श्रीहरि विष्णु के अवतार ( बुद्ध-अवतार ) भाग 9



श्रीबुद्ध अवतार- 

एक बार दैत्यों ने इंद्र से पूछा कि किस काम को करने से हमारा राज्य स्थिर रह सकता है। इंद्र ने शुद्ध भाव से उत्तर दिया कि तुम लोग यज्ञ और वेद विहित आचार करो । तब दैत्यों ने भी यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कर दिया । परन्तु स्वभाव से तमोगुणी होने के कारण उनके सभी धर्म-कर्म, यज्ञ-व्रत, दान तमो बहुल होते थे और उनकी देखा-देखी और लोग भी वैसा ही करने लगे थे। अतः सर्वथा अनाधिकारी, तमोगुणी, देशद्रोही दैत्यों को मोहित कर विहित यज्ञों से विरत करने के लिये द्वापरयुग के अंत में भगवान ने गया में राजा शुद्धोदन की पत्नी माया से बुद्ध अवतार लिया । गौतम गोत्र होने से गौतम नाम ही पड़ा । श्रीमद्भागवतजी में भी श्रीब्रह्माजी ने नारदजी से कहा है कि देवताओं के शत्रु दैत्यगण जब वेदमार्ग का सहारा लेकर वेदमार्ग में स्थित रहकर मय-दानव के बनाये हुए अदृश्य अलक्षित गति वाले पुरों में रहकर लोगों को नष्ट करेंगे तब भगवान उनकी बुद्धि में मोह और लोभ उत्पन्न करने वाला बुद्ध-भेष धारणकर उन्हें कितने ही उपधर्मों का उपदेश करेंगे । 

श्री अक्रूरजी ने भी बुद्धजी को दैत्य-दानव मोहिने विशेषण दिया है । श्रीबुद्धजी का बचपन का नाम सिद्धार्थ था । ये स्वभाव से बड़े दयावान  थे । किसी का भी किंचित मात्र भी दुःख देख लेते तो विह्वल हो जाते । यही कारण है कि उनके पिता राजा शुद्धोदन की ओर से राज्य में ऐसी व्यवस्था थी कि कोई दुःखमय प्रसङ्ग इनके दृष्टिपथ में न आने पाये। परन्तु यह सब होने पर भी दैवयोग से एक दिन सहसा एक रुग्ण पुरुष को, कुछ ही दिन बाद एक अत्यंत वृद्ध पुरुष को, पश्चात एक मृतक को देखकर इनकी आत्मा सिहर उठी और उसी दिन से ये जगत से उदास हो  गये । 

इनकी यह उदासीनता माता-पिता को खली और इन्हें जगत प्रपंच में फँसाने के लिए अत्यन्त रूपवती यशोधरा नाम की कन्या से विवाह कर दिया और समय पर सिद्धार्थ के राहुल नाम का एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ । परन्तु उदासीनता मिटी नहीं बल्कि बढ़ती ही गई । परिणाम स्वरुप अपनी प्रिय पत्नी यशोधरा, नवजात पुत्र राहुल, स्नेह मूर्ति पिता महाराज शुद्धोदन तथा वैभव संपन्न राज्य इन सब को ठुकराकर युवावस्था में ही  गौतम घर से निकल पड़े । केवल तर्कपूर्ण बौद्धिक ज्ञान उन्हें संतुष्ट करने में समर्थ नहीं था । उन्हें तो रोग पर, बुढ़ापे पर और मृत्यु पर विजय पाने थी । उन्हें शाश्वत जीवन अमृत अभीष्ट था । प्रख्यात विद्वानों, उद्भट शास्त्रज्ञों के समीप भी गये   किन्तुं वहाँ उनको संतोष नहीं हुआ । आश्रमों से विद्वानों से निराश होकर वे गया के समीप वन में आये और तपस्या करने लगे । जाड़ा, गर्मी और वर्षा में भी बुद्धजी वृक्ष के नीचे अपनी वेदिका पर स्थिर बैठे रहे । सब प्रकार का आहार बन्द कर दिया था । दीर्घकालीन तपस्या के कारण उनके शरीर का मांस पर रक्त सूख गया, केवल हड्डियां नशे और चर्म ही शेष रहा । गौतम का धैर्य अविचल था । कष्ट क्या है इसे वे अनुभव ही नहीं करते थे । किन्तु उन्हें अपना अभीष्ट प्राप्त नहीं हो रहा था । सिद्धियां मंडराती, परन्तु एक सच्चे साधक, सच्चे मुमुक्षु के लिए सिद्धियां बाधक है अतः गौतम ने उन पर दृष्टिपात ही नहीं किया ।

एक दिन जहां गौतम तपस्या कर रहे थे उस स्थान के समीप के मार्ग से कुछ स्त्रियां गाते-बजाते निकलीं । व्हिच गौतम की तपोभूमि के पास पहुँचीं । तब एक गीत गा रही थीं । जिसका आशय था " सितार के तारों को ढीला मत छोड़ो नहीं तो वे बेसुरे  हो जायेंगे परन्तु उन्हें इतना खींचो भी मत की वे टूट जायें " गौतम के कानों में वह संगीत ध्वनि पड़ी । उनकी प्रज्ञा में सहसा प्रकाश आ गया- 'साधना के लिए केवल कठिन तपस्या ही उपयुक्त नहीं है, संयमित भोजन एवं नियमित निद्रादि व्यवहार भी आवश्यक है । इस प्रकार सम्यक बोध प्राप्त कर लेने पर गौतम का नाम 'गौतम बुद्ध' पड़ा। तत्वज्ञान होने के बाद भगवान बुद्ध वाराणसी चले आये अपना सर्वप्रथम उपदेश 'सारनाथ' में दिया । 

उपदेश- सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य, नृत्य गानादि त्याग, सुगंध माला त्याग, असमय भोजन त्याग, कोमल शय्या त्याग, कामिनी-कंचन का त्याग, ये दस सूत्र आपने दुःख उन्मूलन एवं निर्वाण प्राप्ति में परमोपयोगी बताये हैं ।

धमर्मं  शरणं गच्छामि, बुद्धं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि
यह बुद्धजी का शरणागति मंत्र है ।

श्री गौतम बुद्ध के अंदर अद्भुत शांति, सहनशीलता और जीवों के प्रति दया थी । एक बार भरद्वाज नाम का एक ब्राह्मण भगवान बुद्ध से दीक्षा लेकर भिक्षु हो गया । उसका एक सम्बन्धी इससे अत्यंत क्षुब्ध होकर बुद्धजी के समीप पहुँचा और उन्हें अपशब्द कहने लगा । बुद्धदेव देव तो  देवी ठहरे देवता के समान ही वे शांत और मौन बने रहे । ब्राह्मण अंततः अकेला कहां तक गाली देता । वह थक कर चुप हो गया । अब बुद्ध जी ने पूछा क्यों भाई ! तुम्हारे घर कभी अतिथि आते हैं ? ब्राह्मण ने उत्तर दिया- "आते तो हैं ।" बुधदेवजी ने पूछा, " तुम उनका सत्कार करते हो ।" ब्राह्मण खीझकर बोला " अतिथि का सत्कार कौन मूर्ख नहीं करेगा ।" बुद्धजी बोले, " मान लो कि तुम्हारी अर्पित वस्तुएँ अतिथि स्वीकार न करें, तू वे कहां जायेंगी ।" ब्राह्मण ने फिर झुंझलाकर कहा, " वी जायेंगी कहाँ, अतिथि उन्हें नहीं लेगा तो वह मेरे पास आ जायेंगी ।" बुद्ध ने शांति से कहा- तुम्हारी दी हुई क्या बात गालियाँ मैं स्वीकार नहीं करता अब यह गालियाँ कहाँ जायेंगी ? " किसके पास रहेंगी ? " ब्राह्मण का मस्तक लज्जा से झुक गया । उसने भगवान बुद्ध से क्षमा माँगी ।

भगवान बुद्ध का एक पूर्ण नामक शिष्य उनके समीप एक दिन आया और उसने तथागत से धर्मोपदेश करके 'सुनापरान्त' प्रान्त में धर्म प्रचार के लिए जाने की आज्ञा मांगी । तथागत ने कहा- 'प्रांत के लोग तो अत्यंत कठोर तथा बहुत क्रूर हैं । वह तुम्हें गाली देंगे, तुम्हारी निन्दा करेंगे, तो तुम्हें कैसा लगेगा ? पूर्ण बोले- भगवन ! मैं समझूंगा कि वे लोग बहुत बड़े लोग हैं, क्योंकि वह हमें थप्पड़ घुसे तो नहीं मारते ।' बुद्ध बोले- 'यदि वे तुम्हें थप्पड़ और घूँसे मारने लगे तो ? पूर्ण बोले- 'मुझे पत्थर डंडों से तो नहीं पीटते, इससे मैं सत्पुरुष मानूँगा ।' बुद्ध बोले- 'वे पत्थर- डंडों से भी पीट सकते हैं ।' पूर्ण बोले- 'वे शस्त्र-प्रहार तो नहीं करते, इससे वे दयालु हैं- ऐसा मानूँगा ।' बुद्ध बोले - 'यदि वे शस्त्र-प्रहार करें ?' पूर्ण बोले- 'मुझे वे मार नहीं डालते, इससे मुझे उनकी कृपा दिखेगी ।' बुद्ध बोले- 'ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वे तुम्हारा वध नहीं करेंगे ।' पूर्ण बोले- भगवन् ! यह संसार दुःख रूप है । यह शरीर रोगों का घर है । आत्मघात पाप है, इसलिए जीवन धारण करना पड़ता है । यदि 'सुनापरान्त ( सीमा प्रान्त ) के लोग मुझे मार डाले तो मुझ पर वे उपकार ही करेंगे । वे लोग बहुत अच्छे सिद्ध होंगे ।' भगवान बुद्ध प्रसन्न होकर बोले- पूर्ण !' जो किसी दशा में किसी को भी दोषी नहीं देखता, वही सच्चा साधु है । तुम अब चाहे जहाँ जा सकते हो, धर्म सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करेगा ।' 

बुद्ध जी की अद्भुत उपदेश शैली- गौतमी का प्यारा इकलौता पुत्र मर गया । उसको बहुत बड़ा शौक हुआ । वह पगली-सी हो गयी और पुत्र की लाश को छाती से चिपकाकर 'कोई दवा दो' 'कोई मेरे बच्चे को अच्छा कर दो' एवं प्रकारेण चिल्लाती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी । लोगों ने बहुत समझाया, परंतु उसकी समझ में कुछ नहीं आया । उसकी बड़ी दयनीय स्थिति देखकर एक सज्जन ने उसे भगवान बुद्ध के पास यह कहकर भेज दिया कि- 'तुम सामने कि बिहार में भगवान के पास जा कर दवा माँगो, वह निश्चय ही तुम्हारा दुख मिटा देंगे ।' गौतमी दौड़ी हुई गयी और बच्चे को जलाने के लिए भगवान बुद्ध से रो-रो कर प्रार्थना करने लगी । भगवान ने कहा- बड़ा अच्छा किया, तुम यहाँ आ गयीं । बच्चे को मैं वापस जिंदा कर दूंगा । तुम जाकर जिसके घर में कोई भी आज तक मरा नहीं हो, उससे कुछ सरसों के दाने मांग लावो ।' गौतमी बच्चे की लाश को छाती से चिपकाए दौड़ी और लोगों से सरसों के दाने माँगने लगीं, जब किसी ने देना चाहा, तब उसने कहा- 'तुम्हारे घर में आज तक कोई मरा तो नहीं है न ? मुझे उसी से सरसों लेनी है जिसके घर में कोई मरा नहीं हूं उसकी इस बात को सुनकर घरवालों ने कहा- 'भला ऐसा भी कोई घर होगा जिसमे कोई आज तक मरा नहीं हो ।' मनुष्य तो हर घर में मरते ही हैं । वह घर-घर फिरी पर सभी जगह एक ही जवाब मिला । तब उसकी समझ में आया कि मरना तो हर घर का रिवाज है । जो जन्मता है, वह मरता भी है । मृत्यु किसी भी उपाय से टलती नहीं । टलती होती तो क्यों कोई अपने प्यारे को मरने देता ? एक घर में ही नहीं जगत भर में सभी जगह मृत्यु का विस्तार है । बस जब यह बात ठीक-ठीक समझ में आ गयी तब उसने बच्चे की लाश को ले जाकर श्मशान में गाड़ दिया और लौटकर भगवान बुद्ध से सारी बात कह दी । भगवान ने उसे फिर समझाया कि देखो- यहाँ जो जन्म 'लेता है उसे मरना पड़ेगा । यह निश्चय है   । जैसे हमारे घर के मरते हैं, वैसे हम भी मर जायेंगे । इसलिए मृत्यु का शोक न करके उस स्थिति की चिंता करनी चाहिए, जिसमें पहुँच जाने पर जन्म ही न हो । जन्म में होगा तो मृत्यु आप ही मिट जायेगी । बस समझदार आदमी को यही करना चाहिये ।' 


श्री बुद्ध-अवतार की जय
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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