Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 4



मीरा - एक प्रेम कथा

मीरा ने विनय संकोचवश अपने नेत्र झुका लिये। प्रणाम करने के लिये उठती हुई मीरा को बाबा बिहारीदासजी ने हाथ बढ़ाकर रोक दिया तो उसने बैठे-बैठे ही हाथ जोड़कर सिर झुकाया। उसने फिर से तानपुरा उठाया ।अबकि मीरा ने ठाकुर जी की करूणा का बखान करते हुये पद गाया।

सुण लीजो बिनती मोरी मैं सरण गही प्रभु तोरी।
तुम तो पतित अनेक उधारे भवसागर से तारे।
मैं सबका तो नाम न जाणू कोई कोई नाम उचारे 
अंबरीष, सुदामा, नामा तुम पहुँचाये निज धामा।
ध्रुव जो पाँच बरस के बालक तुम दरस दिये घनश्यामा
धना भगत का खेत जमाया कबीरा का बैल चराया।
सबरी का झूठा फल खाया तुम काज किये मनभाया
सदना और सेना नाई को तुम लीन्हा अपनाई।
करमा की खिचड़ी खाई तुम गणिका पार लगाई
मीरा प्रभु तुम्हरे रंग राती या जानत सब दुनियाई

'एक और।'- बाबा बिहारीदासजी ने उमंग में भर कर कहा।
मीरा ने आंखें बंद कर ली। अंगूठीयों से विभूषित उँगलियाँ तारों पर तैर रही थीं।

दूदाजीे नेत्र मूँदकर एकाग्र होकर श्रवण कर रहे थे। भजन पूरा होने पर उन्होंने आँखे खोली। हर्ष- प्रशंसा भरी दृष्टि से मीरा की ओर देखा- 'आज मेरा जीवन धन्य हो गया बेटा! धन्य कर दिया तूने इस मेड़तिया वंश को ऑल इन अपने पिता पितृव्यों को।' उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखते हुए सामने सोम में भावेश में बैठे अपने वीर पुत्रों की ओर संकेत करके अश्रु विगलित स्वर में कहा- 'इनकी प्रचण्ड वीरता और देश प्रेम को कदाचित लोग भूल जायें, पर तेरी भक्ति और तेरा नाम अमर रहेगा बेटा.... अमर रहेगा।' उनकी आंखें छलक पड़ीं।

'यह आप क्या फरमाते हैं बाबोसा! मैं तो आप की छोरु (बच्ची) हूँ। जो कुछ है, वह तो सब आपका ही है और रहा संगीत, यह बाबा का प्रसाद है।'- मीरा ने बाबा बिहारी दास की ओर देखकर हाथ जोड़े।

थोड़ा रुक कर वह बोली- 'अब मैं जाऊँ बाबा!'

'जाओ बेटी! श्री किशोरी जी तुम्हारा मनोरथ सफल करें!'- मीराजी के प्रणाम करने पर भरे कंठ से बाबा बिहारी दास ने आशीर्वाद दिया।

सभी को प्रणाम कर वे अपनी सखियों दासियों के साथ श्यामकुंज चल दी। श्यामकुंज में श्रृंगार और भोग की सभी सामग्री पहले से ही प्रस्तुति थी। उसने अपने गिरधर गोपाल का आकर्षक सिंगार किया। यद्यपि बाबा बिहारीदासजी का आशीर्वाद पाकर बहुत प्रसन्न थी, फिर भी रह-रह करके मन आशंकित हो उठता था- 'कौन जाने, प्रभु इस दासी को भूल तो न गये होंगे? किन्तु नहीं, वे विश्वम्भर है, उनको सबकी खबर है, पहचान है। आज अवश्य पधारेंगे अपनी इस चरणाश्रिता को अपनाने। इसकी बाँह पकड़कर भावसागर में डूबती हुई को ऊपर उठाकर....।'

आगे की कल्पना उसकी आनन्दानुभूति में खो जाती। कोई सखी- दासी सचेत करती और उसके हाथ चलने लगते। उसकी सहयोगिनियाँ श्यामकुंज को बंदनवार, फूल-मालाओं से और बहुमूल्य पर्दों से सजा रही थीं। उन्हें श्री कृष्ण जन्म के पूर्व का सारा कार्य समझा करके उसने तानपुरा उठाया-

आय मिलो मोहिं प्रीतम प्यारे।
हमको छाँड़ भये क्यूँ न्यारे॥
बहुत दिनों से बाट निहारूँ।
तेरे ऊपर तन मन वारूँ॥
तुम दरसन की मो मन माहीं।
आय मिलो किरपा कर साई॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर।
आय दरस द्यो सुख के सागर॥

आंखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी। सखियाँ इसे धीरज देने के लिए कीर्तन करने लगीं-

ब्रज जीवन नंद लाल, पीत वसन पुष्प माल।
मोर मुकुट तिलक भाल, जय जय लोचन विशाल

कुछ समय बाद में फिर गाने लगी, चम्पा ने मृदंग और मिथुला ने मँजीरे सँभाल लिये-

जोहने गुपाल करूँ ऐसी आवत मन में।
अवलोकत बारिज वदन बिबस भई तन में॥
मुरली कर लकुट लेऊँ पीत वसन धारूँ।
पंखी गोप भेष मुकुट गोधन सँग चारूँ॥
हम भई गुल काम लता वृन्दावन रैना।
पसु पंछी मरकट मुनि श्रवण सुनत बैना॥
गुरूजन कठिन कानिं कासों री कहिये।
मीरा प्रभु गिरधर मिली ऐसे ही रहिये॥

उसकी आंखें मूँद गयीं। निमीलित पलकों तले लीला-सृष्टि विस्तार पाने लगी- वे गोप सखा के वेश में आँखों पर पट्टी बांधे श्यामसुन्दर को ढूँढ़ रही है। उसके हाथ में कभी वृक्ष का तना, कभी झाड़ी के पत्ते और कभी गाय का मुख आ जाता है। वह थक गयी, व्याकुल होकर पुकार उठी- 'कहाँ हो गोविंद! आह, मैं नहीं ढूँढ़ पा रही हूँ। श्यामसुन्दर! कहाँ हो.... कहाँ हो....?'

तभी गढ़ पर से तोप छुटी। चारभुजानाथ के मन्दिर के नगाड़े, शंख, शहनाई एक साथ बज उठे। समवेत स्वरों में उठती जय ध्वनि ने दिशाओं को गुंजा दिया- चारभुजानाथ की जय! गिरधारीलाल की जय! गढ़बोर पति की जय! बोल छोगाला छैल की जय!'

उसी समय मेरा ने देखा- जैसे सूर्य-चंद्र भूमि पर उतर आए हों, उस महा प्रकाश के मध्य शांत ज्योतिस्वरूप मोर मुकुट पीताम्बर धारण किये सौन्दर्य-सुषमा-सागर श्यामसुन्दर खड़ी मुस्कुरा रहे हैं। उनकी वह हृदय को मथ देने वाली दृष्टि, कोमल अरुण अधर-पल्लव, बीच में तनिक उठी हुई सुघड़ नासिका, वह स्पृहा- केन्द्र विशाल वक्ष, पीन प्रलम्ब भुजाएँ, कदली खंभ-सी पीताम्बर परिवेष्ठित जंघाएँ, जानु शोभाखान पिंडलियाँ और नुपुर मंडित चारु चरण। एक दृष्टि में जो देखा जा सका.... फिर तो दृष्टि तीखी धार कटार सी उन नेत्रों में उलझ कर रह गयी। क्या हुआ? क्या देखा? कितना समय लगा? कौन जाने? समय तो बेचारा प्रभु और उनके प्रेमियों के मिलन के समय प्राण लेकर भाग छुटता है, अन्यथा अपनी उपस्थिति का ज्ञान कराने के अपराध में कहीं अपना अस्तित्व ही खतरे में ना पड़ जाय, यह आशंका उसे चैन नहीं लेने देती, अतः प्रभु-प्रेम पान के लिये वह प्रेमी की चरण-रज में अपने को विलीन करके ही शांति पाता है। दाहिने हाथ की वंशी बायें हाथ में लेकर श्यामसुन्दर ने अपना दायाँ हाथ मीरा की ओर बढ़ाया, उसका हाथ थाम तनिक अपनी और खींचा। वह तो अनायास ही प्राणहीन पुत्तलिका की भाँती उनके वक्ष पर आ गिरी।

'इतनी व्याकुलता क्यों; क्या मैं कहीं दूर था?'- उसके मस्तक पर टिका कर उन्होंने स्नेहसिक्त स्वर में पूछा।

प्रातः मूर्छा टूटने पर मीरा ने देखा की सखियाँ उसे घेरकर के कीर्तन कर रही हैं। उसने तानपुरा उठाया। सखियाँ उसे सचेत हुई जानकर प्रसन्न हुई। कीर्तन बंद करके वे भजन सुनने लगीं-

म्हाँरा ओलगिया घर आया जी ।
तन की ताप मिटी सुख पाया, हिलमिल मंगल गाया जी ॥1॥
घन की धुनि सुनि मोर मगन भया, यूँ मेरे आनन्द छाया जी ।
मगन भई मिल प्रभु अपणा सूँ , भौं का दरद मिटाया जी ॥2॥
चंद को निरख कुमुदणि फूलै, हरिख भई मेरी काया जी ।
रग रग सीतल भई मेरी सजनी, हरि मेरे महल सिघाया जी ॥3॥
सब भक्तन का कारज कीन्हा, सोई प्रभु मैं पाया जी ।
मीरा बिरहणि सीतल भई, दुख द्वदं दूर नसाया जी ॥4॥

इस प्रकार आनन्द-ही-आनन्द में अरुणोदय हो गया। दासियाँ उठकर उसे नित्यकर्म के लिये ले चलीं।

मीरा चरित्र से प्रेरित

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