श्रीहरि विष्णु के अवतार ( कृष्ण-अवतार ) भाग 8



श्री कृष्णावतार- "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।"


साधु-पुरुषों के परित्राण, दुष्टों के विनाश और धर्म संस्थापना के लिये मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ । अपने इस वचन को पूर्ण चरितार्थ करते हुये अखिल रसामृतसिंधु, षडैश्वर्यवान, सर्वलोक महेश्वर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भाद्रपद की कृष्णाष्टमी की अर्धरात्रि को कंस कारागार में परम अद्भुत चतुर्भुज नारायण रूप में प्रकट हुये । वात्सल्य भाव- भावित ह्रदया माता देवकी की प्रार्थना पर भक्त-वत्सल भगवान ने प्राकृत शिशु का-सा रूप धारण कर लिया । श्री वसुदेवजी भगवान की आज्ञानुसार शिशु रूप भगवान को नन्दालय में श्रीयशोदा के पास सुलाकर बदले में यशोदात्मजा जगदम्बा महामाया को ले आये । गोकुल में नन्दबाबा के घर ही जात कर्मादि महोत्सव मनाये गये । भगवान श्रीकृष्ण की जन्म से ही सभी लीलायें अद्भुत और अलौकिक हैं । पालने में झूल रहे थे उसी समय लोकबालघ्नी रुधिराशना पिशाचिनी पूतना की प्राणों को दूध के साथ पी लिया । शकट भंग किया । तृणावर्त, बकासुर एवं वत्सासुर को पीस डाला । सपरिवार धेनुकासुर और प्रलम्बासुर को मार डाला । दावानल से घिरे गोपों की रक्षा की । कालिय नाग का दमन किया । श्री नन्दबाबा को अजगर से छुड़ाया । इसके बाद गोपियों ने भगवान को पतिरूप से प्राप्त करने के लिए व्रत किया और भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया । भगवान ने यज्ञ पत्नियों पर कृपा की । गोवर्द्धन- धारण की लीला करने पर इंद्र और कामधेनु ने आकर भगवान का यज्ञाभिषेक किया । शरद ऋतु की रात्रियों में ब्रज सुंदरियों के साथ रास क्रीडा की । दुष्ट शंखचूड़, अरिष्ट और केशी का वध किया । 

तदनन्तर अक्रूरजी मथुरा से वृंदावन आये और उनके साथ भगवान श्रीकृष्ण कथा बलराम जी ने मथुरा के लिए प्रस्थान किया । श्रीराम और श्याम ने मथुरा में जाकर वहाँ की सजावट देखी कुवलयापीड़ हाथी, मुष्टिक चाणूर एवं कंस आदि का संहार किया । सान्दीपनि गुरु के यहाँ विद्याध्यन करके उनके मृत-पुत्रों को लौटा लाये । जिस समय भगवान श्रीकृष्ण मथुरा में निवास कर रहे थे उस समय उन्होंने उद्धव और बलरामजी के साथ यदुवंशियों का सब प्रकार से प्रिय और हित किया । जरासंध कई बार बड़ी बड़ी सेनायें लेकर आया और भगवान ने उनका उद्धार करके पृथ्वी का भार हल्का किया । कालयवन को मुचुकुन्द से भस्म करा दिया । द्वारकापुरी बसाकर रातों-रात सबको वहां पहुंचा दिया । स्वर्ग से कल्पवृक्ष एवं सुधर्मा सभा ले आये । भगवान ने दल के दल शत्रुओं को युद्ध में पराजित करके श्रीरुक्मिणी  का हरण किया । बाणासुर के साथ युद्ध के प्रसङ्ग में महादेवजी पर ऐसा बाण छोड़ा कि जंभाई लेने लगे और इधर बाणासुर की भुजायें काट डालीं । प्राग्ज्योतिषपुर के राजा भौमासुर को मारकर सोलह हजार कन्यायें ग्रहण कीं । शिशुपाल, पौण्ड्रक, शाल्व, दुष्ट दंतवक्त्र, शम्बरासुर,द्विविद, पीठ, मुर, पञ्चजन आदि दैत्यों के बल पुरुष को चूर्ण कर उनका वध किये । महाभारत युद्ध में पाण्डवों को निमित्त बनाकर पृथ्वी का बहुत बड़ा भार उतार दिया और अन्त में ब्राह्मणों के शाप के बहाने यदुवंश संहार किया । श्रीउद्धवजी की जिज्ञासा पर संपूर्ण आत्मज्ञान और धर्म निर्णय का निरूपण किया । इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की अनन्त अद्भुत अलौकिक लीलायें हैं । जो जगत के प्राणियों को पवित्र करने वाली है ।

श्रीकृष्ण-अवतार द्वापर में श्रीवसुदेवजी की पत्नी देवकी के गर्भ से भाद्रपद कृष्ण-अष्ठमी को मथुरा में कंस के कारागार में हुआ था । 

मीन रूप से वेदों का उद्धार करने वाले, कच्छप रूप से ब्रह्मांड को धारण करने वाले, वराह रूप से पृथ्वी को धारण करने वाले, नृसिंह रूप से हिरण्यकशिपु दैत्य के नाशक, वामन रूप से बलि को छलने वाले, परशुराम रूप से क्षत्रियों के नाशकर्ता, रामरूप से रावण को जीतने वाले, बलदेव रूप से हल को धारण करने वाले बुद्धरुप से अत्यंत दयाशील और कल्कि रूप से मलेच्छों के नाशक, इस प्रकार दशावतारी हे श्री कृष्ण ! आपको नमस्कार है।

श्री कृष्ण-अवतार की जय
गोस्वामी नाभाजी कृत "श्री भक्तमाल" से प्रेरित

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