Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 6


वृन्दावन बिहारी के नाम सन्देश


श्री कृष्ण-जन्मोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात बाबा बिहारीदासजी ने वृन्दावन जाने की इच्छा प्रकट की । भारी मन से दूदाजी ने स्वीकृति दी । यह बात मंगला ने आकर मीरा को बतायी । सुनकर ऐसा लगा मानो किसी ने काँटा चुभा दिया हो । ठाकुरजी की ओर देखकर बोली- 'अपने निजजनो-प्रेमीजनों के बीच निवास दो गोपाल ! तुम्हारी चर्चा और उनके अनुभव सुनने से प्राणों की ज्वाला ठंडी होती है । अब अच्छा नहीं लगता यह सब, मुझे.... ले.... चलो.... प्रिय !' 

मंगला सिर झुकाये सुनती रही । उसी समय मिथुला ने आकर बताया कि बाबा बिहारीदासजी बाईसा की वर्षगाँठ तक रुकने के लिए राजी हो गये हैं । मीरा उठकर बाबा के पास चली । मंगला ने आगे आकर सूचना दी । मीरा ने कक्ष में जाकर उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया- ' बाबा आप पधार रहे हैं ?' उसने भरे गले से पूछा । 

' हाँ बेटी ! वृद्ध हुआ अब तेरा यह बाबा । अंतिम समय तक वृन्दावन में श्री राधामाधव के चरणों में ही रहना चाहता हूँ ।' 

' बाबा ! मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे भी.... ।' -मीरा ने दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर  रोते हुए कहा- ' मुझे भी ले चलिये ना बाबा !'

' श्रीराधे ! श्रीराधे !'- बिहारीदासजी कुछ बोल नहीं पाये । उनकी आँखों से अश्रुपात होने लगा । कुछ समय पश्चात उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- ' हम सब स्वतंत्र नहीं है पुत्री ! वे जब जहाँ जैसा रखना चाहें...., उनकी इच्छा में ही प्रसन्न रहें । भगवत्प्रेरणा से ही मैं इधर आया । सोचा भी नहीं था कि यहाँ ऐसा रत्न पा जाऊँगा ! इतने समय तक रहूँगा यहाँ ! तुम्हारी संगीत-शिक्षा में मैं तो निमित्तमात्र रहा । तुम्हारी बुद्धि, श्रद्धा, लग्न, और भक्ति ने मुझे सदा ही आश्चर्यचकित किया है । तुम्हारी सरलता, भोलापन और विनय ने हृदय के वात्सल्य पर एकाधिपत्य स्थापित कर लिया । राव दूदाजी के प्रेम, विनय और संत-सेवा के भाव, इन सबने मुझ विरक्त को भी बाँध लिया है । जब-जब जाने का विचार किया, एक अव्यक्त पीड़ा हृदय में उठ खड़ी होती । किन्तु बेटा ! जाना तो होगा ही ।'

' बाबा ! मैं क्या करूँ ? मुझे आशीर्वाद दीजिये कि....।'- मीरा की हिचकी बँध गयी- ' मुझे भक्ति प्राप्त हो, अनुराग प्राप्त हो, श्यामसुन्दर मुझ पर प्रसन्न हों !' उसने बाबा के पैर पकड़ लिये ।

बाबा कुछ बोल नहीं पाये, उनकी आँखों के आँसू चरणों पर पड़ी मीरा के सिर को सिक्त करते रहे । फिर भरे गली से बोले- ' श्रीकिशोरीजी और श्यामसुन्दर तुम्हारी मनोकामना पूरी करें ! बेटी ! मैं जब एक और तुम्हारी भाव-भक्ति को और दूसरी ओर समाज के बंधनों का विचार करता हूँ तो मेरे प्राण व्याकुल हो उठते हैं । बार-बार प्रभु का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरी बेटी का मंगल हो, मंगल हो ! चिन्ता न करो पुत्री ! तुम्हारे गिरधर ही तुम्हारे रक्षक हैं । अभी डेढ़ महीना और रहूँगा यहाँ ।'

मीरा के ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश के तीसरे ही दिन दूदाजी बाबा बिहारीदासजी के साथ श्यामकुंज में आये । बाबा ने भरे मन से कहा- ' मैं जा रहा हूँ पुत्री !' 

कहते-कहते उनकी आँखों से कई बूँदे झर पड़ीं । मीरा ने भी रोते हुए उनके चरणों पर सिर रखा । बाँह पकड़ उसे उठाकर सिर पर हाथ धर वे उसकी ओर निहारते रहे । इस दृश्य ने वहाँ उपस्थित सभी जनों को रुला दिया । आँसू भरी आँखों से उनकी और देख मीरा धरती की ओर देखने लगी। 

' कुछ कहना है बेटी ?'- अपने आँसू पोंछते हुए बाबा बिहारीदासजी ने पूछा ।

मीरा के मूँदे हुए नेत्रों से प्रेमाश्रु टपक रहे थे । उसने भरे गले से कहा- 'आप वृन्दावन पधार रहे हैं । बाबा ! मेरा एक संदेश ले जायेंगे ?'

' बोलो बेटी ! तुम्हारा संदेश-वाहक होकर तो मैं कृतार्थ हो जाऊँगा ।' मीरा ने कक्ष में दृष्टि फेरी । उसकी दासियों-सखियों के अतिरिक्त दूदाजी और रायसल भी वहाँ उपस्थित थे । लाज के मारे बोला नहीं गया उससे । लकड़ी की कलमदान से कागज-कलम लेकर वह लिखने लगी । 

आँसुओं से दृष्टि धुंधला जाती । आँखें पोंछ फिर लिखने लगती । लिखकर उसने मन-ही-मन पढ़ा-

        स्याम मोरी बाँहडली गहो ।
        या भवसागर मँझधार में, थे ही निभावन हो ॥
        म्हाँ में औगुण घना छै हो, थे ही सहो तो सहो ।
        मीरा के प्रभु हरि अबिनासी, लाज विरद की बहो ॥
                                      और
        गोविन्द कबहुँ मिलै पिया मेरा ।
        चरण कँवल को हँस हँस देखूँ, राखूँ नैणा नेरा ।
        निरखन का मोहि चाव घणेरौ, कब देखूँ मुख तेरा ॥ 
        व्याकुल प्राण धरत नहीं धीरज, मिल तू मीत सवेरा ।
        मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ताप तपन बहु तेरा ॥



पत्र को समेट कर और सुन्दर रेशमी थैली में रखकर उसे बाबा बिहारीदासजी की और बढ़ा दिया । बाबा ने उसे लेकर सिर चढ़ाया और झोली में से डिबिया निकालकर उसमें रख दिया गिरधर गोपाल को प्रणाम कर सब बाहर आये । मीरा ने एक बार पुनः प्रणाम किया ।

' पहुँचाने कौन जायेगा ?'- उसने दूदाजी से पूछा ।

' मैं जाऊँगा ।' रायसल बोले- ' बाबा पुष्कर तक ही जाने को कह रहे हैं, किन्तु आवश्यकता हुई तो वृन्दावन तक मैं पहुँचा आऊँगा ।' महावीर रायसल को देखकर मीरा को संतोष हुआ । 

बाबा बिहारीदासजी के जाने से ऐसा लगा, जैसे गुरु, मित्र और सलाहकार खो गया ।


संत रैदासजी का चरणाश्रय

' कल गुरु पूर्णिमा है ।'- मीरा अपने श्यामकुंज में बैठी हुई सोच रही हैं - ' सदा से लोग इस दिन गुरु - पूजा करते आ रहे हैं । शास्त्र कहते हैं कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता । गुरु ही परम तत्व का दाता है । तब मेरे गुरु कौन है ?'

वह एकदम से उठकर दूदाजी के पास चल पड़ी । दूदाजी के समीप जयमल बैठे थे । तलवार और भाले के दावों के विषय में पूछ रहे थे । दूदाजी उनकी शंका समाधान करने के पश्चात बोले- ' समीप के युद्ध में जैसे तलवार, कटार, बरछी उपयुक्त है, वैसे ही दूर की मार में अपनी बराबरी नहीं रखते । विशेष रूप से तीर अधिक उपयोगी है । तुम चलाना सीख रहे हो न ?' '

' हाँ, हुकम ! बचेट ( बीचवाले ) काकोसा फरमाते हैं कि तलवार से भी तीर अधिक कारगर है । तीर-धनुष दूर या पास स्थानों पर काम आते हैं । किन्तु बाबोसा ! घोड़े पर बैठकर तीर चलाना घोड़े की गति से तीर की गति, लक्ष्य और अपने बलाबल का साम्य बैठाना क्या बहुत कठिन नहीं है ?'

' अभ्यास होने पर कुछ भी कठिन नहीं होता बेटा ! यदि देह लचीली है, भुजाओं में बल है, मन में धैर्य और बुद्धि में निर्णय की शक्ति है तो सफलता चरण तले रहती है । अपने साथ-साथ अपने अश्व को भी साधो । योद्धा का आधा बल उसका अश्व है, यह मत भूलो । इसीलिये गरीब राजपूत स्वयं भुने चने खाकर भी अपने अश्व को घी से सनी रातिब खिलाते हैं । राजपूतों की स्त्रियाँ अपने पति के अश्व की पूजा- सेवा करती हैं क्योंकि वहीं रण में विजय का बड़ा माध्यम है और घायल होने पर वही प्राणों पर खेलकर स्वामी को घर लाता है । इसी कारण नवरात्रि में शक्ति ( करवाल ) और केकाण ( घोडा ) दोनों की पूजा होती है, अतः ध्यान रखो कि तुमसे तुम्हारा अश्व योग्यता और बल में तनिक भी कम न हो ।'

' किंतु बाबोसा ! युद्ध में अश्व कम नहीं मरते, तब फिर.... ?'- जयमल ने पूछा ।

' बहुत से अश्वो को युद्ध के लिए एक साथ सधाया जाता है । तुम भी बड़े होकर चार-पाँच अश्व अपने लिये तैयार कर लेना । सबसे बड़ी बात यह है बेटा ! कि आदमी को घोड़े की सवारी आनी चाहिये । आदमी के प्यार, सेवा, ऐड़ और लगाम के संकेत से साधारण पशु भी विशेष हो जाता है और भूखा थका घायल होने पर भी स्वयं के प्राण निकलने तक मैं अपनी बुद्धि के अनुसार घायल अथवा मूर्छित स्वामी की रक्षा करता है ।'

' बाबोसा ! मुझे सैन्धव और गान्धारी अश्व कब मिलेंगे ?'

' बेटा ! अभी तुम छोटे हो । जैसे तुम्हारे धनुष, तलवार और भाले छोटे हैं, वैसे ही अश्व भी छोटा है ।

' बावजी हुकम ( पिता ) जैसा बड़ा कब हो जाऊँगा ?' ' तनिक रुको; रुको भाई !'- मीरा इन दोनों को बात करते देखकर दूदाजी प्रणाम करके जयमल के पीछे बैठ गई थी । अब उसे टोकते हुए वह बाबोसा के समीप आ गयी ।

' अहो, जीजा ! आप कब पधारीं ? खम्माघणी !'- जयमल ने उठकर हाथ जोड़ अभिवादन करते हुए पूछा ।

' जब आप तलवार, तीर की क्षमता ज्ञात कर रहे थे । मैंने सोचा कि इन्हें समाधान मिल जाने पर अपनी बात पूछूँगी; पर आप हैं कि तलवार से भाले, भाले से तीर, तीर से अश्व पर आये और अब पट्टनी अश्व से सैन्धव और सैन्धव से गान्धारी पर आकर, कौन जाने आप युद्ध के किस चक्रव्यूह से निकलने के लिए कौन सा दाँव पूछ बैठें । इसलिये बीच में ही टॉक दिया है । मुझे मेरे नन्हे से प्रश्न का उत्तर मिल जाये तो आप अपना महाभारत पुनः आरम्भ कर दीजियेगा । बावजी हुकम की तलवार जितने तो है नहीं और उनके बराबर होने की बात कर रहे हैं ।' जयमल और दूदाजी मीरा की बात पर हँस पड़े ।

' कहो बेटा ! क्या पूछना है ?'- दुदाजी ने कहा ।

जयमल के समीप पड़ी चौकी को मीरा दुदाजी के पलंग के समीप खींच लायी । उस पर बैठते हुए बोली- 'बाबोसा ! शास्त्र और संत कहते हैं कि गुरु बिना ज्ञान नहीं होता । मेरे गुरु कौन हैं ?'

' हैं तो बाबा बिहारीदासजी, योगी श्रीनिवृत्तिनाथ ।'- जयमल ने कहा ।

' आप रुकिये ना भाई !- मीरा ने हँसकर कहा ।

' मैं क्या झूठ कह रहा हूँ बाबोसा ?'

' नहीं बेटा ! पर वे मीरा के शिक्षा गुरु हैं, दीक्षा गुरु नहीं ।' - दूदाजी ने उत्तर दिया - ' सुनो बेटी! इस क्षेत्र में अधिकारी को वंचित नहीं रखा जाता ।तृषित यदि सरोवर के समीप नहीं पहुँच पाता तो सरोवर ही प्यासे के समीप पहुँच जाता है । तुम अपने गिरधर से प्रार्थना करो । वे उचित प्रबंध कर देंगे ।'


मीरा चरित्र से प्रेरित

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  1. Very Nice story. Thanks for Sharing. Keep Sharing

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  2. Very Nice story. Thanks for Sharing. Keep Sharing

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