Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 2



मीरा - एक प्रेम कथा

महल के परकोटे में लगी फुलवारी के मध्य गिरधर गोपाल के लिए मन्दिर बन कर दो महीनों में तैयार हो गया। धूमधाम से गिरधर-गोपाल का गृह प्रवेश और विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा हुईं। मन्दिर का नाम रखा गया "श्याम कुन्ज"। अब मीरा का अधिकतर समय श्याम कुन्ज में ही बीतने लगा।

ऐसे ही धीरे-धीरे समय बीतने लगा। मीरा पूजा करने के पश्चात् भी श्याम कुन्ज में ही बैठे बैठे..........  सुनी और पढ़ी हुई लीलाओं के चिन्तन में प्रायः खो जाती।

वर्षा के दिन थे। चारों ओर हरितिमा छायी हुई थीं। ऊपर गगन में मेघ उमड़ घुमड़ कर आ रहे थे। आँखें मूँदे हुये मीरा गिरधर के सम्मुख बैठी है। बन्द नयनों के समक्ष उमड़ती हुई यमुना के तट पर मीरा हाथ से भरी हुई मटकी को थामें बैठी है। यमुना के जल में श्याम सुंदर की परछाई देख वह पलक झपकाना भूल गई। यह रूप-ये-कारे कजरारे दीर्घ नेत्र ..........। मटकी हाथ से छूट गई और उसके साथ न जाने वह भी कैसे जल में जा गिरी। उसे लगा कोई जल में कूद गया और फिर दो सशक्त भुजाओं ने उसे ऊपर उठा लिया और घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मुस्कुरा दिया। वह यह निर्णय नहीं कर पाई कि कौन अधिक मारक है - दृष्टि याँ मुस्कान? निर्णय हो भी कैसे? बुद्धि तो लोप हो गई, लज्जा ने देह को जड़ कर दिया और मन -? मन तो बैरी बन उनकी आँखों में जा समाया था।

उसे शिला के सहारे घाट पर बिठाकर वह मुस्कुराते हुए जल से उसका घड़ा निकाल लाये। हंसते हुये अपनत्व से कितने ही प्रश्न पूछ डाले उन्होंने ब्रज भाषा में। अमृत सी वाणी वातावरण में रस सी घोलती प्रतीत हुईं ।
      
"थोड़ा विश्राम कर ले, फिर मैं तेरो घड़ो उठवाय दूँगो। का नाम है री तेरो? बोलेगी नाय? मो पै रूठी है क्या? भूख लगी है का तोहे? तेरी मैया ने कछु खवायो नाय? ले, मो पै फल है। खावेगी ?"
उन्होंने फट से बड़ा सा अमरूद और थोड़े जामुन निकाल कर मेरे हाथ पर धर दिये - "ले खा ।"
    
मैं क्या कहती, आँखों से दो आँसू ढुलक पड़े। लज्जा ने जैसे वाणी को बाँध लिया था।
  
"कहा नाम है तेरो ?"

"मी............रा" बहुत खींच कर बस इतना ही कह पाई।
वे खिलखिला कर हँस पड़े।" कितना मधुर स्वर है तेरो री।"

"श्याम सुंदर! कहाँ गये प्राणाधार! "वह एकाएक चीख उठी। समीप ही फुलवारी से चम्पा और चमेली दौड़ी आई और देखा मीरा अतिशय व्याकुल थीं और आँखों से आँसू झर रहे थे। दोनों ने मिल कर शैय्या बिछाई और उस पर मीरा को यतन कर सुला दिया।

सांयकाल तक जाकर मीरा की स्थिति कुछ सुधरी तो वह तानपुरा ले गिरधर के सामने जा बैठी ।फिर ह्रदय के उदगार प्रथम बार पद के रूप में प्रसरित हो उठे ............

मेहा बरसबों करे रे ,
आज तो रमैया म्हाँरे घरे रे ।
नान्हीं नान्हीं बूंद मेघघन बरसे,
सूखा सरवर भरे रे ॥

घणा दिनाँ सूँ प्रीतम पायो,
बिछुड़न को मोहि डर रे ।
मीरा कहे अति नेह जुड़ाओ,
मैं लियो पुरबलो वर रे ॥

पद पूरा हुआ तो मीरा का ह्रदय भी जैसे कुछ हल्का हो गया। पथ पाकर जैसे जल दौड़ पड़ता है वैसे ही मीरा की भाव सरिता भी शब्दों में ढलकर पदों के रूप में उद्धाम बह निकली।

मीरा अभी भी तानपुरा ले गिरधर के सम्मुख श्याम कुन्ज में ही बैठी थी। वह दीर्घ कज़रारे नेत्र, वह मुस्कान, उनके विग्रह की मदमाती सुगन्ध और वह रसमय वाणी सब मीरा के स्मृति पटल पर बार बार उजागर हो रही थी।


मेरे नयना निपट बंक छवि अटके।
देखत रूप मदनमोहन को 
पियत पीयूख न भटके।
बारिज भवाँ अलक टेढ़ी मनो अति सुगन्ध रस अटके॥
टेढ़ी कटि टेढ़ी कर मुरली टेढ़ी पाग लर लटके ।
मीरा प्रभु के रूप लुभानी गिरधर नागर नटके ॥

मीरा को प्रसन्न देखकर मिथुला समीप आई और घुटनों के बल बैठकर धीमे स्वर में बोली - " जीमण पधराऊँ बाईसा ( भोजन लाऊँ  )? "

"अहा मिथुला! अभी थोड़ा ठहर जा"। मीरा के ह्रदय पर वही छवि बार बार उबर आती थी। फिर उसकी उंगलियों के स्पर्श से तानपुरे के तार झंकृत हो उठे.........

नन्दनन्दन दिठ (दिख) पड़िया माई,
साँ.......वरो........ साँ......वरो ।
नन्दनन्दन दिठ पड़िया माई ,
छाड़या सब लोक लाज,
साँ......वरो ......... साँ......वरो

मोरचन्द्र का किरीट, मुकुट जब सुहाई ।
केसररो तिलक भाल, लोचन सुखदाई ।
साँ......वरो .....साँ....वरो ।

कुण्डल झलकाँ कपोल, अलका लहराई,
मीरा तज सरवर जोऊ,मकर मिलन धाई ।
साँ......वरो ....... साँ......वरो ।

नटवर प्रभु वेश धरिया, रूप जग लुभाई,
गिरधर प्रभु अंग अंग, मीरा बलि जाई।
साँ......वरो  .......  साँ......वरो  ।

"अरी मिथुला, थोड़ा ठहर जा। अभी प्रभु को रिझा लेने दे। कौन जाने ये परम स्वतन्त्र हैं .....कब भाग निकले? आज प्रभु आयें हैं तो यहीं क्यों न रख लें?"

मीरा जैसे धन्यातिधन्य हो उठी। लीला चिन्तन के द्वार खुल गये और अनुभव की अभिव्यक्ति के भी। दिन पर दिन उसके भजन पूजन का चाव बढ़ने लगा। वह नाना भाँति से गिरधर का श्रृगांर करती कभी फूलों से और कभी मोतियों से। सुन्दर पोशाकें बना धारण कराती। भाँति-भाँति के भोग बना कर ठाकुर को अर्पण करती और पद गाकर नृत्य कर उन्हें रिझाती। शीत काल में उठ-उठ कर उन्हें ओढ़ाती और गर्मियों में रात को जागकर पंखा झलती। तीसरे-चौथे दिन ही कोई न कोई उत्सव होता।

मीरा की भक्ति और भजन में बढ़ती रूचि देखकर रनिवास में चिन्ता व्याप्त होने लगी। एक दिन वीरमदेव जी (मीरा के सबसे बड़े काका ) को उनकी पत्नी श्री गिरिजा जी ने कहा, "मीरा दस वर्ष की हो गई है, इसकी सगाई - सम्बन्ध की चिन्ता नहीं करते आप?"
        
वीरमदेव जी बोले, "चिन्ता तो होती है पर मीरा का व्यक्तित्व, प्रतिभा और रूचि असधारण है-फिर बाबोसा मीरा के ब्याह के बारे में कैसा सोचते है- पूछना पड़ेगा।"
      
"बेटी की रूचि साधारण हो याँ असधारण - पर विवाह तो करना ही पड़ेगा" बड़ी माँ ने कहा।

"पर मीरा के योग्य कोई पात्र ध्यान में हो तो ही मैं अन्नदाता हुक्म से बात करूँ।"
          
"एक पात्र तो मेरे ध्यान में है। मेवाड़ के महाराज कुँवर और मेरे भतीजे भोजराज।"
        
"क्या कहती हो, हँसी तो नहीं कर रही? अगर ऐसा हो जाये तो हमारी बेटी के भाग्य खुल जाये। वैसे मीरा है भी उसी घर के योग्य।" प्रसन्न हो वीरमदेव जी ने कहा।

गिरिजा जी ने अपनी तरफ़ से पूर्ण प्रयत्न करने का आश्वासन दिया।

मीरा की सगाई की बात मेवाड़ के महाराज कुंवर से होने की चर्चा रनिवास में चलने लगी। मीरा ने भी सुना। वह पत्थर की मूर्ति की तरह स्थिर हो गई थोड़ी देर तक। वह सोचने लगी- माँ ने ही बताया था कि तेरा वर ( पति ) गिरधर गोपाल है- और अब माँ ही मेवाड़  के राजकुमार के नाम से इतनी प्रसन्न है, तब किससे पूछुँ? "वह धीमे कदमों से दूदाजी के महल की ओर चल पड़ी।

पलंग पर बैठे दूदाजी जप कर रहे थे। मीरा को यूँ अप्रसन्न सा देख बोले, "क्या बात है बेटा?"
        
"बाबोसा! एक लड़की के कितने बींद ( पति ) होते है?"
    
दूदाजी ने स्नेह से मीरा के सिर पर हाथ रखा और हँस कर बोले, "क्यों पूछती हो बेटी! वैसे एक बेटी के एक ही बींद होता है। एक बींद के बहुत सी बीनणियाँ ( पत्नी ) तो हो सकती है पर किसी भी तरह एक कन्या के एक से अधिक वर नहीं होते। पर क्यों ऐसा पूछ रही हो?"

"बाबोसा! एक दिन मैंने बारात देख माँ से पूछा था कि मेरा बींद कौन है? उन्होंने कहा कि तेरा बींद गिरधर गोपाल है। और आज...... आज......।" उसने हिलकियों के साथ रोते हुए अपनी बात पूरी करते हुये कहा- आज भीतर सब मुझे मेवाड़ के राजकुवंर को ब्याहने की बात कर रहे है।"
        
दूदाजी ने अपनी लाडली को चुप कराते हुए कहा- "तूने भाबू से पूछा नहीं?"
        
"पूछा! तो वह कहती है कि-" वह तो तुझे बहलाने के लिए कहा था। पीतल की मूरत भी कभी किसी का पति होती है? अरी बड़ी माँ के पैर पूज। यदि मेवाड़ की राजरानी बन गई तो भाग्य खुल गया समझ। आप ही बताईये बाबोसा! मेरे गिरधर क्या केवल पीतल की मूरत है? संत ने कहा था न कि यह श्रीविग्रह ( मूर्ति ) भगवान की प्रतीक है। प्रतीक वैसे ही तो नहीं बन जाता? कोई हो, तो ही उसका प्रतीक बनाया जा सकता है। जैसे आपका चित्र कागज़ भले हो, पर उसे कोई भी देखते ही कह देगा कि यह दूदाजी राठौड़ है। आप है, तभी तो आपका चित्र बना है। यदि गिरधर नहीं है तो फिर उनका प्रतीक कैसा?"

"भाबू कहती है-" भगवान को किसने देखा है? कहाँ है? कैसे है? मैं कहती हूँ बाबोसा वो कहीं भी हों, कैसे भी हो, पर हैं, तभी तो मूरत बनी है, चित्र बनते है। ये शास्त्र, ये संत सब झूठे है क्या? इतनी बड़ी उम्र में आप क्यों राज्य का भार बड़े कुंवरसा पर छोड़कर माला फेरते है? क्यों मन्दिर पधारते है? क्यों सत्संग करते है? क्यों लोग अपने प्रियजनों को छोड़ कर उनको पाने के लिए साधु हो जाते है? बताईये न बाबोसा -"मीरा ने रोते रोते कहा।

मीरा चरित्र से प्रेरित


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