Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 11


वीर शिरोमणि रावदूदा जी का महाप्रयाण

रावदूदा जी अब अस्वस्थ रहने लगे थे। अपना अंत समय समीप जानकर ही सम्भवतः उनकी ममता मीरा पर अधिक बढ़ गई थी। उसके मुख से भजन सुने बिना उन्हें दिन सूना लगता। मीरा भी समय मिलते ही उनके पास जा बैठती। उनके साथ भगवतचर्चा करती। अपने और अन्य संतों के रचे हुए पद सुनाती। ऐसे ही उस दिन भी मीरा श्यामकुंज में गिरधरलाल की सेवा-पूजा करके पद गा रही थी।-

प्रणाम करके तानपुरा एक और रखा और गंगा ने बताया- 'राजपुरोहित जी आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। 
पुरोहित जी ने बताया- 'महाराज आपको याद फरमा रहे हैं।' 

मीरा ने जाकर देखा कि दूदाजी के पलंग के समीप वीरमदेव, रायसल, रायमल, रतनसिंह और पंचायण पाँचों पुत्र, राजपुरोहितजी, राजवैद्यजी, दीवानजी आदि मुख्य-मुख्य व्यक्ति बैठे हैं।

'मुझे किसी ने बताया ही नहीं कि बाबोसा का स्वास्थ्य आज इतना गिर गया है और जोधपुर से छोटे कुँवरसा  (रायमल) और काकोसा (पंचायण) भी पधार गये हैं।- मीरा ने मन में सोचा। 

सहसा आँखें खोलकर दूदाजी ने पुकारा- 'मीरा' 

'मैं हाजिर हूं बाबोसा!' मीरा तत्परता से उठकर उनके समीप पहुंच गयी। दूदाजी बोले- 'मीरा! भजन गाओ बेटी!'

स्वामी सब संसार के हो, साँचे श्री भगवान।
स्थावर जंगम पावक पाणी, धरती बीच सामान।
सबमे महिमा तेरी देखी, कुदरत के करबान॥
विप्र सुदामा को दारिद खोयो, व्हाला कि पहिचान।
दो मुटठी तंदुल कि चाबी, दिनों द्रव्य महान॥
भारत में अर्जुन के आगे, आप भये रथवान।
उसने अपने कुल को देखा, छूट गये तीर कमान॥
ना कोई मारे ना कोई मरता, तेरा यह अज्ञान।
चेतन जीव तो अजर अमर है, यह गीता को ज्ञान॥
मो पर तो प्रभु किरपा कीजो, बाँदी अपनी जान।
मीरा गिरधर सरन तिहारी, लगे चरण में ध्यान॥

पद पूरा हुआ दूदाजी ने चारभुजानाथ के दर्शन की इच्छा प्रकट की। तुरन्त पालकी मँगायी गयी। उन्हें पालकी में बैठाकर चारों बेटो ने पालकी सम्भाली। भाइयों के आग्रह से वीरमदेवजी छत्र लेकर पिताजी के साथ चले। दो घड़ी तक वे दर्शन करते रहे। लौटते समय पुजारी खूबीरामजी ने चरणामृत, तुलसीमाला और कंठी प्रसाद भेंट किया। वहाँ से लौटकर श्यामकुंज में गिरधर गोपाल के दर्शन किये- 'अब चल रहा हूँ स्वामी! अपनी भक्त मीरा को सँभाल लेना प्रभु!' उन्होंने मन-ही-मन कहा। महल में लौटकर वे आँखें मूँदकर सो गये। मीरा ने उनके मस्तक का पसीना पोंछा।

'वैद्यजी परीक्षा की आज्ञा चाहते हैं दाता हुकम!'- रतन सिंह ने कहा। 

आँखे मूँदे हुए ही उन्होंने जरा-सा हाथ हिलाकर संकेत किया- 'थोड़ा रुको।' 

कुछ देर बाद उन्होंने आँखें खोलीं- 'अब आपकी दवा के दिन बीत गये वैद्यजी! अब तो "औषधं  जहान्वी तोयं वैद्यों नारायणो हरिः" है।'

'मेरी दो अभिलाषाएँ हैं।'- उन्होंने वीरमदेव की ओर देखा।

'हुकम दीजिये!' पाँचों बेटे एक साथ बोल पड़े। 

'पंचायण! रायमल! तुम दोनों मेढ़ता से बाहर रहते हो। देखो, जिसकी सेवा में हो, कभी स्वामी भक्ति में दाग न लगने देना। यदि कभी जोधपुर और मेड़ता में ठन जाये तो भाई समझकर युद्ध से मुख न मोड़ लेना। मेरे रक्त को लजाना मत।' सुनकर दोनों भाइयों की आँखें भर आयीं। हाथ जोड़कर उन्होंने मस्तक झुका दिये।

'रतनसिंह मेरी तलवार लाओ तो!' 

रतनसिंह उठकर उनके तलवार लाये। दोनों हथेलियों पर रखकर थोड़ा झुक गये। दूदाजी में उस तलवार को देखकर जैसे जोश भर गया। बायें हाथ में लेकर दाहिने हाथ से तलवार को मयान से बाहर निकाला। मयान नीचे रखकर धार पर बायें हाथ का अँगूठा फेरा। यौवनकाल के कितने ही रणांगण उनके मानस में घूम गये। इस शौर्य-सहायिका ने कितने दुष्टों की बलि ली, कोई गणना नहीं। 'रक्ताश्नी माँ करालिके! अब तक मैं बड़े गर्व से तुम्हें धारण करता रहा हूँ। शास्त्रधर्म के अनुसार तुम्हें संतुष्ट करता रहा हूँ। जगदम्बे! प्रजाजन रक्षण और अत्याचारियों के दमन हेतु धारण की हुई इस शक्ति द्वारा जान-अनजान में मुझसे जो अपराध बन पड़े हों, उनके लिये क्षमा माँगता हूँ माँ। अब मैं इस शक्ति से विदा लेकर तुमसे काल से जूझने की आंतरिक शक्ति की याचना करता हूँ! इसके साथ ही सांसारिक व्यवहार, कर्तव्य और कामनाओं का, जो शेष रह गयीं हों, उनका अब पूर्ण रूप से विसर्जन करता हूँ। बेटा वीरमदेव! उठो, यह तलवार शक्ति-शौर्य का सहायिका है। इसे मेरी आज्ञा से अब तुम धारण करो। माँ दुर्गा की आराधना करते हुए प्रजा की रक्षा के लिये तुम इसे स्वीकार करो। इसके साथ ही प्रजारक्षण, अन्याय का दमन और कर्तव्य का यह भार भी तुम्हारे कंधे वहन करे। ऐसा मेरा आशीर्वाद है!'

पिता की आज्ञा से वीरमदेव उनके पलंग के समीप जाकर और विनयपूर्वक दोनों हाथ फैलाकर झुक गये। दूदाजी ने दोनों हाथों में लेकर सिर से लगा कर राजा के समस्त कर्तव्यों सहित व भारी तलवार वीर पुत्र के हाथों पर रख दी। वीरमदेव राजपुरोहितजी और पिता को प्रणाम करके यथास्थान बैठ गये। 

आपकी वे दो अभिलाषाएँ क्या है दाता हुकम?'- उन्होंने पूछा।

'हाँ, मीरा-जयमल मेरे पास आओ बेटा! मैं जयमल को योद्धा वेष में और मीरा को अपनी राजसी पोशाक में देखना चाहता हूँ।'- उन्होंने दोनों बालकों के हाथ थामकर कहा।

रायसल उठकर जयमल को योद्धा वेश में सजाने ले चले और मीरा ने भी रनिवास की ओर पग बढ़ाये। थोड़ी देर बाद ही दोनों भाई-बहिन सुसज्जित होकर लौट आये। बालक जयमल की देह पर वेश खिल उठा। कमर में तलवार, पीठ पर ढाल और हाथ में भाला लिये हुए अपने होनहार पौत्र को देखकर वृद्ध दूदाजी की आँखें चमक उठीं। सर्वाभरणभूषिता मीरा की रूप छटा देखकर लगता था मानो लक्ष्मी ही अवतरित हो गयी हों।
दूदाजी ने बैठने की इच्छा प्रकट की। पुत्रों ने पीठ की ओर मसंद की ओट लगाकर उन्हें बैठा दिया। कृष्ण- सुभद्रा जैसी भाई-बहिन की जोड़ी ने सम्मुख आकर उनके चरणों में मस्तक झुकाया। उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ रखा। कुछ देर उनके मुख को देखते रहे, फिर आशीर्वाद देते हुए बोले- 'प्रभु कृपा से, तुम दोनों के शौर्य व भक्ति से मेड़तिया कुल का यश संसार में गाया जाएगा! भारत की भक्तमाल में तुम दोनों उज्जवलमणि होकर चिरकाल तक प्रकाशित होते रहो! तुम दोनों का सुयश पढ़-सुन करके लोग भक्ति और शौर्य की असिधारा- व्रत पर चलने का उत्साह पाते रहें! भगवान चारभुजानाथ की कृपा तुम दोनों पर बनी रहे!' उनकी आँखों से मानो आशीर्वाद स्वरूप आँसू झर पड़े। दोनों भाई-बहिन  उनके पलंग के पास ही बैठ गये।

'अब दूसरी इच्छा फरमायें!'- वीरमदेवजी का विनम्र किन्तु गम्भीर स्वर गूँजा।

'बेटा! संसार छोड़ते समय संत-दर्शन की लालसा थी।'- उन्होंने थोड़े हताश स्वर में कहा- 'यह तो प्रभु के हाथ की बात है बेटा!'

लेटने की इच्छा प्रकट करने पर रायमल और पंचायण ने उन्हें लिटा दिया। वीरमदेवजी ने उसी समय पुष्कर की ओर सवार दौड़ाये संत की खोज में।

वह रात्रि शांतिपूर्वक बीत गयी। प्रातः नित्य-कृत्य और गिरधर गोपाल के भोग-राग से निवृत्त होकर मिला दूदाजी के पास आयी। प्रणाम करके आज्ञा पाकर वह गाने लगी-

नहीं ऐसो जनम बारम्बार।
क्या जानूँ कछु पुण्य प्रगटे मानुसा अवतार॥
बढ़त पल पल घटत दिन दिन जात न लागे बार।
बिरछ के ज्यों पात टूटे लगे नहिं पुनि डार॥
भवसागर अति जोर कहिये विषम ऊंडी धार।
राम नाम का बाँध बेड़ा उतर परले पार॥
ज्ञान चौसर मँडी चौहटे सुरत पासा सार।
या दुनिया में रची बाजी जीत भावै हार॥
साधू संत महंत ज्ञानी चलत करत पुकार।
दास मीरा लाल गिरधर जीवणा दिन चार॥

पद पूरा करके अभी मीरा ने तानपूरा भूमि पर रखा ही था कि द्वारपाल ने आकर हाथ जोड़ निवेदन किया- 'अन्नदाता! बाहर कोई साधु पधारे हैं।

उसकी बात सुनते ही दूदाजी एकदम चैतन्य हो गये, मानो बुझते दीपक की लौ भभक उठीं।  आँख खोलकर उस और देखा और उसे संकेत किया संत को पधराने को। वीरमदेवजी, रतनसिंह, राजपुरोहितजी उनका स्वागत करने के लिये एक पग ही बढ़ने पाये थे कि द्वार पर गम्भीर स्वर सुनायी दिया- 'राधेश्याम।'

सब की दृष्टि उस और उठ गयी। मस्तक पर घनकृष्ण केश, भाल पर तिलक, कंठ और हाथ तुलसी माला से विभूषित, श्वेत वस्त्र, भव्य मुख वैष्णव संत के दर्शन हुए। संत के मुख से श्रीराधेश्याम, यह प्रियतम नाम सुनकर उल्लसित हो मीरा ने उन्हें प्रणाम किया। फिर दूदाजी से कहा- 'आपको संत-दर्शन की इच्छा थी न बाबोसा? देखिये, प्रभु ने कैसी कृपा की!'

संत ने मीरा को आशीर्वाद दिया- 'प्रभु मंगल करें!'

दूदाजी ने कहा- 'पुरोहितजी महाराज! मुझे भी संत के दर्शन करा दीजिये।'

परिस्थिति को समझकर साधु स्वयं ही उनके समीप चले गये। उठने का संकेत करने पर रायमल और पंचायण ने पीछे से सहारा दिया। दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने सिर पलंग की पाटी पर रखा, फिर पूछा- 'कहाँ से पधारना हुआ महाराज?'

'दक्षिण से आ रहा हूँ राजन! नाम चैतन्यदास है। कुछ समय पहले गौड़ देश के एक प्रेमी सन्यासी श्रीकृष्ण चैतन्य तीर्थाटन करते हुए मेरे गाँव पधारे थे। उनकी इस दास पर पूर्ण कृपा हुई और मुझे वृन्दावनवास की आज्ञा मिली। तीर्थों में घूमते हुए वृन्दावन जा रहा हूँ।'

मीरा चरित्र से प्रेरित

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