाथ अपने गुरु जनार्दन स्वामी को देखकर भावविभोर हो उठे और उनके चरणों में गिरकर शाष्टांग प्रणाम किया । उनकी आँखे नम हो गईं । वे भावविभोर हो उठे । जनार्दन स्वामी को उन्हें देखते ही पता चल गया कि वे ही एकनाथ हैं । गुरु, शिष्य को अपने ढंग से गढ़ता है । गुरु अपनी तपस्या के अमृत भंडार से शिष्य के चित में जड़ जमाए संस्कारों को गलाने में, उनका परिष्कार करने में अपनी ऊर्जा लगाते है । उसके व्यक्तित्व को गढ़ने में, रूपांतरित करने में उसे विविध प्रकार की कष्टसाध्य प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है । इससे उत्पन्न कष्ट के भार को गुरु स्वयं सहन करता है, केवल कुछ अंश को जितना शिष्य वहन कर सकता है, उसे ही सद्गुरु शिष्य को देते हैं ।

एकनाथ जी ने अपने गुरु की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया । गुरु जनार्दन ने अत्यंत प्रसन्न हो कर उन्हें गुरु दीक्षा प्रदान की । जनार्दन स्वामी जी के गुरु भगवान दत्तात्रेय थे । जो भगवान् के 24 अवतारों में से एक हैं । एकनाथ के मन में अपने दादागुरु भगवान् दत्तात्रेय के दर्शन करने की इच्छा उत्पन्न हुई । उनकी इच्छा भाप कर जनार्दन स्वामी जी ने कहा- "वत्स तुम तैयार हो जाओ । हम लोग देवगिरि के जंगल में चलते हैं । याद रखना यहाँ मेरे गुरु के अलावा और कोई नहीं आ सकता । वे किसी भी रूप में वहाँ आ सकते हैं । वे भयंकर रूप में भी प्रकट हो तो भी भयभीत मत होना । उनकी स्तुति करना ।"

जनार्दन स्वामी एकनाथ जी को लेकर देवगिरि के जंगल में स्थित एक पहाड़ की चोटी पर गए, जहाँ पर एक मनोरम झील थी । वही पर एक पागल जैसा उन्मत्त व्यक्ति, जिसके बाल बिखरे हुए कई कुत्तो के साथ आया । वह अजीब- सी हरकत कर रहा था । उसके साथ एक कुटिया भी थी । वह बोला- "ये अपने साथ किसको ले आया हैं । मना किया था न कि किसी और को साथ में मत लाना । अच्छा इस कटोरी में कुतिया का दूध दुहकर ले आ ।"

जनार्दन स्वामी उनके आदेश का पालन करते हुए कुतिया का दूध दुहकर ले आए । पहले उस पागल ने उसे पीया । फिर उस कटोरी को जनार्दन स्वामी को दे दिया । उन्होंने भी उसे पिया । इसके पश्चात उस पागल ने कहा- "जनार्दन । इस लड़के को  इस कटोरी को दे दो और शेष दूध पीने को कहो, फिर उसे साफ़ करके लाओ, लो कहो ।" जनार्दन स्वामी ने दूध कि कटोरी को एकनाथ को पकड़ा दिया ।

एक पल के लिए तो एकनाथ को अजीब- सा लगा कि कुतिया के जूठे दूध को कैसे पिएँ ? उन्हें तत्क्षण याद आया कि दादा गुरु के अलावा कोई इस और आ ही नहीं सकता है । उन्हें अपने गुरु की बात भी याद आई कि मंत्र, अक्षर नहीं होता और गुरु, इंसान नही होता । गुरु कैसा भी हो सकता है, उसे सामान्य बुद्धि से समझा नहीं जा सकता हैं । वह किसी भी रूप में दिख सकता है । एकनाथ ने प्रेमपूर्वक उस कटोरे को का दूध पिया और झील के जल में प्रक्षालित करके ले आए । उस पागल ने प्रसन्न हो कर उन्हें आशीर्वाद दिया । और अपने वास्तविक रूप में खड़े हो गए । वे ही भगवान् दत्तात्रेय थे । भगवान् दत्तात्रेय प्रसन्न होकर बोले- "वत्स । तुम शुलभंजन पर्वत पर जाकर तपस्या करो । वही तुम्हे तपस्या में सफलता मिलेगी और चित निर्मल होगा ।

एकनाथ भगवान् दत्तात्रेय और गुरु जनार्दन स्वामी को शाष्टांग प्रणाम करके देवगिरि के पास ही स्थित शुलभा पर्वत, जिसे शुलभंजन कहा जाता है, पर पहुँच गए । यह स्थल ऋषि मार्कण्डेय कि तपस्थली रहा है । इस पर्वत पर सूर्यकुंड है । नित्य स्नान करने के बाद वे यहाँ तपस्या करने लगे । तपस्या के दौरान एक साँप आता और उनके शरीर से लिपट जाता था । यही उन्हें भगवान् श्री कृष्ण के दर्शन हुए थे । इस तरह एक शिष्य कि इच्छा पूरी हुई और उनका जीवन भी सफल हुआ । 

जय हो गुरु भक्त एकनाथ जी की

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