श्रीहरि विष्णु के अवतार ( राम-अवतार ) भाग 7



श्री राम अवतार

जब जब होइ धरम कै हानी । बाढैं असुर अधम अभिमानी ।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ।।
तब तब प्रभु धरी बिबिध शरीरा । हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा ।।

असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज श्रुति सेतु ।
जग बिस्तारहिं विसद जस, राम जनम कर हेतु ।।
तुम सारिखे सन्त प्रिय मोरे । धरौं देह नहिं आन निहोरे ।।

अपनी इस प्रतिज्ञा के अनुसार अकारण करुण, करुणावरुणालय भक्तवत्सल भगवान श्रीरामचंद्रजी चार रूप धारण करके श्रीअयोध्यापति चक्रवर्ती महाराजाधिराज, श्रीदशरथजी के पुत्र रूप में चैत्र शुक्ल 9 रामनवमी को अवतीर्ण हुए । महारानी श्रीकौशल्याजी की कुक्षि से श्रीराम, श्रीकैकेयीजी की कुक्षि से श्रीभरत, और श्रीसुमित्राजी की कुक्षि से श्रीलक्ष्मण और शत्रुघ्न प्रगट होकर-

बाल चरित हरि बहु बिधि कीन्हा । अति अनन्द दासन्ह कहँ दीन्हा ।।
परम मनोहर चरित अपारा । करत फिरत चारिउ सुकूमारा ।।

कबहुँ ससि माँगत आरि करैं, कबहुँ प्रतिबिम्ब निहारी डरैं ।
कबहुँ कर ताल बजाई कै, नाचत मातु सबै मन मौद भरै ।।
कबहुँ रिसिआइ कहैं हठि कै, पुनि लेत सोई, जेहिं लागि अरैं ।
अवधेस के बालक चारि सदा, तुलसी मन मंदिर में बिहरैं ।।
 
यथा समय जात कर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, यज्ञोपवीतादि संस्कार सानन्द संपन्न हुये । पश्चात- गुरु गृह पढ़न गये रघुराई । अलप काल विद्या सब आई ।। इस प्रकार विविध विनोद करते हुए श्रीराम किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं और ' जेहि बिधि सुखी होंहिं पूर लोगा । करहिं कृपा निधि सोइ संजोगा ।....।। आयसु मांगी करहिं पुर काजा । देखि चरित हरषहिं मन राजा ।।" इसी हर्षोल्लास के बीच श्रीविश्वामित्रजी आते हैं और श्री दशरथजी महाराज से अपने यज्ञ रक्षणार्थ श्रीरामजी एवं श्रीलक्ष्मणजी को मांग ले जाते हैं । यज्ञ में विघ्न डालने वाले ताडुका, मारीच, सुबाहु आदि असंख्यों राक्षसों का सहज ही श्रीराम और लक्ष्मण ने वध कर डाला ताडुका यज्ञ निर्विघ्नं समाप्त हुआ । फिर श्रीविश्वामित्रजी के साथ जनकपुर में श्रीसीताजी का स्वयंवर देखने की निमित्त जाकर, विशाल शम्भू -धनु, जिसे त्रैलोक्य के भटमानी वीर डिगा भी न सके थे, उसे श्रीराम ने मध्य से ऐसे तोड़ डाला जैसे मतवाला हाथी कमलनाल को तोड़ डालता है परिणाम स्वरुप ' महि पाताल नाक जस व्यापा । राम बरी सिय चापा। धनुर्भङ्गोपरान्त श्रीपरशुरामजी का आगमन हुआ, जो प्रारंभ में तो निश्चय ही रङ्ग में भङ्ग-सा प्रतीत हुआ परन्तु  परिणाम महामङ्गलकारी रहा । श्री राम के अचिन्त्यानन्त ऐश्वर्य को जानकर श्रीपरशुरामजी ' कहि जय जय जय रघुकुल केतु । भृगुपति गये बनहिं तप हेतु ।' पश्चात यह शुभ समाचार श्रीअयोध्या भेजा गया और श्रीदशरथजी आये तो बारात लेकर श्री राम के ब्याह के लिए, परन्तु  ब्याह हो गया चारों राजकुमारों का । कुछ काल मिथिलापुर वासियों को आनन्द देकर- भाइन्ह सहित बिआहि घर आये रघुकुल चन्द ।' श्रीअयोध्या के आनन्द का ठिकाना नहीं हैं । यथा-

दोहा -   मंगल मोद उछाह नित, जाहिं दिवस यहि भाँति ।
         उमगी अवध अनन्द भरि, अधिक अधिक अधिकाति ।।

विवाह के बारह वर्ष बाद तेरहवें वर्ष के प्रवेश में, श्रीदशरथजी महाराज ने उत्तम गुणों से युक्त और सत्य पराक्रम वाले सद्गगुणशाली अपने प्रियतम, जेष्ठ पुत्र श्रीराम को, जो प्रजा के हित में संलग्न रहने वाले थे, प्रजावर्ग का हित करने की इच्छा से प्रेमवश युवराज पद पर अभिषिक्त करना चाहा । तदनन्तर श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ देखकर रानी कैकेयी ने जिसे पहले ही वर दिया जा चुका था । देवमाया से मोहित होकर, मंथरा से उकसाई जाकर, राजा से यह वर माँगा कि श्रीराम का निर्वासन ( वनवास ) और भरत का राज्याभिषेक हो । कैकेयी का प्रिय करने के लिये, पिता की आज्ञा के अनुसार उनकी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए वीर श्रीराम वन को चले । विदेहवंश वैजयन्ती, मिथिलेश राजनन्दिनी श्रीराम प्रिया श्रीजानकी एवं श्रीसुमित्रानन्दन लक्ष्मण भी प्रेमवश प्रभु के साथ चल दिये । उस समय पिता श्रीदशरथजी ने अपना सारथि भेजकर एवं पुरवासियों ने स्वयं साथ जाकर दूर तक उनका अनुसरण किया । फिर श्रृङ्गबेरपुर मैं गंङ्गा तट पर अपने प्रिय सखा निषादराज गृह के पास पहुँच कर धर्मात्मा  श्रीराम ने सारथि ( सुमन्तजी ) को अयोध्या के लिए विदा कर दिया । निषादराज गृह, लक्ष्मण और सीता के साथ श्रीराम मार्ग में बहुत जल वाली अनेकों नदियों को पार करके, एक वन से दूसरे वन को गये । महर्षि भरद्वाजजी का दर्शन कर गृह को वापिस कर महर्षि वाल्मीकिजी का दर्शन किया और उनकी आज्ञा से, चित्रकूट पहुँचकर वहाँ वे तीनों देवता और गंधर्वों के समान वन में नाना प्रकार की लीलायें करते हुए एक रमणीय पर्णकुटी बनाकर उसमें सानन्द रहने लगे ।

पुत्र शोक में श्रीदशरथजी के स्वर्ग गमन के पश्चात श्रीवशिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणों द्वारा राज्य संचालन के लिए नियुक्त किए जाने पर भी महाबलशाली वीर भरत ने राज्य की कामना न करके, पूज्य श्रीराम को प्रसन्न करने के लिए वन को ही प्रस्थान किया और वहाँ पहुँचकर जेष्ठ भ्राता श्रीराम से यों प्रार्थना किये- धर्मज्ञ ! आप ही राजा हो । परन्तु महान यशस्वी श्रीराम ने भी पिता के आदेश का पालन करते हुए राज्य की अभिलाषा न की और भरताग्रज ने राज्य के लिए न्यास ( चिन्ह ) रूप में अपनी खड़ाऊँ भरत को देकर उन्हें बार-बार आग्रह करके लौटा दिया । श्रीभरत ने श्रीराम के चरणों का स्पर्श किया और श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए वे नन्दीग्राम में रहकर राज्य कार्य सँभालने लगे । श्रीभरत के लौट जाने पर सत्य प्रतिज्ञ श्रीराम ने, वहाँ पर नागरिकों का पुनः आना-जाना देखकर उनसे बचने के लिए दंडकारण्य में प्रवेश किया । उस महान वन में पहुँचने पर महावीर श्रीराम ने विराध नामक राक्षस को मारकर श्रीशरभङ्ग सुतीक्ष्ण, अगस्त्य आदि मुनियों का दर्शन किया । श्रीराम ने  दंडकारण्यवासी अग्नि के समान तेजस्वी उन ऋषियों को राक्षसों का सँहार करने का वचन दिया और संग्राम में उनके वध की प्रतिज्ञा की ।

इसके पश्चात वहाँ रहते हुए श्रीराम ने इच्छानुसार रूप बनाने वाली जनस्थान निवासिनी सूर्पणखा नाम की राक्षसी को लक्ष्मण के द्वारा उसके नाक कान कटाकर कुरूप कर दिया । पश्चात सूर्पणखा के द्वारा प्रेरित होकर चढ़ाई करने वाले खर, दूषण,त्रिशिरादि चौदह हजार राक्षसों को श्रीराम ने युद्ध में मार डाला । तदनन्तर राक्षसेन्द्र रावण ने प्रतिशोध की भावना से मारीच की सहायता से श्री जानकीजी का अपहरण कर लिया और श्रीजानकी जी को लेकर जाते समय मार्ग में विघ्न डालने के कारण से श्रीजटायुजी को आहत कर दिया । पितृवत पूज्य जटायु के द्वारा श्री राम को श्रीजानकीजी का पता मिला तब वे अपनी गोद में प्राण त्यागे हुए श्रीजटायुजी का अग्नि-संस्कार कर वन में श्रीसीताजी को ढूँढते हुए उन्होंने कबन्ध नामक राक्षस को देखा । तो उसे भी तत्काल मारकर शुभगति प्रदान किया । कबन्ध के द्वारा संकेत पाकर श्रीराम परम भागवती शबरीजी के यहाँ गये । उसने इनका पूजन किया । श्रीराम ने शबरी का मातृवत् सम्मान किया । उत्तम गति प्रदान की । फिर शबरी के संकेतानुसार श्रीहनुमानजी से मिलकर सुग्रीवजी से मित्रता किये और सुग्रीव के कथनानुसार संग्राम में बाली को मारकर उसके राज्य श्रीराम ने सुग्रीव को ही बिठा दिया ।

तब उन वानर राज सुग्रीव ने सभी वानरों को बुलाकर श्री जानकी जी का पता लगाने के लिए भेजा । संपाती नामक गृध्र के पता बताने पर महा बलवान श्रीहनुमानजी सौ योजन विस्तार वाले क्षीरसमुद्र को कूदकर लांघ गये । वहां रावण पालित लंङ्गापुरी में पहुँचकर उन्होंने अशोक-वाटिका में श्रीसीताजी को चिंता मग्न देखा । तब उन विदेह-नन्दिनी को पहचान ( मुद्रिका ) देकर श्रीराम का सन्देश सुनाया और उन्हें सांत्वना देकर उन्होंने वाटिका का विध्वंस कर डाला और अक्षय कुमारादि असंख्य राक्षसों का संहार कर डाला, इसके बाद में वे जान-बूझकर पकड़ में आ गये । श्रीब्रह्माजी के वरदान से अपने को ब्रह्मपास में छूटा हुआ जानकर भी वीर हनुमानजी ने अपने को बांधने वाले उन राक्षसों का अपराध स्वेच्छानुसार सह लिया । तत्पश्चात मिथिलेश कुमारी सीता की स्थान के अतिरिक्त समस्त लंङ्गा को जलाकर महाकपि  श्रीहनुमानजी, श्रीराम को प्रिय सन्देश सुनाने के लिए लंङ्गा से लौट आये और श्रीरामजी की प्रदक्षिणाकर श्रीजानकीजी का पता बताया । इसके अनन्तर असंख्य वानर सेना को साथ लेकर श्रीराम ने महासागर के तट पर सूर्य के समान तेजस्वी बाणों से समुद्र को क्षुब्ध किया । तब नदीपति समुद्र ने अपने को प्रकट कर दिया, फिर समुद्र के ही कहने से श्रीराम ने नल, नील से पुल निर्माण कराया । उसी पुल से लंङ्गापुरी में जाकर रावण को सदल-बल मारकर श्रीजानकीजी को प्राप्त किया ।

पश्चात चूँकि श्रीराम को बड़ी लज्जा हुई अतः भरी सभा में श्रीसीता के प्रति मर्मभेदी वचन कहने लगे । उनकी इस बात को न सह सकने के कारण साध्वी सीता ने अपनी अग्नि परीक्षा दी । इसके बाद अग्नि के कहने से श्रीराम ने सीता को निष्कलङ्ग माना । महात्मा श्रीरामचंद्र के इस कर्म से देवता ऋषियों सहित चराचर त्रिभुवन संतुष्ट हो गया । फिर सभी देवताओं से पूजित होकर श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए और राक्षसराज विभीषणजी को लंङ्गा के राज्य पर अभिषिक्त करके तथा स्वयं देवताओं से वर पाकर और मरे हुए वानरों को जीवन दिलाकर अपने सभी साथियों के साथ पुष्पक विमान पर चढ़कर अयोध्या के लिए प्रस्थित हुए । भरद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुंचकर सबको आराम देने वाले सत्य पराक्रमी श्रीराम ने भरत के पास हनुमानजी को भेजा, पुनः श्री हनुमानजी से श्रीअवध का समाचार पाकर भरद्वाज आश्रम से अयोध्या के लिए प्रस्थित हुये ।  श्री अयोध्या पहुंचकर श्री अवधवासियों के उमड़ते हुए अनुराग को देखकर  " अमित रूप प्रगटे तेहि काला । यथा जोग मिले सबहिं कृपाला ।।" पश्चात श्रीवशिष्ठजी के आदेशानुसार शुभ घड़ी में श्रीरामभद्रजू राज्य सिंहासनासीन हुए । श्रीरामजी के सिंहासन पर बैठते ही त्रैलोक्य परम आनन्दित हो गया । यथा- " राम राज बैठे त्रैलोका हरषित भए गये सब सोका।"

श्री परशुराम-अवतार की जय
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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