Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 12



वीर शिरोमणि रावदूदा जी का महाप्रयाण -2

श्रीकृष्ण चैतन्य संन्यासी होकर भी प्रेमी हैं महाराज?'- मीरा ने बीच में ही पूछा।

'यों तो बड़े-बड़े दिग्विजयी वेदान्तियों को भी पराजित कर दिया है, परन्तु उनका सिद्धान्त है कि सब शास्त्रों का सार भगवत्प्रेम है और सब साधनों का सार भगवन्नाम है। त्याग ही सुख का मूल है। तप्त कांचन गौरवर्ण सुन्दर सुकुमार देह, ब्रजरस में छके श्रीकृष्ण चैतन्य का दर्शन करके लगता है मानो स्वयं श्रीकृष्ण ही हों। वे जाति-पाँति, ऊँच-नीच नहीं देखते। 'हरि को भजे सो हरि का होय' मानते हुए घूम-घूम करके हरि-नामामृत का पान करते हैं। अपने हृदय के अनुराग द्वार खोलकर सबको मुक्त रूप से प्रेमदान करते हैं।'- इतना बोलते-बोलते गला भर आया। 

मीरा के भी नेत्रों से बूंदे छूने लगी थीं। दूदाजी आँखें बंद करके सुन रहे थे। संत के रुकते ही उन्होंने आँखें खोलकर उनकी और देखा। उस दृष्टि का अर्थ समझकर संत कहने लगे- 'दक्षिण से चलकर मैं पण्ढरपुर आया। वहाँ केशवानंद नाम के ज्ञानी महात्मा मिले....। 

केशवानंद का नाम सुनते ही दूदाजी ने चौककर सिर उठाया। 'गोरे से लम्बे वृद्ध महात्मा, मुस्कान जिनके होठों की नित्यसंगिनी है?'- उन्होंने संत की और देखकर पूछा। 

'हाँ, वही।'

वे मीरा के जन्म से पूर्व पधारे थे। उन्हीं के आशीर्वाद का फल है यह मीरा।' 

-उन्होंने मीरा की और हाथ से संकेत किया, फिर बोले- 'फिर क्या हुआ महाराज?'

'उन्हें जब मेरे वृन्दावन जाने की बात ज्ञात हुई तो एक माला मुझे देते हुए उन्होंने कहा कि "तुम पुष्कर होते हुए मेड़ते जाना और वहाँ के राजा दूदा राठौड़ को यह माला देकर कहना कि वे इसे अपनी पोत्री को दे दें। मैंने थोड़े ही दिनों में समाधि लेने का निश्चय किया है।" पण्ढरपुर से चलकर मैं पुष्कर आया और प्रभु ने कृपा करके ठीक समय पर मुझे यहाँ पहुँचा दिया। -यह कहकर उन्होंने अपनी झोली से माला निकाली और दूदाजी की और बढ़ाई। 

दूदाजी ने संकेत से मीरा को से लेने को कहा। उसने बड़ी श्रद्धा और प्रसन्नता से उसे अंजलि में लेकर सिर से लगाया। दूदाजी लेट गये- 'आपके रूप में आज भगवान पधारे हैं महाराज! यों तो सदा ही संतो को भगवत्स्वरूप समझकर जैसी बन पड़ी, सेवा की है, किन्तु आज महाप्रयाण के समय आपने पधारकर मेरा मरण भी सुधार दिया।' उनके बंद नेत्रों की कोरों से आँसू निकलकर सिरहाने को भिगोने लगे। 

'ऐसी बात क्यों फरमाते हैं दाता हुकम!' रायसल ने भरे गले से कहा। 'जो निश्चित है, उसकी ओर से आँख नहीं मूँदना बेटा! यदि प्राण रहे भी तो यह जर्जर देह इन्हें धारण करने की क्षमता कितने दिन जुटा पायेगी? फिर फूली हुई फुलवारी-सा यह मेरा परिवार, कर्तव्यपरायण पुत्र, अपने अलौकिक गुणों से भविष्य में सारे देश को अलौकिक करने वाली विदुषी और भक्तिपरायणा पौत्री मीरा तथा अभिमन्यु-सा होनहार वीर पौत्र जयमल- ऐसे भरे-पूरे परिवार को छोड़कर जाना मेरा परम सौभाग्य है पुत्र! मन को मलिन मत करो। चारभुजानाथ की छत्रछाया और अपना कर्तव्य, केवल यही स्मरण रखो।' पुत्र के प्रति इतना कहकर उन्होंने पुकारा 'मीरा!' 

'हुकम बाबोसा!' 

'जाते समय भजन तो सुना दे बेटा!' 

'जैसी आज्ञा बाबोसा!' उसने तानपुरा उठाया, उँगलियाँ फेरकर स्वर साधा और अलाप ले गाने लगी-

प्रभु तेरे नाम लुभाणी हो।
नाम लेत तिरता सुण्या जैसे पाहन पाणी हो॥
सुकृत कोई ना कियो बहु करम कमानी हो।
गणिका कीर पढ़ावती बैकुण्ठ बसाणी हो॥
अरध नाम कुंजर लियो बाँकी विपत घटाणी हो।
गरुड़ छाँडी हरि धाइया, पसु जूण मिटाणी हो॥
अजामिल से उधरे जमत्रास हराणी हो।
पुत्र हेतु पदवी दयी जग सारे जाणी हो॥
नाम महातम गुरु दियो सोई वेद बखाणी हो।
मीरा दासी रावरी अपनी कर जाणी हो॥

पद पूरा हुआ, पर भैरवी की मधुर रागिनी ने सबके मन को बाँध लिया। मधुर संगीत और भावमय पद श्रवण करके श्री चैतन्यदास अपने को रोक नहीं पाये- 'धन्य, धन्य मीरा ! आज तुम्हारे दर्शन करके मेरे नेत्र धन्य हो गये। तुम्हारा अलौकिक प्रेम, संतों पर श्रद्धा, भक्ति की लगन, चराचर को मोहित करने वाला मधुर कंठ, प्रेम रस में छके ये नेत्र-इन सबको देख कर ऐसा लगता है मानो, तुम कोई व्रजगोपीका हो। वे जन भाग्यशाली होंगे, जो तुम्हारी इस भक्ति-प्रेम की वर्षों में भीगकर आनन्द लूटेंगे। राजन ! धन्य हैं आप और आपका यह वंश, जिसमें यह नारी-रत्न प्रकट हुआ।'

मीरा ने सिर नीचाकर इस असहनीय प्रशंसा को सुना और संत के चुप होने पर प्रणाम करते हुए धीरे से कहा- 'कोई अपने से कुछ नहीं होता भगवन !....' -उसने वाक्य अधूरा छोड़कर उनकी और देखा।

दूदाजी ने संत के लिए आहार व्यवस्था का संकेत किया। केवल कुछ फल-दूध लेकर श्रीचैतन्यदासजी चलने को प्रस्तुत हुए। राजपुरोहितजी और विरमदेव जी का आग्रह भी उन्हें रोक नहीं सका।

दूदाजी की आँख लगी देख पुरोहितजी को छोड़कर और सब उठ गये। मीरा भी अपने कक्ष में आ गयी, पर उसके मन में रह-रह करके एक नाम बार-बार गूँज रहा था- 'श्री कृष्ण चैतन्य....! न जाने तुम कौन हो....? तुम्हारे प्रभु-प्रेम ने मुझे तुम्हारी दासी बना दिया है न जाने इस जन्म में तुम्हारे दर्शन होंगे भी या नहीं, किन्तु इस अल्पज्ञा मीरा पर कृपापूर्ण वरद हस्त बनाए रखना ! जहाँ हो, वहीं से आशीर्वाद दो ! कभी तुम्हारे प्रेममय चरणों की धूलि सिर पर चढ़ाकर यह शुष्कहृदया एकाध प्रेम-सीकर पा धन्य हो जाय !'

अपने गिरधर गोपाल की सांध्य आरती-भोग करके मीरा दूदाजी के पास चली गयी। इस बीच उसकी माँ और राजपरिवार की स्त्रियाँ पुरोहितानीजी को साथ ले उससे दूदाजी का स्वास्थ्य समाचार जानने आयी थीं। बहुत कुछ तो उसके उदास मुख ने ही कह दिया, बाकी उसने कहा- 'बुढ़ापा देह का सबसे बड़ा रोग है भाभा हुकम ! अब बाबोसा की देह जर्जर हो गयी है। यह गली हुई दे छूट जाने में उनका लाभ है। हम तो अपने स्वार्थ को रोते हैं कि उनके रहने से हमें उत्तरदायित्व का बोझ महसूस नहीं होता।'

'कैसी लड़की है यह ?' -कईयों ने मन में कहा- 'कैसे सरलता से अपने सबसे प्रिय बाबोसा के लिए मरण-कामना कर गयी।'

मीरा ने देखा के दूदाजी का अंतर्मन चैतन्य था, किन्तु देह की शिथिलता बढ़ती जा रही थी। 'बाबोसा ! मैं भजन गाऊँ ?' -उसने पूछा। दूदाजी ने आँख खोलकर उसकी ओर देखा। संकेत समझकर मीरा गाने लगी-

मैं तो तेरी शरण पड़ी रे रामा ज्यूँ जाणे त्यूँ तार।
अड़सठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आयो मन नहीं मानी हार॥
या जग में कोई नहीं अपणा सुणियो श्रवण मुरार।
मीरा दासी राम भरोसे जम का फेरा निवार॥

धीरे-धीरे उनकी चेतना लुप्त होने लगी। नेत्र अधखुले ही रहने लगे। मीरा ने अपने दासियों को बुला लिया। उनके साथ वह धीमे स्वर में कीर्तन करने लगी-

जय चतुर्भुजनाथ दयाल। जय सुन्दर गिरधर गोपाल॥ 

ब्रह्म मुहूर्त में दूदाजी की वाणी में कुछ चेतना जागी। पुरोहितजी ने गंगाजल मिश्रित चरणामृत मुख्य में दिया। उनके मुख से अस्फुट स्वर निकले- 'कितना सुन्दर... भजन.... हो.... रहा.... है.... फूल.... बरस.... रहे.... हैं.... प्रभु.... पधार.... रहे.... हैं.... जय.... ज.... य.... चार.... भु.... जा.... नाथ.... की.... ज.... य.... ज.... य.... !'

मीरा के भक्ति संस्कारों को पोषण देने वाले, मेड़ता राज्य के संस्थापक, मेड़तिया शाखा के पूर्वज, परम वैष्णव भक्त, वीर शिरोमणि राव दूदाजी पचहत्तर वर्ष की आयु में यह भवसागर छोड़कर गोलोक सिधारे।

मीरा चरित्र से प्रेरित

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