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Showing posts from October, 2018

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 8

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संत रैदासजी का चरणाश्रय ( क्रमशः आगे )

' कब हुआ तेरा विवाह ? हमने न देखा, न सुना । कब पीठी ( हल्दी ) चढ़ी, कब बारात आयी, कब विवाह-विदाई हुई ? कन्यादान ही किसने किया ? यह बाबोसा ने ही तुझे सिर चढ़ाया है, अन्यथा तो अब तक ससुराल जाकर जूनी ( पुरानी ) हो जाती ।'

' यदि आपको लगता है कि विवाह नहीं हुआ तो अभी कर दीजिये । न वर को कहीं से आना है ना कन्या को । दोनों आपके सम्मुख हैं । दूसरी तैयारी ये लोग कर देंगी ।'- उसने अपनी सखियों की ओर देखा । दो जनी जाकर पुरोहित जी और कुंवरसा को बुला लायेंगी- मीरा ने कहा ।

' हे भगवान ! अब मैं क्या करूँ ? रनिवास में सब मुझे दोषी ठहराते हैं कि बेटी को समझाती नहीं और यहाँ यह हाल है कि सिर फोड़कर कर मर जाओ, तब भी इस लड़की के मस्तिष्क में एक बात नहीं घुसती । मेरी तो दोनों और मौत है ।'

' आज गुरु पूर्णिमा है भाबू ! आज यह सब बातें रहने दीजिये न ! मेरे गुरुदेव पधारेंगे आज ।'

' यह क्या नयी बात सुन रही हूँ ? तेरे और कौन से गुरु पधारने वाले हैं ? वे बिहारीदासजी या वे हाथ-पैर तोड़ने मरोड़ने और समाधि वाले निवृत्तिनाथजी ?

' ऐसा मत कहिये मा…

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 7

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संत रैदासजी का चरणाश्रय ( क्रमशः आगे )

' गुरु होना आवश्यक तो है ना बाबोसा ?' 
' आवश्यकता होने पर अवश्य ही आवश्यक है । यों तो तुम्हारे गिरधर स्वयं जगदगुरु हैं । गुरु शिक्षा ही तो देते हैं, शिक्षा जहां से भी मिले, ले लो ।' 
' मन्त्र ?' 
उसके इस छोटे से प्रश्न पर दूदाजी हँस दिये- ' भगवान का प्रत्येक नाम मंत्र है बेटी ! उनका नाम उनसे भी अधिक शक्तिशाली है, यही तो अब तक सुनते आये हैं ।' 
' वह कानों को ही प्रिय लगता है बाबोसा ! आंखें तो प्यासी ही रह जाती हैं ।'- अनायास ही मीरा के मुख से निकल पड़ा, पर बात का मर्म समझ में आते ही सकुचा करके उसने दूदाजी की और पीठ फेर ली । 
' उसमें इतनी शक्ति है बेटी ! कि आंखों की प्यास बुझाने वाले को भी खींच लाये ।'- उसकी पीठ की ओर देखते हुए मुस्कुराकर दूदाजी ने कहा । 
' जाऊँ बाबोसा ?'- मीरा ने पीट फेरे हुए ही पूछा । 
' जाओ बेटी !' 
' जीजा ने यह क्या कहा बाबोसा ? और लाज काहे की आई उनको ?' 
' वह तुम्हारे क्षेत्र की बात नहीं है बेटा ! बात इतनी ही है कि भगवान के नाम में भगवान से भी अधिक शक्…

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 6

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वृन्दावन बिहारी के नाम सन्देश


श्री कृष्ण-जन्मोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात बाबा बिहारीदासजी ने वृन्दावन जाने की इच्छा प्रकट की । भारी मन से दूदाजी ने स्वीकृति दी । यह बात मंगला ने आकर मीरा को बतायी । सुनकर ऐसा लगा मानो किसी ने काँटा चुभा दिया हो । ठाकुरजी की ओर देखकर बोली- 'अपने निजजनो-प्रेमीजनों के बीच निवास दो गोपाल ! तुम्हारी चर्चा और उनके अनुभव सुनने से प्राणों की ज्वाला ठंडी होती है । अब अच्छा नहीं लगता यह सब, मुझे.... ले.... चलो.... प्रिय !' 
मंगला सिर झुकाये सुनती रही । उसी समय मिथुला ने आकर बताया कि बाबा बिहारीदासजी बाईसा की वर्षगाँठ तक रुकने के लिए राजी हो गये हैं । मीरा उठकर बाबा के पास चली । मंगला ने आगे आकर सूचना दी । मीरा ने कक्ष में जाकर उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया- ' बाबा आप पधार रहे हैं ?' उसने भरे गले से पूछा । 
' हाँ बेटी ! वृद्ध हुआ अब तेरा यह बाबा । अंतिम समय तक वृन्दावन में श्री राधामाधव के चरणों में ही रहना चाहता हूँ ।' 
' बाबा ! मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे भी.... ।' -मीरा ने दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर  रोते हुए कह…

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 5

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मीरा - एक प्रेम कथा


श्री कृष्ण जनमोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात बाबा बिहारी दास जी ने वृन्दावन जाने की इच्छा प्रकट की ।भारी मन से दूदाजी ने स्वीकृति दी ।मीरा को जब मिथुला ने बाबा के जाने के बारे में बताया तो उसका मन उदास हो गया ।वह बाबा के कक्ष में जाकर उनके चरणों में प्रणाम कर रोते रोते बोली,"बाबा आप पधार रहें है।"
"हाँ बेटी ! वृद्ध हुआ अब तेरा यह बाबा। अंतिम समय तक वृन्दावन में श्री राधामाधव के चरणों में ही रहना चाहता हूँ।" "बाबा ! मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मुझे भी अपने साथ वृन्दावन ले चलिए न बाबा ।" मीरा ने दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर सुबकते हुए कहा ।
"श्री राधे! श्री राधे! बिहारी दास जी कुछ बोल नहीं पाये ।उनकी आँखों से भी अश्रुपात होने लगा ।कुछ देर पश्चात उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ फेरते हुये कहा -" हम सब स्वतन्त्र नहीं है पुत्री ।वे जब जैसा रखना चाहे...... उनकी इच्छा में ही प्रसन्न रहे ।भगवत्प्रेरणा से ही मैं इधर आया ।सोचा भी नहीं था कि शिष्या के रूप में  तुम जैसा रत्न पा जाऊँगा ।तुम्हारी शिक्षा में तो मैं निमित्त मात्र रहा ।तुम्हारी…

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 4

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मीरा - एक प्रेम कथा

मीरा ने विनय संकोचवश अपने नेत्र झुका लिये। प्रणाम करने के लिये उठती हुई मीरा को बाबा बिहारीदासजी ने हाथ बढ़ाकर रोक दिया तो उसने बैठे-बैठे ही हाथ जोड़कर सिर झुकाया। उसने फिर से तानपुरा उठाया ।अबकि मीरा ने ठाकुर जी की करूणा का बखान करते हुये पद गाया।
सुण लीजो बिनती मोरी मैं सरण गही प्रभु तोरी। तुम तो पतित अनेक उधारे भवसागर से तारे। मैं सबका तो नाम न जाणू कोई कोई नाम उचारे अंबरीष, सुदामा, नामा तुम पहुँचाये निज धामा। ध्रुव जो पाँच बरस के बालक तुम दरस दिये घनश्यामा धना भगत का खेत जमाया कबीरा का बैल चराया। सबरी का झूठा फल खाया तुम काज किये मनभाया सदना और सेना नाई को तुम लीन्हा अपनाई। करमा की खिचड़ी खाई तुम गणिका पार लगाई मीरा प्रभु तुम्हरे रंग राती या जानत सब दुनियाई
'एक और।'- बाबा बिहारीदासजी ने उमंग में भर कर कहा। मीरा ने आंखें बंद कर ली। अंगूठीयों से विभूषित उँगलियाँ तारों पर तैर रही थीं।
दूदाजीे नेत्र मूँदकर एकाग्र होकर श्रवण कर रहे थे। भजन पूरा होने पर उन्होंने आँखे खोली। हर्ष- प्रशंसा भरी दृष्टि से मीरा की ओर देखा- 'आज मेरा जीवन धन्य हो गया बेटा! धन्य कर दिया…

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 3

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मीरा - एक प्रेम कथा


राव दूदाजी अपनी दस वर्ष की पौत्री की बातें सुनकर चकित रह गये। उनसे कुछ क्षण बोला ना गया। 
'आप कुछ तो कहिये बाबोसा! मेरा जी घबराता है। किस से पूछू यह सब? भाबू ने ऐसी बात कही और अब क्यों उस पर पानी फेर रही है? जो नहीं हो सकता, उसका क्या उपाय? अब मैं क्या करूँ? अच्छा बाबोसा! आप ही बताइए क्या तीनों लोकों के धनी (स्वामी) से भी मेवाड़ का राजकुँवर बड़ा है? यदि है तो होने दो, मुझे नहीं चाहिये।' 
'तू रो मत बेटा! धैर्य धर।' उन्होंने दुपट्टे के छोर से मीरा का मुंह पोंछा- 'तू चिंता मत कर। मैं सभी से कह दूँगा कि मेरे जीते जी मीरा का विवाह नहीं होगा। तेरा वर गिरधर गोपाल है और वही रहेंगे, किंतु मेरी लाडली! मैं बूढ़ा हूँ। कितने दिन का मेहमान हूँ? मेरी मरने के पश्चात भी यदि ये लोग तेरा ब्याह कर दे तो तू घबराना मत। सच्चा पति तो मन का ही होता है। तन का पति भले कोई बने, मन का पति ही पति है। प्राणी मात्र का धणी है, अन्तर्यामी है वह। मन की बात उससे छुपी तो नहीं है बेटा! तुम निश्चिंत रह।' 
'सच फरमा रहे हैं बाबोसा?'  'सर्व साँची बेटा!' 
'तो फिर …

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 2

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मीरा - एक प्रेम कथा

महल के परकोटे में लगी फुलवारी के मध्य गिरधर गोपाल के लिए मन्दिर बन कर दो महीनों में तैयार हो गया। धूमधाम से गिरधर-गोपाल का गृह प्रवेश और विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा हुईं। मन्दिर का नाम रखा गया "श्याम कुन्ज"। अब मीरा का अधिकतर समय श्याम कुन्ज में ही बीतने लगा।
ऐसे ही धीरे-धीरे समय बीतने लगा। मीरा पूजा करने के पश्चात् भी श्याम कुन्ज में ही बैठे बैठे..........  सुनी और पढ़ी हुई लीलाओं के चिन्तन में प्रायः खो जाती।
वर्षा के दिन थे। चारों ओर हरितिमा छायी हुई थीं। ऊपर गगन में मेघ उमड़ घुमड़ कर आ रहे थे। आँखें मूँदे हुये मीरा गिरधर के सम्मुख बैठी है। बन्द नयनों के समक्ष उमड़ती हुई यमुना के तट पर मीरा हाथ से भरी हुई मटकी को थामें बैठी है। यमुना के जल में श्याम सुंदर की परछाई देख वह पलक झपकाना भूल गई। यह रूप-ये-कारे कजरारे दीर्घ नेत्र ..........। मटकी हाथ से छूट गई और उसके साथ न जाने वह भी कैसे जल में जा गिरी। उसे लगा कोई जल में कूद गया और फिर दो सशक्त भुजाओं ने उसे ऊपर उठा लिया और घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मुस्कुरा दिया। वह यह निर्णय नहीं कर पाई कि कौन अधिक मारक ह…

Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 1

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भारत के एक प्रांत राज्यस्थान का क्षेत्र है मारवाड़ -जो अपने वासियों की शूरता, उदारता, सरलता और भक्ति के लिये प्रसिद्ध रहा है। मारवाड़ के शासक राव दूदा सिंह बड़े प्रतापी हुए। उनके चौथे पुत्र रत्नसिंह जी और उनकी पत्नी वीर कुंवरी जी के यहां मीरा का जन्म संवत 1561 (1504 ई०) में हुआ। राव दूदा जी जैसे तलवार के धनी थे, वैसे ही वृद्धावस्था में उनमें भक्ति छलकी पड़ती थी।पुष्कर आने वाले अधिकांश संत मेड़ता आमंत्रित होते और सम्पूर्ण राजपरिवार सत्संग -सागर में अवगाहन कर धन्य हो जाता।
मीरा का लालन पालन दूदा जी की देख रेख में होने लगा। मीरा की सौंदर्य सुषमा अनुपम थी ।मीरा के भक्ति संस्कारों को दूदा जी पोषण दे रहे थे। वर्ष भर की मीरा ने कितने ही छोटे छोटे कीर्तन दूदा जी से सीख लिए थे। किसी भी संत के पधारने पर मीरा दूदा जी की प्रेरणा से उन्हें अपनी तोतली भाषा में भजन सुनाती और उनका आशीर्वाद पाती। अपने बाबोसा की गोद में बैठकर शांत मन से संतो से कथा वार्ता सुनती।
दूदा जी की भक्ति की छत्रछाया में धीरे धीरे मीरा पाँच वर्ष की हुई। एक बार ऐसे ही मीरा राजमहल में ठहरे एक संत के समीप प्रातःकाल जा पहुँची। वे उ…