Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 9


विवाह का प्रस्ताव

एक दिन मीरा अपने कक्ष के झरोखे में बैठी गिरधर लाल के बागे सी रही थी कि उसका ध्यान बाहर की ओर गया। वीरमदेवजी का खास सेवक रेशम के वस्त्र से ढका हुआ चाँदी का थाल लेकर रनिवास की ओर आ रहा था। मीरा को लगा कि वह मूँछों-ही-मूँछों में मुस्करा रहा है, प्रसन्नता अंग-अंग से छलकी पड़ती है। ' ऐसा क्या है ? कहीं बाबोसा ने अथवा बावजी हुकम ने ठाकुरजी के लिये कोई सामग्री तो नहीं भेजी ?'

वह उठकर द्वार से बाहर निकल आयी। ऊपर से देखा कि रनिवास के बड़े चौक में होकर किशन चित्तौड़ी रानी के महल की ओर घूम गया तो उसकी उत्सुकता समाप्त हो गयी वह लौटकर कक्ष में प्रवेश कर ही रही थी की ' फूलां ' ( वीरमदेवजी की बीचवाली पुत्री फुलकुंवारी ) दौड़ीआयी- 'जीजा ! जीजा ! मेरे साथ पधारो ।' उसने हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा।

 ' क्या है बाईसा ? कहाँ ले जा रही हैं आप मुझे ?' मीरा ने उसे लाड करते हुए पूछा।

' आप पधारो तो '

बहन का मन रखने के लिये मीरा साथ-साथ चल पड़ी । राणावतजी के महल की ओर घूमते ही वह समझ गयी कि किशन जो लाया है, वही दिखाने के लिए ले जाया जा रहा है। उसने एक बार और लौट जाना चाहा, किन्तु फूलां की जिद्द से विवश होकर वह साथ चल पड़ी। यों तो  मेड़ते के रनिवास में गिरिजाजी, वीरमदेव जी की तीसरी पत्नी थीं, किन्तु पटरानी वही थीं। उनके ऐश्वर्यपूर्ण ठाट निराले ही थे। 

पीहर से आये लवाजमे में पचासों दासियाँ और परम प्रतापी हिन्दुआ सूर्य की लाड़ली बहिन का वैभव ओर सम्मान सबसे अधिक था। यहाँ तक की दूदाजी ओर वीरमदेवजी भी उनका बहुत सम्मान करते थे। महल के मुख्य कक्ष में चाँदी से बने गंगा जमुनी काम के हिंगलाट (हिंडोला) पर से सर्वाभरण-भूषिता विराजमान रहतीं। उनकी दासियाँ भी सदा सजी-धजी नजर आतीं। 

उनकी रसोईं से एक-एक थाल सदा सौतों ओर देवरानियों के महलों में पहुँचता। दिन में एक बार वे अपनी बड़ी सौतों से अवश्य मिलतीं। वार-त्यौहार बड़ी सौतों के पाँव लगने जातीं, पर उस साड़ी विनम्रता, उदारता के बीच भी उनका ऐश्वर्य ओर दर्प सदा उपस्थित रहता। उनकी सरलता को ढोंग समझा जाता, उनकी ड्योढ़ी पर बैठे राणावत वीर अपनी मूंछें ऐंठते हुए वंश की गौरव गाथा बखानते रहते। 

नित्य ही प्रातः सायं दमामी ड्योढ़ी पर उपस्थित हो पितृ-वंश की चार पीढ़ियों के नाम लेते हुए विरद बखानते हुए प्रणाम करते- ' गढ़ चित्तौड़ी कुँवरी ने घणीखंभा, पारथीनाथ अन्नदाता।' गिरजाजी उन्हें आशीष के साथ दो मीठे बोल कहलवातीं और वे धन्य-धन्य हो जाते।

मीरा उनकी बहुत दुलारी बेटी थी। ये उसकी सुंदरता, सरलता पर जैसे न्योछावर थीं। बस, उन्हें उसका आठों प्रहर ठाकुरजी से चिपके रहना नहीं सुहाता था। घर में तीन-चार विवाह हुए, पर मीरा कहीं नजर नहीं आयी। किसी भी नेग-चार के लिये उसे श्यामकुंज से पकड़कर लाना पड़ता था। 

उसे बाँधने के तो दो ही पाश थे; भक्त-भगवंत चर्चा अथवा वीर गाथा। जब जब गिरजाजी मीरा को पातीं, उसे बिठाकर अपने पूर्वजों की शौर्य गाथा सुनातीं। बापा रावल ( कॉलभोज, जो चित्तौड़ राजवंश के मूल पुरुष थे ) की शिवभक्ति, शिव के द्वारा प्रदत चंद्रहास खंग की प्राप्ति। काबुल और ईरान तक उनका राज्य-विस्तार। सिसोदा के अधिपति का गुरु की आज्ञा से पिघला सीसा पान कर जाना। 

कुलदेवी बाणमाता की आज्ञा से राणा लाखा का अपने बारह पुत्रों का एक-एक करके राज्याभिषेक करके रण में भेजना। गोरा-बादल की वीरता, पद्मिनी का जौहर। हम्मीर की माता की बल-बुद्धि, हम्मीर का धर्म पालन, वीरता। चूंडा का राजपद त्याग और कर्तव्य पालन। कुम्भा, कुम्भा का चरित्र उसे सबसे अच्छा लगता, वे जैसे भक्त ह्रदय वैसे ही वीर, योग्य शासक, कालांवत, लेखक, कवि; क्या नहीं था उस नरसिंह में ?

' कभी-कभी विधाता की कलम कैसा सुन्दर अनोखा चित्र अंकित कर देती है !'.... वह सोचती।

कुम्भा के दूसरे पुत्र थे रायमल, इन्हीं रायमल की पुत्री है गिरजाजी और इनके भाई है महा प्रतापी साँगा ( संग्रामसिंह ) एक हाथ, एक पैर और एक आंख से हीन तथा अस्सी घावों के निशानों से भरी देह, किन्तु मातृभूमि और प्रजा, शरणागत के लिये प्राण हथेली पर लिये फिरने वाले एकलिंगनाथ के अवतार हों जैसे।

फुलाँ के साथ मीरा ने उनके निजी कक्ष में प्रवेश किया। उसने देखा कि किशन थाल लिये खड़ा है। गिरजाजी की दासी नर्मदा ने उसके हाथ से थाल लेकर गिरिजाजी के सामने किया। उन्होंने दाहिने हाथ से छूकर सम्मान दिया। किशन ने हाथ खाली होते ही झुककर प्रणाम किया। उन्होंने झूले पर बैठे-बैठे ही हाथ जोड़े और समीप खड़ी दासी से धीमे स्वर में कुछ कहा तो उसने किशन से कहा- बाईसा हुकम आशीष फरमा रही है।'

उसने नीची दृष्टि किये किये एक बार फिर झुककर प्रणाम किया। नर्मदा ने थाल खाली करके उसमें सुन्दर जरी का सरोपाव न्योछावर के लिए इक्कीस स्वर्ण मुद्राएँ, पान, मिष्ठान रखकर उसी प्रकार रेशमी वस्त्र से ढँककर गिरजाजी के हाथ से छुआ कर किशन को दिया। इसके अतिरिक्त एक सरोपाव, स्वर्ण की अंगूठी और इक्यावन चाँदी के सिक्के उनकी ओर से किशन को दिये गये। प्रणाम कर किशन उनकी और पीठ न करके पीछे की ओर चलता हुआ द्वार लाँघकर चला गया।

उसके जाते ही जैसे पूरे महल को किसी ने झकझोर कर जगा दिया हो, दासियों के हाथ यंत्र की भाँति चलने लगे। गद्दे और तोषकों के खोल बदले जाने लगे दीवारों के चित्र, द्वार पर लगे पर्दे उसके देखते-देखते बदल दिये गये। दो दासियाँ ढेर-के-ढेर दीपों में तेल और बाती लगाने लगी। शांत खड़ी या बैठी दासियाँ इधर-उधर शीघ्रता से आने जाने लगीं। उनके मुख की व्यग्रता मानो उनकी शीघ्रता से असंतुष्ट हो।

घूँघट उघाड़कर गिरजाजी ने हिंडोले के समीप खड़ी फुलाँ और मीरा को चारों और देखते पाया तो हँसकर दोनों के हाथ पकड़ अपनी और खींचकर समीप बिठा लिया।

' किशन दादा क्या लाया भाभा हुकम ?' मीरा ने पूछा।

' ऐ नर्मदा ! किशनजी जो लाये, वह लाकर इनको दिखा तो !- उन्होंने आज्ञा दी।

नर्मदा ने सब सामान दूसरे थाल में रखकर उनके सामने रख दिया। सल में, सितारों, मोतियों, और पन्ने जड़ी पोशाक थी गुलाबी रंग की। आभूषण और चाँदी की डिब्बी में पाँच पान के बीड़े, न्योछावर की ग्यारह स्वर्ण मुद्राएँ।

' यह सब कहाँ से आया भाभा हुकम ?- फुलाँ ने पूछा।

' यह आपके बावजी हुकम ने भेजा है बेटा !'

' और जो अभी आपने भेजा सो ?'

' वह आप के बावजी हुकम के लिए है।'

' आज ऐसा क्यों हो रहा है ? नित्य तो किशन दादा लेकर नहीं आता।'

' आज आपके बावजी हुकम ( पिताजी ) रात का भोजन इस महल में करेंगे, इसीलिये यह बीड़ा भेजा है। जब आपके भाभा हुकम के पास वे भोजन करने पधारते हैं तो ऐसा ही बीड़ा किशनजी वहाँ ले जाते हैं।'

' ये सब जिजियाँ इतनी भागमभाग क्यों कर रही हैं भाभा हुकम !'- मीरा ने पूछा।

' ये सब तुम्हारे बावजी हुकम के स्वागत की तैयारी में लगी हैं बेटी!'

' मेरे कुँवरसा भोजन आरोगने पधारते हैं तो ऐसा कुछ नहीं होता।'

' वे छोटे हैं बेटी ! यह सब झंझट बड़ों के जीव को ही लगते हैं। छोटे लोग सहज रूप से ही जी लेते हैं।'

उसी समय दो खवासिनों ने अपनी सास के साथ आकर धोक दी। उनकी सास को गिरजाजी ने हाथ जोड़े- ' आओ बलदेवजी की बहू ! सब प्रसन्न तो हैं न घर में ? अब बलदेवजी का स्वास्थ्य कैसा है ?'

' अब तो चलने-फिरने लगे हैं सरकार ! अभी-अभी समाचार मिला कि सरकार को स्नान-श्रृंगार कराना है तो हाजिर हो गयी।'

' ये दोनों रामचंद्रजी और रामेश्वरजी की बहू हैं ?'- उन्होंने पूछा।

' हाँ हजूर।'

दासी ने आकर बताया कि स्नान की सामग्री प्रस्तुत है।

मैं जाऊँ स्नान करने ?'- उन्होंने अपनी दोनों बेटियों से पूछा।

' पधारो।'- कहकर दोनों ही हिंडोले से उतर पड़ीं। मीरा श्यामकुंज की ओर तथा फुलाँ अपनी सखियों के पास।

रात ठाकुर जी को शयन कराकर मीरा उठ ही रही थी कि गिरजाजी की दासी चन्दन ने आकर धीरे से कहा- ' बड़ा बावजी हुकम अपने याद फरमावे ( बड़े कुँवरसा आपको बुला रहे है )।'

' क्यों ? अभी ?' उसने चकित हों पूछा।

दासी के साथ जाकर मीरा ने देखा कि चित्तौड़ की रानी का महल प्रकाश से नहा गया है। नीचे दमामणियाँ गा रही हैं। पूरा महल नीचे से ऊपर तक सुगन्ध से गमगमा रहा है। सभी महलों  से न्योछावरें और मनुहारें आ रही हैं, अतः सेवक-दासियाँ इधर से उधर भागते-से चल रहे हैं। छोटे भाई तो स्वयं ही आ गये थे न्यौछावर करने। उसकी बड़ी माँ भी उस बहुमूल्य पोशाक में कितनी सुन्दर लग रही थी ! वे घूँघट काढ़े वीरमदेवजी के पास ऊँची गद्दी पर विराजमान थीं। दोनों को देखकर लगता था अभी-अभी विवाह से लौट मौर-कंगन खोलकर बैठे हों।

उसे आयी देख वीरमदेव ने पुकारा- ' मीरा ! इधर मेरे पास आ बेटी !'

दोनों को प्रणाम कर वह वीरमदेवजी के पास बैठ गयी।

' तुम्हारी यह माँ कैसी लगती है तुम्हें ?' उन्होंने मुस्कुराकर पूछा।

माँ तो माँ होती है। माँ कभी बुरी नहीं होती।'- मीरा ने हँसकर कहा।

इनके पीहर का वंश, वह कैसा है ?'

' यों तो इस विषय में मुझसे अधिक आप जानते होंगे। यदि मुझसे ही सुनना चाहते हों तो हिंदुआ सूर्य का वंश संसार में सर्व सर्वोपरि है।'

' क्या हमसे भी अधिक बेटी ?'- आज वीरमदेवजी प्रसन्न जान पड़ते थे। इस पर भी उनसे बात करने की हिम्मत कम-से-कम बच्चों की नहीं हो पाती थी। केवल मीरा थी, जो न किसी से अनावश्यक लाज करती, न उसे भय लगता था।

' मेरी समझ में तो बावजी हुकम ! आरम्भ में सभी वंश श्रेष्ठ ही होते हैं। उसके किसी वंशज के दुष्कर्म के कारण अथवा हल्की जगह विवाह सम्बन्ध से ही लघुता आती है। होने को तो सिसोदिया वंश में भी उदा हत्यारा जैसे पितृहन्ता और पृथ्वीराज-जगमाल जैसे भाई को मारने का प्रयत्न करने वाले हुए ही है, किन्तु परंपरागत एकलिंग के दीवानों के गुण-गरिमा के सम्मुख वे छोटे-मोटे दूषण दब जाते हैं ।'

उसने हँसकर बड़ी माँ की और देखा- ' भाभा हुकम ! अब तो यहाँ केवल जिजियाँ ही है, घूँघट उठा दीजिये न। लग रहा है, जैसे बावजी हुकम अभी-अभी आपको ब्याह के मंडप से उठाकर ले पधारे हों। कोई आयेगा तो पहरे पर खड़ी जीजी आकर बता देगी।'

मीरा की बात का जब वीरमदेवजी ने भी समर्थन किया तो गिरजाजी ने घूँघट सिर पर रख लिया। मीरा ने उनका मुख देखकर कहा- ' कितनी सुन्दर लग रही हैं आप ?'

मीरा चरित्र से प्रेरित


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