श्रीहरि विष्णु के अवतार ( नृसिंह-अवतार ) भाग 4



श्री नृसिंह-अवतार 

जब वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष का वध कर डाला था उसकी माता दिति, उसकी पत्नी भानुमति, उसका भाई हिरण्यकशिपु और समस्त परिवार बड़ा दुःखी था । दैत्येन्द्र  हिरण्यकशिपु ने सबको समझा-बुझाकर शान्त किया, परन्तु स्वयं शान्त नहीं हुआ । हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला धधकने लगी । फिर तो उसने निश्चय किया कि तपस्या करके ऐसी शक्ति प्राप्त की जाय कि त्रिलोकी का राज्य निष्कंटक हो जाय और हम अमर हो जायें । निश्चय कर लेने पर हिरण्यकशिपु ने मन्दराचल की घाटी में जाकर ऐसा घोर तप किया कि जिससे देवलोक भी तप्त हो गये । देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने जाकर उससे अमरत्व छोड़कर अन्य कोई भी मनचाहा वर माँगने को कहा । उसने कहा कि मैं चाहता हूँ कि आप के बनाये  हुए किसी प्राणी से मेरी मृत्यु न हो । भीतर बाहर, दिन में रात में, आपके बनाये हुए प्राणियों के अतिरिक्त और भी किसी जीव के अस्त्र शस्त्र से, पृथ्वी या आकाश में कहीं भी मेरी मृत्यु न हो । युद्ध में कोई भी मेरा सामना न कर सके । मैं समस्त प्राणियों का एकछत्र सम्राट बनूँ  । इन्द्रादि समस्त लोकपालों में जैसी आप की महिमा है वैसी ही मेरी हो । तपस्वियों और योगियों, योगेश्वरों को जो अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त है वही मुझे भी दीजिये । ब्रह्माजी ने 'एवमस्तु' कहकर उसके मांगे वर उसको दिये वह अपनी चतुराई पर बड़ा ही प्रसन्न हुआ कि मैंने ब्रह्मा को भी ठग लिया । उनके न चाहने पर भी मैंने युक्ति से अमरत्व का वरदान ले लिया । यह जीव का स्वभाव है, वह अपनी चतुराई से चतुरानन की कौन कहे भगवान को भी धोखा देने का प्रयास करता है । 

दृष्टान्त-चालाक मियाँ का- मुसलमानों का रोजा का त्यौहार चल रहा था । वे इस त्यौहार में जल नहीं पीते । फलस्वरुप संध्या होते-होते उनके मुख मुरझा जाते हैं । परन्तु एक मुसलमान बड़ा ही प्रसन्न रहता था । लोगों ने जब उससे उसकी प्रसन्नता का कारण पूछा तो उसने कहा मैं पानी पी लेता हूँ परन्तु ऐसा पानी पीता हूँ कि खुदा भी नहीं जानते । बात यह थी कि वह स्नान करते समय डुबकी लगाता तो डूबे डूबे ही जल पी लेता था । भगवान की लीला एक दिन ज्यों ही उसने जल पीने के लिए मुंह खोला तो छोटी सी मछली गले में जाकर फँस गई । खुदा की  कौन कहे, सब लोग जान गये, वैसे ही हिरण्यकशिपु ने भी अपनी समझ से मृत्यु का दरवाजा बंद ही कर लिया था किन्तु भगवान ने जब चाहा तो खोल ही लिया । 

वर प्राप्तकर उसने सम्पूर्ण दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नर गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितृगणों के अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचपति, भूत और प्रेतों के नायक तथा सम्पूर्ण जीवों के स्वामियों को जीतकर अपने वशीभूत कर लिया । इस प्रकार उस विश्वजीत असुर ने अपने पराक्रम से सम्पूर्ण लोकपालों के स्थान छीन लिये, स्वयं इंद्र भवन में रहने लगा । उसने दैत्यों को आज्ञा दी कि आजकल ब्राह्मणों और क्षत्रियों की तादाद बहुत बढ़ गई है । जो लोग तपस्या, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय और दानादि शुभ-कर्म कर रहे हैं, उन सबों को मार डालो । विष्णु की जड़ है द्विजातियों का कर्म-धर्म और वही धर्म का परम आश्रय है । दैत्यों ने जाकर वैसा ही किया । परन्तु जहां त्रैलोक्य मैं इस प्रकार धर्म का नाश किया जा रहा था, वहाँ हिरण्यकशिपु के पुत्रों में प्रह्लादजी जन्म से ही भगवद भक्त थे । पाँच वर्ष की अवस्था में वे अपने पिता को भगवदभक्ति का पाठ सुना रहे थे । अपने शत्रु विष्णु का इसे भक्त जानकर उसने यह निश्चय कर लिया कि यह अपना शत्रु है जो पुत्र रूप से प्रगट हुआ है अतः उसे मार डालने की आज्ञा दी । पर दैत्यों के सब प्रयोग व्यर्थ हुए । तब  हिरण्यकशिपु को बड़ी चिन्ता हुई । उसने उन्हें बड़े-बड़े मतवाले हाथियों से कुचलवाया ।  विषधर सर्पों से डसवाया, कृत्या राक्षसी उत्पन्न कराई कि प्रह्लाद को खा ले । पहाड़ों पर से नीचे गिरवाया । शंबरासुर से अनेको प्रकार की माया का प्रयोग कराया । विष दिलाया । दहकती आग में प्रवेश कराया, समुद्र में डूबाया, इत्यादि । अनेक उपाय मार डालने के किये । पर उनका बाल भी बांका नहीं हुआ गुरु पुत्रों की सलाह से वे वरुणपश से बांधकर रखे जाने लगे कि कहीं भाग ना जाय और गुरु पुत्र इन्हें अर्थ, धर्म और काम की शिक्षा देने लगे । छुट्टी के समय प्रह्लादजी ने समवयस्क असुर बालकों को भगवदभक्ति का स्वरूप बताया, जिसे  सुनकर सब सहपाठी असुर बालक भगवनिष्ठ हो गये । यह देखकर पुरोहित ने जाकर सब हाल हिरण्यकशिपु से कहा । सुनते ही उसका शरीर क्रोध के मारे थर-थर काँपने लगा और उसने प्रह्लादजी को अपने हाथ से मार डालने का निश्चय किया । उन्हें बुलाकर बहुत डांटा,  झिड़का और पूछा कि, तू किसके बल पर मेरी आज्ञा के विरुद्ध काम किया करता हैं ?  

प्रह्लादजी ने उसे सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान भगवान के स्वरुप का उपदेश दिया, वह क्रोध से भरकर बोला-देखूँ वह तेरा जगदीश्वर कहाँ हैं ? अच्छा, क्या-कहा-वह सर्वत्र है तो इस खम्भे में क्यों नहीं दीखता । अच्छा, तुझे इस खंबे में भी दीखता है । मैं अभी तेरा सिर अलग करता हूँ, देखता हूं, तेरा वह हरि तेरी कैसे रक्षा करता है ? वह मेरे सामने आवें तो सही । इत्यादि, कहते-कहते जब वह क्रोध को सँभाल न सका तब सिंहासन पर से खडग लिये कूद पड़ा और प्रह्लादजी के यह कहते ही कि हाँ वह खम्भे में भी हैं उसने बड़े जोर से खम्भे को एक घूँसा  मारा । उसी समय खम्भे से बड़ा भरी शब्द हुआ । घूँसा मारकर वह प्रह्लादजी को मारने के लिये झपटा था परन्तु उस अपूर्व घोर शब्द को सुनकर वह घबड़ाकर देखने लगा कि शब्द करने वाला कौन ? इतने में उसने खम्भे से निकले हुए एक अद्भुत प्राणी को देखा वह सोचने लगा- अहो, यह न तो मनुष्य है न ही सिंह । फिर यह नृसिंह रूप में कौन अलौकिक जीव है । वह इस उधेड़-बुन में लगा ही हुआ था कि उसके बिल्कुल सामने नृसिंह भगवान खड़े हो गये ।

श्री नृसिंह भगवान के उस समय के विकराल स्वरूप का वर्णन श्रीमद्भागवत में इस प्रकार है- 'तपाये हुए सोने के समान पीली आँखें, दाढ़ें बड़ी पैनी, तलवार की तरह लपलपाती हुई छुरे की धार के समान तीखी जीभ, टेढ़ी भौहें, कान निश्चल एवं ऊपर को उठे हुये, फूली हुई नासिका और पर्वत-कन्दरा के समान खुला हुआ मुँह, बड़े ही भयंकर फटे हुये जबड़े, स्वर्ग का स्पर्श करने वाला शरीर, नाटी-मोटी गर्दन, छाती चौड़ी, कमर बहुत पतली, सारे शरीर पर चंद्र  समान चमकीले रोयें, चारों और सैकड़ों भुजाएँ फैली हुई थीं । जिनके बड़े-बड़े नख आयुध का काम देते थे । भगवान उससे बड़ी देर तक खेलवाड़ करते रहे अन्त में सन्ध्या समय उन्होंने बड़े उच्च स्वर से प्रचण्ड भयङ्कर अट्टहास किया जिससे आँखें बन्द हो गई । उसी समय झपटकर भगवान ने उसे पकड़कर राजसभा द्वार की ड्योढ़ी पर ले जाकर अपनी जंघाओ पर गिराकर अपने नखों से उसके पेट को चीरकर उसकी आँतें गले में डाल लीं । उस समय उनकी शोभा हाथी को मारकर गले में आँतों की माला पहने हुए मृगराज की-सी थीं । 

नृसिंहावतार मुल्तान में वैशाख शुक्ल 14 मध्यांह काल में हुआ । यह अवतार सतयुग त्रेता की सन्धि में हुआ था ।

श्री नृसिंह-अवतार कि जय 
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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