Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 7


संत रैदासजी का चरणाश्रय ( क्रमशः आगे )

' गुरु होना आवश्यक तो है ना बाबोसा ?' 

' आवश्यकता होने पर अवश्य ही आवश्यक है । यों तो तुम्हारे गिरधर स्वयं जगदगुरु हैं । गुरु शिक्षा ही तो देते हैं, शिक्षा जहां से भी मिले, ले लो ।' 

' मन्त्र ?' 

उसके इस छोटे से प्रश्न पर दूदाजी हँस दिये- ' भगवान का प्रत्येक नाम मंत्र है बेटी ! उनका नाम उनसे भी अधिक शक्तिशाली है, यही तो अब तक सुनते आये हैं ।' 

' वह कानों को ही प्रिय लगता है बाबोसा ! आंखें तो प्यासी ही रह जाती हैं ।'- अनायास ही मीरा के मुख से निकल पड़ा, पर बात का मर्म समझ में आते ही सकुचा करके उसने दूदाजी की और पीठ फेर ली । 

' उसमें इतनी शक्ति है बेटी ! कि आंखों की प्यास बुझाने वाले को भी खींच लाये ।'- उसकी पीठ की ओर देखते हुए मुस्कुराकर दूदाजी ने कहा । 

' जाऊँ बाबोसा ?'- मीरा ने पीट फेरे हुए ही पूछा । 

' जाओ बेटी !' 

' जीजा ने यह क्या कहा बाबोसा ? और लाज काहे की आई उनको ?' 

' वह तुम्हारे क्षेत्र की बात नहीं है बेटा ! बात इतनी ही है कि भगवान के नाम में भगवान से भी अधिक शक्ति है और उस शक्ति का लाभ नाम लेने वाले को मिलता है । 

मीरा ने श्याम कुंज में जाकर अपने गोपाल के सम्मुख बैठ इकतारा उठाया- 

मोहि लागी लगन गुरु चरणन की ।
चरण बिना मोहे कछु नहिं भावे, जग माया सब सपनन की ॥
भवसागर सब सूख गयो है, फिकर नहीं मोही तरनन की ॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आस लगी गुरु सरनन की ॥

रात को स्वप्न में मीरा ने देखा- ' महाराज युधिष्ठिर की सभा में प्रश्न उठा कि प्रथम पूज्य, सर्वश्रेष्ठ कौन है, जिसका प्रथम पूजन किया जाय ?' 

ऋषियों-मुनियों की ओर से ध्वनि आयी- ' श्री कृष्ण, श्रीकृष्ण ही प्रथम पूजा के योग्य हैं ।' वृद्ध महारथी और ज्ञान वृद्ध परम भागवत भीष्म पितामह ने उठकर उनकी बात को दोहराया- ' युधिष्ठिर ! श्रीकृष्ण ही प्रथम पूज्य हैं । 

क्षत्रिय सभा में मर्मर ध्वनि उठी, उसी समय कनिष्ठ पाण्डव सहदेव उठे- ' हम श्रीकृष्ण का प्रथम पूजन कर रहे हैं । जिसे यह न रुचे, सह्य न हो, उसके सिर पर मेरा वाम पद ।'  

मीरा का हृदय गर्व से भर उठा । उसने नेत्र उठाकर ऊँचे सिंहासन पर विराजित उस मेघवर्ण दिव्य वपु की और देखा- ' ओह छवि-सुषमा की उत्ताल लहरें लेटा हुआ सौंदर्य सागर ! नन्हा-सा तो मानव-मन, उसमे यह अपार रूप-सागर समावे ही कैसे ? जो थोड़ा बहुत समाता है, उसे सीमा में बँधी यह वाणी कैसे वर्णन कर पाये ?'

वे अरुण, अमल, मृदुल चारु चरण अपने दोनों हाथों में भरकर, देवी पांचाली के हाथों में थमी झारी से ढलते जल और नेत्र-जल से धर्मराज ने अच्छी तरह धोये । कृष्ण ने आँचल से भली प्रकार पोंछकर उन्हें धीरे से सुकोमल पाद-पीठ पर रखा । वह प्रक्षालन-जल अपनी देह पर छिड़क करके पान किया और फिर पूजा आरम्भ की । गंग-जनक, हर-हिय-धन, सिन्धुजा-कर-ललित पादपद्मों की कुंकुम, केसर, अक्षत, पुष्प भेंट से अर्चना की और इसके बाद ' भरत-खंड के इस तुच्छ राज्य की भेंट सहित यह प्रथम पाण्डव श्रीचरणों में प्रनत है ।- कहकर युधिष्ठिर ने अयोनिजा देवी याग्यसेनी के साथ अपनी चढाई हुई पूजन सामग्री पर मस्तक धर दिया । उनके साथ ही कोटि-कोटि मस्तक झुक गये । ऋषियों-ब्राह्मणो की ओर से स्वर उठा- ' कृष्णं वंदे जगतगुरुम ।' उस घोष के साथ ही मीरा की आँखे खुल गयीं ।

'कहाँ; कहाँ गये मेरे प्राण ! मेरे सर्वस्व !' वह व्याकुल हो उठी । ' वे करुणा-कृपापूर्ण बड़े-बड़े नयन, वह मधुर मुस्कान, युधिष्ठिर कैसे चाव से चरणों को धो रहे थे, उनके हाथ मानो उन चरणों से विलग होना ही न चाहते हों । देवी द्रौपदी और धर्मराज के मुख पर विनय, प्रेम और समर्पण के वे भाव....! अपनी ही चढ़ायी वे वस्तुएँ.... वह बहुमूल्य पूजन समारम्भ उन्हें अत्यन्त तुच्छ लग रहा था । उनकी शान-शान चंचल होती वह विवश दृष्टि मानो कहती थी कि यह चक्रवर्ती पद, धारा कि यह सम्पति, मेरी यह देह, ये प्राण, आह ! कुछ भी तो ऐसा नहीं जो इन चरणों में चढ़ाकर तनिक-सा संतोष पाऊँ। यह सब तो पहले से ही इनका है, मैं इन्हे क्या भेंट करूँ ? यह अल्पमत्ति, अल्पप्राण युधिष्ठिर तो सद्दा से ही तुम्हारा ही है। केवल मेर संतोष के लिये स्वीकृति प्रदान करके मुझे गौरव प्रदान करो मेरे प्रभु ! धर्मराज के भाव कितने दिव्य हैं ? ऐसे दिव्य भाव मुझे कब प्राप्त होंगे ? कब प्राणो कि व्याकुलता उन्हें कृपा-परवश करेगी ? वे सब लोग कह रहे थे कि ' कृष्णं वंदे जगद्गुरुम ' । सच, तुम्ही तो सच्चे गुरु हो । आज तुम जिस संत के रूप में पधारोगे, मैं उनको ही गुरु मान लूँगी ।'

नित्यकर्मों से निवृत होकर उसने गिरधर गोपाल को नया शृंगार धारण कराया, गुरु भाव से उनकी पूजा की और फिर गाने लगी-

री, मेरे पार निकस गया सतगुरु मारया तीर ।
बिरह झाल लगी  उर अंतर ब्याकुल भया सरीर ॥
इत उत चित्त चलै नहीं कबहुँ डारी प्रेम जंजीर ।
कै जाणे म्हाँरो प्रीतम प्यारो और न जाणे पीर ॥
कहा करूँ मेरो बस नहीं सजनी नैण झरत दोउ नीर ।
मीरा कहे तुम मिलिया बिन, प्राण धरत नहीं धीर ॥

बंद नेत्रों से झरते जल ने उसके वक्ष को भिगो दिया। प्राणो की व्याकुलता ने कंठ पर मानो आवेग की श्रंखला चढ़ा वाणी को कैद कर लिया। अपनी दशा को छिपाने के प्रयत्न में उसने सखियों की और से पीठ फेरकर दिवार पर दोनों हाथों और सिर को टिका दिया । रुदन को मौन रखने के प्रयत्न में देह रह-रह कर झटके खाने लगी । स्वामिनी की यह दशा देख दासियाँ कीर्तन करने लगीं । चम्पा और चमेली उसके दोनों और खड़ी हो गयीं । की कहीं अचेत होकर गिर ना पड़ें । 

उसी समय गंगा ने आकर माता झालीजी के पधारने की सूचना दी । चम्पा ने मीरा के सिर पर साडी ओढ़ाते हुए कान के समीप मुख ले जाकर धीमे स्वर में कहा- ' धैर्य धारण कीजिये, कुंवारानीसा पधार रही हैं ।'

कठिन प्रयत्न करके मीरा ने अपने आप को सँभाला और निचे बैठकर तानपूरे पर उँगलियाँ फेरी-

तो सो नेह लाग्यो रे प्यारा नागर नन्द कुमार ।
मुरली थारी मन हरयो बिसरयो घर त्योहार ॥
जब से श्रवनन धुन परी, घर आंगण न सुहाय ।
पारधि ज्यूँ चुके नहीं, बेध दई मृगी आय ॥
पानी पीर न जानइ, ज्यों मीन तड़फ मरि जाय ।
रसिक मरूप के मरम को, नहीं समुझत कमल सुभाय ॥
दीपक को तो दया नहीं, उडी उडी मरत पतंग ।
मीरा प्रभु गिरधर मिले, जूँ पाणी मिल गया रंग ॥



वीरकुंवारीजी ठाकुर जी को प्रणाम कर बैठ गयीं ।  मीरा ने भजन पूरा होने पर तानपुरा रखते समय माँ को देखा ऑल उठकर चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया । बांह पकड़ अपने समीप बैठाते हुए माँ ने उसका अश्रुसिक्त मुख देखा । पीठ पर हाथ रखते हुए उन्होंने कहा- ' मीरा ! क्या भजन गा-गा करके ही आयु पूरी करनी है बेटी ? तेरी आयु की कन्याएं दो-दो तीन-तीन बार ससुराल को आयी हैं । जहाँ विवाह होगा, वह लोग क्या भजन सुनने के लिए तुझे ले जायेंगे ?'

' जिसका ससुराल और पीहर एक ही ठौर हो भाबू ! उसे चिन्ता करने की क्या आवश्यकता है ?'

' मैं समझी नहीं बेटी '

' महलों में मेरा पीहर है और श्यामकुंज ससुराल ।'- मीरा ने सरलता से कहा ।

' तुझे कब समझ आयेगी बेटी ! कुछ तो जगत व्यवहार सीख । करूं मैं तुम्हारे संबंध की चर्चा चल रही है । इधर रनिवास में हम लोगों का चिंता के मारे बुरा हाल है । यह रात दिन गाना-बजाना पूजा-पाठ और रोना-धोना इनसे संसार नहीं चलता । ससुराल में सास ननंद का मान रखना पड़ता है, परमेश्वर मानकर सेवा-टहल करनी होती है । मीरा ! सारा परिवार तुम्हारे लिए चिन्तित है ।'

' भाबू ! पति परमेश्वर है, इस बात को तो आप सबकी व्यवहार को देखकर मैं समझ गयी हूँ । गिरधर गोपाल पति ही तो है और इन्हीं की सेवा में लगी रहती हूं फिर आप ऐसा क्यों फरमाती हैं ?'

' अरे बेंड़ी ( पागल ) ! पीतल की मूरत भी क्या किसी का पति हो सकती है ? मैं अघा गयीं हूँ । भगवान ने जीवन में एक ही बेटी थी और वह भी आधी पागल ।

' माँ ! आप क्यों अपना जी जलाती हैं ? सब अपना-अपना भाग्य लिखा कर लाते हैं । मेरे भाग्य में यदि पागल होना ही लिखा है तो आप कैसे भाग्य का लिखा मिटा देंगी ? बाबोसा ने मुझे बताया है कि मेरा विवाह हो गया । अब और दूसरा विवाह नहीं होगा ।'

मीरा चरित्र से प्रेरित

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