Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 10


विवाह का प्रस्ताव -2

'तेरे जैसी तो नहीं ! तू तो रूप की खान है मेरी लाडलपूत !' - उन्होंने मीरा के मुख को अंजलि में भरते हुए प्यार से कहा।

'रूप की खान' शब्द सुनते ही मीरा के हृदय में विधुत रेखा लहरा-सी गयी। मुख से कराह निकलते-निकलते रह गयी। मुँह पर आयी विवर्णता को देखकर वीरमदेवजी ने पूछा - 'स्वास्थ्य तो ठीक है न?'

'हुकम।' -  मीरा ने सिर हिलाया।

'तुम्हारी इन माँ के भतीजे हैं भोजराज। रूप और गुणों की खान...'

'मैंने सुना है।' - बीच में ही मीरा ने कहा।

'वंश और पात्र में कहीं कोई कमी नहीं है। राणावतजी तुझे अपने भतीजे की बहू बनाना चाहती हैं।

'बावजी हुकुम!' - मीरा ने सिर झुका लिया- 'ये बातें बच्चों से करने की तो नहीं हैं?'

'जानता हूँ बेटी! पर दाता हुकम ने फरमाया है कि मेरे जीवित रहते मीरा का विवाह नहीं होगा। बेटी बाप के घर में नहीं खटती है बेटा! यदि तुम मान जाओ तो दाता हुकम को मनाना सरल होगा। बाद में ऐसा घर-वर शायद न मिले। मुझे भी तुमसे ऐसी बातें करना अच्छा नहीं लग रहा है, किन्तु कठिनाई ही ऐसी आ पड़ी है। तुम्हारी माताएँ कहती है कि हमसे ऐसी बातें कहते नहीं बनती। पहले उसे योग-भक्ति सिखायी, अब विवाह के लिये पूछते फिरते हैं। इसी कारण स्वयं पूछ रहा हूँ बेटी!'

'बावजी हुकम!' रुंधे कंठ से मीरा केवल संबोधन ही कर पायी। ढलने को आतुर आँसुओं से भरी बड़ी-बड़ी आँखे उठाकर उसने अपने बड़े पिताजी की ओर देखा। हृदय के आवेग को अदम्य पाकर वह एकदम से उठकर माता-पिता को प्रणाम किये बिना ही दौड़ती हुई कक्ष से बाहर निकल गयी।

वीरमदेवजी ने देखा - मीरा के रक्तविहीन मुख पर व्याघ्र के पंजे में फँसी गाय के समान भय, विवशता और निराशा के भाव और मरते पशु के आर्तनाद-सा विकल स्वर 'बावजी हुकम' कानो में पड़ा तो वे विचलित हो उठे। वे रण में प्रलयंकर बनकर शवों से धरती पात सकते हैं; वे व्याघ्र, हाथी और भैंसे से, साँड़ से, निःशस्त्र केवल भुजबल से युद्ध करके उन्हें यमलोक पहुँचा सकते हैं; किन्तु... किन्तु... किसी अवश-विवश प्राणी की ऐसी आँखें वे नहीं देख सकते, नहीं सह सकते...। उन्हें तो ज्ञात ही न हुआ कि मीरा 'बावजी हुकम' कहते ही दौड़कर कक्ष से बाहर कब चली गयी।

मीरा शीघ्रतापूर्वक सीढ़ियाँ उतरती चली गयी। वह नहीं चाहती थी कि कोई उसकी आँखों में आँसू देखे, अतः जितना शीघ्र हो सके, इस जगमगाते महल और चौक को वह पार कर जाना चाहती थी। जिसने भी उसे दौड़ते हुए देखा, चकित रह गया। किसी किसी ने तो पुकारा भी - 'क्या हुआ बाईसा! इतनी तेजी से कहाँ पधार रही हैं?'

मीरा ने न पुकारने वालों को उत्तर दिया और न उन चकित आँखों की ओर देखा। वह दौड़ती हुई अपने कक्ष में गयी और धम्म से पलंग पर औंधी गिर पड़ी। हृदय का बाँध तोड़कर रुदन उमड़ पड़ा - 'यह क्या हो रहा है मेरे सर्व-समर्थ स्वामी! अपनी पत्नी को दूसरे के घर देने अथवा जाने की बात तो साधारण-से-साधारण, कायर से-कायर राजपूत भी नहीं कर सकता। शायद तुमने मुझे स्वीकार ही नहीं किया, अन्यथा... तो...। यदि तुम अल्पशक्ति होते तो मैं तुम्हें दोष नहीं देती। तब यही सच है कि तुमने स्वीकार ही नहीं किया...। न किया हो, सर्वतंत्र स्वतन्त्र हो तुम; किसी जोर तो है नहीं तुम पर। पर मैंने तो स्वीकार कर लिया है तुम्हें; अपने पति के रूप में। मैं कैसे अब दूसरा पति वर लूँ? और कुछ न सही, शरणागत समझकर ही रक्षा करो... रक्षा करो! अरे, ऐसा तो निर्बल-से-निर्बल राजपूत भी नहीं होने देता। यदि कोई सुन भी लेता है कि अमुक कुमारी ने उसे वर्णन किया है तो प्राणप्रण से वह उसे बचाने का, अपने यहाँ लाने का प्रयत्न करता है। तुम्हारी शक्ति तो अनन्त है, करुणावरुणालय हो, शरणागतवत्सल हो, पतितपावन हो, दीनबन्धु हो, अनन्त-सौंदर्य-पारावार हो, भक्त-भयहारी हो...! कहाँ तक गिनाऊँ... इन्ही बातों को सुन-सुनकर तो हृदय में आग लगी है। श्यामसुन्दर! मेरे प्राण! तुम्हारी लगायी यह आग अब दावाग्नि बन गयी है। अब मेरे बसकी नहीं रही...। इतनी अनीति मत करो मोहन...! मत करो... मत करो! मेरे तो तुम्हीं रक्षक हो, तुम्हीं सर्वस्व हो, अपनी रक्षा के लिये मैं किसे पुकारूँ ?... किसे पुकारूँ...।'

मीरा अचेत हो गयी। उस हँसी-ख़ुशी, राग-रंग के बीच कोई न जान सका कि दुःख के अथाह सागर में डूबकर अपने कक्ष में मीरा अचेत पड़ी है।

मीरा चरित्र से प्रेरित

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