Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 3



मीरा - एक प्रेम कथा


राव दूदाजी अपनी दस वर्ष की पौत्री की बातें सुनकर चकित रह गये। उनसे कुछ क्षण बोला ना गया। 

'आप कुछ तो कहिये बाबोसा! मेरा जी घबराता है। किस से पूछू यह सब? भाबू ने ऐसी बात कही और अब क्यों उस पर पानी फेर रही है? जो नहीं हो सकता, उसका क्या उपाय? अब मैं क्या करूँ? अच्छा बाबोसा! आप ही बताइए क्या तीनों लोकों के धनी (स्वामी) से भी मेवाड़ का राजकुँवर बड़ा है? यदि है तो होने दो, मुझे नहीं चाहिये।' 

'तू रो मत बेटा! धैर्य धर।' उन्होंने दुपट्टे के छोर से मीरा का मुंह पोंछा- 'तू चिंता मत कर। मैं सभी से कह दूँगा कि मेरे जीते जी मीरा का विवाह नहीं होगा। तेरा वर गिरधर गोपाल है और वही रहेंगे, किंतु मेरी लाडली! मैं बूढ़ा हूँ। कितने दिन का मेहमान हूँ? मेरी मरने के पश्चात भी यदि ये लोग तेरा ब्याह कर दे तो तू घबराना मत। सच्चा पति तो मन का ही होता है। तन का पति भले कोई बने, मन का पति ही पति है। प्राणी मात्र का धणी है, अन्तर्यामी है वह। मन की बात उससे छुपी तो नहीं है बेटा! तुम निश्चिंत रह।' 

'सच फरमा रहे हैं बाबोसा?' 
'सर्व साँची बेटा!' 

'तो फिर मुझे तनका पति नहीं चाहिये। मन का पति ही पर्याप्त है।' दूदाजी से आश्वासन पाकर मीरा के मन को राहत मिली। 

दुदाजी की गोद से उतर के मीरा श्यामकुँज की और दौड़ गयी। कुछ क्षण अपने प्राणराध्य। श्री गिरिधर गोपाल की ओर एकटक देखती रही। फिर तानपुरा झंकृत होने लगा। आलाप लेकर वह गाने लगी- 

आओ मनमोहना जी, जोऊँ थाँरी बाट ।
खान पान मोहि नेक न भावे,नैणन लगे कपाट॥
तुम आयाँ बिन सुख नहीं मेरे,दिल में बहुत उचाट ।
मीरा कहे मैं भई रावरी, छाँड़ो नाहिं निराट॥

भजन पूरा हुआ तो अधीरतापूर्वक नीचे झुककर दोनों भुजाओं में सिंहासन सहित अपने कृष्ण के चरणों को अपनी बाहों में बांधकर चरणों में सिर टेक दिया। नेत्रों से झरती की बुँदे उनका अभिषेक करने लगीं। ह्रदय चीख रहा था- 'आओ, आओ, मेरे सर्वस्व! इस तुच्छ दासी की आतुर प्रतीक्षा सफल कर दो। आज तुम्हारी साख और इसकी प्रतिष्ठा दाँव पर चढ़ गई है। बचा लो.... इसे बचा लो। मुझे बताओ, मैं क्या करूँ?.... क्या करूँ.... क्यों तुम मुझे कितने अच्छे लगते हो? क्यों?.... क्यों?.... क्यों तुमने मुझे अन्य लोगों जैसा नहीं बनाया?.... क्यों तुम अच्छे लगते हो?.... क्यों अच्छे लगते हो.... क्यों अच्छे लगते हो....?' 

वह फूट-फूट करके रो पड़ी। मिथिला के समीप बैठ धीरे से पुकारा- 'बाईसा हुकम! बाईसा हुकम! थोड़ा धीरज धारण कीजिये। मैं नाचीज आपको क्या समझाऊँ? दिन सदा एक से नहीं रहते। ये अन्तर्यामी है; आपकी व्यथा इनसे छिपी तो नहीं है। मुंह खोलकर इनसे कहिए तो....।' 

मीरा ने सिर उठाकर मिथुला की ओर देखा। ह्रदय को बेध देने वाली वह आँसू भरी दृष्टि....। मिथुला भीतर तक हिल गयी। उसने एक हाथ से मुख पोंछने के लिए वस्त्र और दूसरे से तानपुरा उठाकर स्वामिनी की ओर बढ़ाया। उसकी अपनी आंखें छल छला आयीं तो नेत्र नीचे कर लिये।

'मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता मिथुला।' 

'यही बात आप इनसे अर्ज करे बाईसा! ये सर्वसमर्थ हैं। यह दासी तो आपकी चरण-रज है। क्या आश्वासन दे पायेगी यह? यह तानपुरा लीजिये। कुछ तो मन हल्का होगा।' 

उसके आग्रह पर मीरा ने तानपुरा थाम लिया- 

सखी! म्हाँरो कानूड़ो कालजा री कौर।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे कुण्डल की झकझोर।।
बिंद्राबन की कुंज गलिन में नाचत नंदकिशोर।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरण कँवल चितचोर।।

मन थोड़ा हल्का हुआ तो मीराजी ने मिथुला की ओर देखा- 'मिथुला! तुझे क्या लगता है? क्या वे मेरी पीड़ा जानते हैं? मेरी प्रार्थना सुनकर कभी वे मेरी सुध लेंगे? वे बहुत.... बहुत.... बड़े.... है मिथुला! मेरी क्या गिनती? मुझ जैसे करोड़ों जन बिलबिलाते रहते हैं। किन्तु मिथुला! मेरी तो केवल वही एक अवलम्ब हैं न सुनें, न आयें, तब भी मेरा क्या वश हैं?' मीरा बाईसा ने मिथुला की गोद में मुँह छिपा लिया। 

'आप क्यों भूल जाती हैं बाईसा! वे भक्तवत्सल है, करुणासागर हैं, दीनबंधु हैं। भक्त की पीड़ा वे नहीं सह पाते, दौड़े आते हैं।' 

'किन्तु मैं भक्त कहाँ हूँ मिथुला?'- मीरा ने रोते हुए कहा- 'भजन! मुझ से बनता ही कहाँ है। मुझे तो केवल वे अच्छे लगते हैं बस! वे मेरे पति हैं मिथुला। मैं उनकी हूँ। वी कभी अपनी इस सेविका को अपनायेंगे क्या? उनके तो सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियाँ हैं। और भी न जाने कहां कितने प्रेमैकप्राण उन्हें पुकारते होंगे! उनके बीच मेरी यह प्रेमहीन रूखी-सूखी पुकार सुन पायेंगे वे? तुझे क्या लगता है मिथुला! कभी भी इसकी और देखेंगे भी? मुझे कोई कूल- किनारा दिखायी नहीं देता....।' 

मीरा बाईसा अचेत होकर मिथुला की गोद में लुढ़क गयी।

आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी है। राजमन्दिर में और श्यामकुंज में प्रातःकाल से ही उत्सव की तैयारियाँ होने लगी। मीरा का मन आज बहुत विकल है। वह अपने आप से बाते करने लगी 'दस जन्माष्टमियाँ निकल गयीं, सुनी ही गयीं सब....। क्या आज भी? नहीं, नहीं ऐसा नहीं होगा। आज प्रभु अवश्य पधारेगें। बाहर गये हुये लोग, भले ही नौकरी पर गये हों, सभी पुरुष तीज तक घर लौट आते हैं। फिर आज तो उनका जन्मदिन है। कैसे न आयेंगे भला? पति के आने पर स्त्रियाँ कितना श्रृगांर करती हैं!- तो मैं क्या ऐसे ही रहूँगी? तब...... मैं भी क्यों न पहले से ही श्रृगांर  धारण कर लूँ ? कौन जाने, कब प्रियतम पधार जावें।"
        
मीरा ने मंगला से कहा ,"जा मेरे लिए उबटन ,सुगंध और श्रृगांर की सब सामग्री ले आ।" और चम्पा से बोली कि माँ से जाकर सबसे सुंदर काम वाली पोशाक और आभूषण ले आ।
  
सभी को प्रसन्नता हुईं कि मीरा आज श्रृगांर कर रही है। बाबा बिहारीदासजी की इच्छा थी कि आज रात मीरा चारभुजानाथ के यहाँ होने वाले भजन कीर्तन में उनका साथ दें। बाबा की इच्छा जानकर मीरा बड़ी असमंजस में पड़ गई। थोड़े सोच-विचार के पश्चात वह स्वयं बाबा बिहारीदासजी के पास गयी- 'बाबा श्रीकृष्ण- जन्म-समय के पूर्व, रात्रि के प्रथम प्रहर मैं चारभुजानाथ के मन्दिर में आपकी आज्ञा का पालन करूँगी, फिर अगर आप आज्ञा दें तो मैं जन्म के समय श्यामकुंज में आ जाऊँ?"
        
"अवश्य बेटी!" उस समय तो तुम्हें श्यामकुंज में ही होना चाहिए। "बाबा ने मीरा के मन के भावों को समझते हुये कहा।" मेरी तो बहुत इच्छा थी कि तुम मेरे साथ एक बार मन्दिर में गाओ। बड़ी होने पर तो तुम महलों में बंद हो जाओगी। कौन जाने, ऐसा सुयोग फिर कब मिले!"

नख से शिख तक श्रंगार किये मीरा चारभुजानाथ के मन्दिर में राव दूदाजी और बाबा बिहारीदासजी के बीच तानपुरा लेकर बैठी हुई पदगायन में बाबा का साथ दे रही है। मीरा के रूप-सौंदर्य के अतुलनीय भण्डार के द्वार आज श्रृगांर ने उदघाटित कर दिए थे । नव बालवधु के रूप में मीरा को देखकर सभी राजपुरूष के मन में यह विचार स्फुरित होने लगा कि मीरा किसी बहुत गरिमामय घर-वर के योग्य है। सर्वस्व देकर भी किसी बड़े घर में विवाह करके उसका भविष्य उज्जवल बनाया जा सके तो हमारे घर में उसका जन्म लेना सार्थक हो। वीरमदेवजी आज अपनी बेटी का रूप देख चकित रह गये और मन ही मन दृढ़ निश्चय किया कि चित्तौड़ की महारानी का पद ही मीरा के लिए उचित स्थान है।

"बेटी ! अब तुम अपने संगीत के द्वारा सेवा करो।"- बाबा बिहारीदासजी ने गर्व से अपनी योग्य शिष्या को आज्ञा दी।
          
मीरा ने उठकर पहले गुरुचरणों में प्रणाम किया। फिर चारभुजानाथ और दूदाजी आदि बड़ो को प्रणाम करके यथास्थान बैठकर तानपुरा उठाया। फिर अलाप लेकर उसने गाना आरम्भ किया।

बसो मेरे नैनन में नन्दलाल।
मोहिनी मूरत साँवरी सूरत, नैना बने विशाल।
अधर सुधारस मुरली राजत उर वैजंती माल॥
छुद्र घंटिका कटितट शोभित नूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदायी, भगत बछल गोपाल ॥


बाबा बिहारीदासजी सहित दूदाजी चकित एवं प्रसन्न हो उठे। यह पद मीरा का अपना बनाया हुआ था। इस पद को सुनकर दोनों के मुख से एक साथ आनंद के भाव में अति गदगद स्वर निकला- 'बेटी!'

मीरा चरित्र से प्रेरित


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