Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 8


संत रैदासजी का चरणाश्रय ( क्रमशः आगे )

' कब हुआ तेरा विवाह ? हमने न देखा, न सुना । कब पीठी ( हल्दी ) चढ़ी, कब बारात आयी, कब विवाह-विदाई हुई ? कन्यादान ही किसने किया ? यह बाबोसा ने ही तुझे सिर चढ़ाया है, अन्यथा तो अब तक ससुराल जाकर जूनी ( पुरानी ) हो जाती ।'

' यदि आपको लगता है कि विवाह नहीं हुआ तो अभी कर दीजिये । न वर को कहीं से आना है ना कन्या को । दोनों आपके सम्मुख हैं । दूसरी तैयारी ये लोग कर देंगी ।'- उसने अपनी सखियों की ओर देखा । दो जनी जाकर पुरोहित जी और कुंवरसा को बुला लायेंगी- मीरा ने कहा ।

' हे भगवान ! अब मैं क्या करूँ ? रनिवास में सब मुझे दोषी ठहराते हैं कि बेटी को समझाती नहीं और यहाँ यह हाल है कि सिर फोड़कर कर मर जाओ, तब भी इस लड़की के मस्तिष्क में एक बात नहीं घुसती । मेरी तो दोनों और मौत है ।'

' आज गुरु पूर्णिमा है भाबू ! आज यह सब बातें रहने दीजिये न ! मेरे गुरुदेव पधारेंगे आज ।'

' यह क्या नयी बात सुन रही हूँ ? तेरे और कौन से गुरु पधारने वाले हैं ? वे बिहारीदासजी या वे हाथ-पैर तोड़ने मरोड़ने और समाधि वाले निवृत्तिनाथजी ?

' ऐसा मत कहिये माँ ! वे महात्मा है, संत हैं । उनकी निंदा से दोष लगता है ।

' मैं निंदा नहीं, सत्य बात कह रही हूँ । वे महात्मा और संत है ठीक, पर तुझे महात्मा और संत बनाकर उन्होंने हमारी आशा-अभिलाषाओं में काँटे बो दिये हैं । नारी का सच्चा गुरु पति ही होता है ।

' फिर भाबू ! आप मुझे गिरधर की ओर से विमुख क्यों करती हैं ? ये तो आपके ही सुझाये हुए पति हैं न ?'
झालीजी ने उसे गोद में भर लिया- 'अहा, जिस विधाता ने इतना सुन्दर रुप दिया, उसने ऐसी पागल बुद्धि क्यों दी कि यह सजीव मनुष्य और पीतल की मूरत में अन्तर ही नहीं समझती ।वह तो उस समय तू जिद कर रही थी, इसलिए तुझे बहलाने को कह दिया था ।'

' आप ही तो कहती हैं कि कच्ची हाँडी पर खींची रेखा मिटती नहीं और पक्की हाँडी पर गारा  नहीं ठहरता । उस समय कच्ची बुद्धि में आपने यह बिठा दिया कि गिरधर तेरे पति है । अब दस वर्ष की होने पर कहती हैं कि वह बात तो बहलाने के लिये कही थी । भाबू ! मैंने तो आज तक सुना-जाना है कि मनुष्य शरीर भगवत्प्राप्ति के लिए मिलता है, इसे व्यर्थ कार्यों में लगा देना मूर्खता है ।'

' हे भगवान ! मेरी सुमन सुकुमार बेटी को यह बाबाओं वाला पथ कैसे पकड़ा दिया गया ? अब क्या होगा ?'- झालीजी की आँखों से आँसू बरस पड़े ।

' आप दुख न करिये भाबू ! कहिये, अभी मुझे क्या करना है, जिससे आप प्रसन्न हों ।'

' देख, सूर्य नारायण ने आकाश में कितना पथ पार कर लिया, पर तूने अभी तक अन्न का दाना भी मुख में नहीं लिया । तू भूखी रहे तो क्या मेरे गले कुछ उतरेगा ? मेरे भाग्य में विधाता ने तेरी चिन्ता करते-करते ही मरना लिखा है ।'

' बस, इतनी-सी बात ? लो पधारो । मैं चलती हूँ भोजन करने के लिये । आप के मुख से भोजन का नाम सुनते ही जोर की भूख लग आयी है ।'- मीरा उठकर माँ के साथ चल पड़ी ।

' अरी, तुम सब केवल इसके आगे-पीछे ही घूमती हो ? इस भोली बेटी को संसार की ऊँच-नीच भी तो समझाया करो जरा ।'- झालीजी ने दासियों की ओर देखकर कहा ।

' अरे अन्नदाता ! हमारी भला समझाने जैसी हैसियत कहाँ ?' मिथुला ने कहा- ' बाईसा हुकम ने तो सब शास्त्र पढ़े हैं । बड़े-बड़े विद्वान भी बोल नहीं पाते इनके आगे ।'

' ये शास्त्र ही तो आज बैरी हो गये ।'- उन्होंने निश्वास छोड़कर कहा और बेटी के साथ भोजनशाला की ओर मुड़ गयीं । वे मन में सोच रही थीं- ' क्यों नहीं अन्नदाता ने इसे अन्य लड़कियों की भाँति सामान्य रहने दिया ? इसकी विशिष्टता अब सबका सिरदर्द बन गयी है । इसके लिये अब जोगी राजकुंवर कहाँ से ढूँढे ?'
सांयकाल अकस्मात विचरते हुए काशी के संत रैदासजी का मेड़ता में पधारना हुआ । दूदाजी बहुत प्रसन्न हुए । यद्यपि रैदास जी जाति के चमार थे, किन्तु संतों की, भक्तों की कोई जाति नहीं होती । वे तो प्रभु के निजजन-प्रियजन हैं बस । दूदाजी ने शक्तिभर उनका सत्कार किया और जिस कक्ष में योगी श्रीनिवृत्तिनाथजी ठहरे थे, उसी कक्ष में उन्हें आवास प्रदान किया ।

मीरा को बुलाकर उनका परिचय दिया । वह प्रसन्न हो उठी । मन-ही-मन उन्हें गुरु मानकर मीरा ने प्रणाम किया । उन्होंने कृपा-दृष्टि से उसे निहारते हुए आशीर्वाद दिया- ' प्रभु-चरणों में दिनानुदिन तुम्हारी प्रीति बढ़ती रहे ।'
आशीर्वाद सुनकर मिला के नेत्र भरा आये । उसने कृतज्ञता से उनकी और देखा । उसे असाधारण निर्मल दृष्टि और मुख के भाव देखकर संत सब समझ गये । उसके जाने के पश्चात उन्होंने दूदाजी से उसके विषय में पूछा । सब सुनकर वे बोले- ' राजन ! तुम्हारे पुण्योदय से घर में गंगा आयी है । अवगाहन कर लो जी भरकर सब-के-सब तर जाओगे ।'

रात को राजमहल के सामने वाले चौगान में सार्वजनिक सत्संग समारोह हुआ । रैदासजी के उपदेश-भजन हुए । दूसरे दिन रैदासजी के कक्ष में दूदाजी के आग्रह से मीरा ने भजन गाकर सुनाये-

लागी मोहि राम खुमारी ।
रिमझिम बरसै मेहरा भीजै तन सारी हो ।
चहुँ दिस दमकै दामणी, गरजै घन भारी हो ॥
सतगुरु भेद बताइया खोली भरम किंवारी हो ।
सब घर दीसै आतमा सब ही सूँ न्यारी हो ॥
दीपक जोऊँ ग्यान का चढ़ूँ अगम अटारी हो ।
मीरा दासी रामकी इमरत बलिहारी हो ॥

मीरा के संगीत-ज्ञान, पद-रचना और स्वर-माधुरी से संत बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने पूछा- ' तुम्हारे गुरु कौन हैं बेटी ?'

' कल मैंने अपने प्रभु के सामने निवेदन किया था कि मेरे लिये गुरु भेजें और फिर निश्चय किया कि आज गुरु पूर्णिमा है, अतः जो भी संत आज पधारेंगे, वे ही प्रभु द्वारा निर्धारित मेरे गुरु होंगे । कृपाकर इस अज्ञ को स्वीकार करें !' मीरा ने पुनः उनके चरणों में प्रणाम किया । उसकी आँखों से निकलकर दो बूंदें धरा पर गिर पड़ीं ।

' बेटी !' संत ने सिर पर हाथ रखकर कहा- ' तुम्हें कुछ अधिक कहने-सुनने की आवश्यकता नहीं है । नाम ही निसेनी है और लगन ही प्रयास, दोनों ही बढ़ते जायँ तो अगम अटारी घट में प्रकाशित हो जायेगी । इन्हीं के सहारे उसमें पहुँच अमृतपान कर लोगी । समय जैसा भी आये, पाँव पीछे न हटे, फिर तो बेड़ा पार है ।' वे हँस दिये ।

' मुझे कुछ प्रसाद मिले !'- मीरा ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की ।

संत ने एक क्षण सोचा । फिर गले से अपनी जप-माला और एक इकतारा मीरा के फैले हाथों पर रख दिया । उसने उन्हें सिर से लगाया, माला गले में पहन ली और इकतारे के तार पर उँगली रखकर उसने रैदासजी की ओर देखा । उसके मन की बात समझकर उन्होंने इकतारा  उसके हाथ से लिया और बजाते हुए गाने लगे-

प्रभुजी, तुम चंदन हम पानी । 
जाकी अँग अँग बास समानी ॥
प्रभुजी, तुम घन बन हम मोरा । 
जैसे चितवत चंद चकोरा ॥
प्रभुजी, तुम दीपक हम बाती । 
जाकी जोति बरै दिन राती ॥
प्रभुजी, तुम मोती हम धागा । 
जैसे सोनहिं मिलत सोहागा ॥
प्रभुजी, तुम स्वामी हम दासा । 
ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥


भजन पूरा करके उन्होंने पुनः उसे मीरा के हाथ में पकड़ा दिया । मीरा ने उसे बजाते हुए गाया -

कोई कछु कहे मन लागा ।
ऐसी प्रीत लगी मनमोहन ज्यूं सोने में सुहागा ॥
जनम-जनम का सोया मनुवा , सतगुरु सबद सुन जागा ॥
मात-पिता सुत कुटुम कबीला, टूट गया ज्यूं तागा ॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भाग हमारा जागा ॥

संत रैदासजी दो दिन मेड़ता में रहे । उनके जाने से मीरा को सुना-सुना लगा । वह सोचने लगी- ' दो दिन सत्संग का कैसा आनन्द रहा ? सत्संग में बीतने वाला समय ही तो सार्थक है । उनकी चित्तवृत्ति सदा निजानंद में कैसी रमी रहती है ? प्रभु ! ऐसी अवस्था मेरी कब होगी ?' वह गाने लगी-

छोड़ मत जाज्यो जी महाराज ।
मैं अबला बल नाँय गुँसाई, तुम ही मेरे सरताज ॥
मैं गुणहीन गुण नाँय गुँसाई, तुम समरथ महाराज ॥
थाँरी होय के किण रे जाऊँ, तुम ही हिवड़ा रो साज ॥

मीरा के प्रभु और न कोई राखो अबके लाज ॥

मीरा चरित्र से प्रेरित

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