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Showing posts from September, 2018

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( कल्कि-अवतार ) भाग 10

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कल्कि अवतार- कलयुग के अंत में जब सत्पुरुषों के घर भी भगवान की कथा में बाधा होंगी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य पाखंडी हो जायेंगे और शूद्र राजा होंगे, यहां तक कि कहीं भी स्वाहा, स्वधा और वषट्कार की ध्वनि नहीं सुनाई पड़ेगी । जब राजा लोग प्राय: लुटेरे हो जायेंगे, तब कलियुग का शासन करने के लिए भगवान बालक रूप में शंभल ग्राम में विष्णुयश के घर में अवतार ग्रहण करेंगे ।
शंभलग्राम ( मुरादाबाद जिला ) में विष्णुयश नाम की एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होंगे । उनका हृदय बड़ा उदार एवं भगवद्भक्ति से पूर्ण होगा । मन के द्वारा चिंतन करते हैं उनके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र- शस्त्र, योद्धा फोन चार्ज उपस्थित हो जायेंगे । 
" परशुराम जी उनको वेद पढ़ावेंगे । शिवजी शस्त्रास्त्रों का संधान सिखावेंगे, साथ ही एक घोड़ा और एक खडग देंगे । तब कल्कि भगवान ब्राह्मणों की सेना साथ लेकर संसार में सर्वत्र फैले हुए  का नाश करेंगे । पापी दुष्टों का नाश करके वे सत्ययुग के प्रवर्तक होंगे । वे ब्राह्मण कुमार बड़े ही बलवान, बुद्धिमान और पराक्रमी होंगे । धर्म के अनुसार विजय प्राप्त करके वे चक्रवर्ती राजा होंगे और इस संपूर्ण जगत को आ…

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( बुद्ध-अवतार ) भाग 9

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श्रीबुद्ध अवतार-
एक बार दैत्यों ने इंद्र से पूछा कि किस काम को करने से हमारा राज्य स्थिर रह सकता है। इंद्र ने शुद्ध भाव से उत्तर दिया कि तुम लोग यज्ञ और वेद विहित आचार करो । तब दैत्यों ने भी यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कर दिया । परन्तु स्वभाव से तमोगुणी होने के कारण उनके सभी धर्म-कर्म, यज्ञ-व्रत, दान तमो बहुल होते थे और उनकी देखा-देखी और लोग भी वैसा ही करने लगे थे। अतः सर्वथा अनाधिकारी, तमोगुणी, देशद्रोही दैत्यों को मोहित कर विहित यज्ञों से विरत करने के लिये द्वापरयुग के अंत में भगवान ने गया में राजा शुद्धोदन की पत्नी माया से बुद्ध अवतार लिया । गौतम गोत्र होने से गौतम नाम ही पड़ा । श्रीमद्भागवतजी में भी श्रीब्रह्माजी ने नारदजी से कहा है कि देवताओं के शत्रु दैत्यगण जब वेदमार्ग का सहारा लेकर वेदमार्ग में स्थित रहकर मय-दानव के बनाये हुए अदृश्य अलक्षित गति वाले पुरों में रहकर लोगों को नष्ट करेंगे तब भगवान उनकी बुद्धि में मोह और लोभ उत्पन्न करने वाला बुद्ध-भेष धारणकर उन्हें कितने ही उपधर्मों का उपदेश करेंगे । 
श्री अक्रूरजी ने भी बुद्धजी को दैत्य-दानव मोहिने विशेषण दिया है । श्रीबुद्धजी का बचपन …

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( कृष्ण-अवतार ) भाग 8

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श्री कृष्णावतार- "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।"


साधु-पुरुषों के परित्राण, दुष्टों के विनाश और धर्म संस्थापना के लिये मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ । अपने इस वचन को पूर्ण चरितार्थ करते हुये अखिल रसामृतसिंधु, षडैश्वर्यवान, सर्वलोक महेश्वर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भाद्रपद की कृष्णाष्टमी की अर्धरात्रि को कंस कारागार में परम अद्भुत चतुर्भुज नारायण रूप में प्रकट हुये । वात्सल्य भाव- भावित ह्रदया माता देवकी की प्रार्थना पर भक्त-वत्सल भगवान ने प्राकृत शिशु का-सा रूप धारण कर लिया । श्री वसुदेवजी भगवान की आज्ञानुसार शिशु रूप भगवान को नन्दालय में श्रीयशोदा के पास सुलाकर बदले में यशोदात्मजा जगदम्बा महामाया को ले आये । गोकुल में नन्दबाबा के घर ही जात कर्मादि महोत्सव मनाये गये । भगवान श्रीकृष्ण की जन्म से ही सभी लीलायें अद्भुत और अलौकिक हैं । पालने में झूल रहे थे उसी समय लोकबालघ्नी रुधिराशना पिशाचिनी पूतना की प्राणों को दूध के साथ पी लिया । शकट भंग किया । तृणावर्त, बकासुर एवं वत्सासुर को पीस डाला । सपरिवार धेनुकासुर और प्रलम्बासुर को मार ड…

श्रीहरि विष्णु के अवतार ( राम-अवतार ) भाग 7

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श्री राम अवतार

जब जब होइ धरम कै हानी । बाढैं असुर अधम अभिमानी ।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ।।
तब तब प्रभु धरी बिबिध शरीरा । हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा ।।

असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज श्रुति सेतु ।
जग बिस्तारहिं विसद जस, राम जनम कर हेतु ।।
तुम सारिखे सन्त प्रिय मोरे । धरौं देह नहिं आन निहोरे ।।

अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार अकारण करुण, करुणावरुणालय भक्तवत्सल भगवान श्रीरामचंद्रजी चार रूप धारण करके श्रीअयोध्यापति चक्रवर्ती महाराजाधिराज, श्रीदशरथजी के पुत्र रूप में चैत्र शुक्ल 9 रामनवमी को अवतीर्ण हुए । महारानी श्रीकौशल्याजी की कुक्षि से श्रीराम, श्रीकैकेयीजी की कुक्षि से श्रीभरत, और श्रीसुमित्राजी की कुक्षि से श्रीलक्ष्मण और शत्रुघ्न प्रगट होकर-
बाल चरित हरि बहु बिधि कीन्हा । अति अनन्द दासन्ह कहँ दीन्हा ।।
परम मनोहर चरित अपारा । करत फिरत चारिउ सुकूमारा ।।

कबहुँ ससि माँगत आरि करैं, कबहुँ प्रतिबिम्ब निहारी डरैं ।
कबहुँ कर ताल बजाई कै, नाचत मातु सबै मन मौद भरै ।।
कबहुँ रिसिआइ कहैं हठि कै, पुनि लेत सोई, जेहिं लागि अरैं ।
अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी मन मंदिर में बिहरैं…