Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 14




राजकुँवर भोजराज की भीष्म-प्रतिज्ञा 

भोजराज पहली बार भुवा गिरजाजी के ससुराल आए थे। भुवा के दुलार की सीमा न रही। एक तो हिन्दुआ सूर्य के पाटवी कुँवर, दूसरे भुवा के लाडले भतीजे और तीसरे मेड़ते के भावी जमाई होने के कारण इस महँगे-दुर्लभ पाहुने की घड़ी-घड़ी महँगी हो रही थी। पल-पल में लोग उनका मुख देखते रहते और मुख से कुछ निकलते ही उनके हुक्म और इच्छा पूरी करने के लिये एक के स्थान पर कई दास-दासियाँ दौड़ पड़ते। उनकी सुख-सुविधा में लोग स्वयं बिछे जा रहे हों कि क्या न कर दें इनकी प्रसन्नता के लिये। 

जयमल और भोजराज की सहज ही मैत्री हो गयी। दोनों ही इधर-उधर घूमते-घुमाते फुलवारी में आ निकले। सुन्दर श्यामकुंज मन्दिर को देखकर भोजराज के पाँव उसी और उठने लगे। मीठी रागिनी सुनकर उन्होंने जयमल की ओर देखा। जयमल ने कहा- 'मेरी बड़ी बहन मीरा है। इनके रोम-रोम में भक्ति बसी हुई है।'

'जैसे आपके रोम-रोम में वीरता बसी है। -भोजराज ने जयमल की बात काटते हुए हँसकर कहा- 'भक्ति और वीरता, भाई-बहन की ऐसी जोड़ी संसार में ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेगी। विवाह कहाँ हुआ इनका ?'

'विवाह ? विवाह की क्या बात फरमाते हैं आप ? विवाह का नाम सुनते ही जीजा की आँखों से आँसुओं के झरने बहने लगते हैं। कभी बचपन में आपके साथ सगाई की चर्चा चली थी तो उन्होंने रो-रो करके आँखे सुजा लीं। हुआ यों कि किसी बारात को देखकर जीजा ने काकीसा से पूछा कि हाथी पर यह कौन बैठा है ? उन्होंने बतालाया कि नगर सेठ की लड़की का वार है। यह सुनकर इन्होंने जिद्द की कि मेरा वर बताओ। काकीसा ने इन्हें चुप करने के लिये कह दिया कि तेरा वर गिरधर गोपाल है। बस, उसी समय से इन्होंने भगवान को अपना वर मान लिया है। रात-दिन भजन-पूजन, भोग-राग और नाचने-गाने में लगी रहती हैं। जब ये गाने बैठती हैं तो अपने आप मुख से भजन निकलते जाते हैं। बाबोसा के देहान्त के पश्चात पुनः इनके विवाह की रनिवास में चर्चा होने लगी है। इसलिए अलग-थलग श्यामकुंज में ही अपना अधिक समय बिताती हैं। -जयमल ने अपनी समझ के अनुसार संक्षिप्त जानकारी दी। 

'यदि आज्ञा हो तो ठाकुरजी और राठौड़ों की इस विभूति का मैं भी दर्शन कर लूँ ? -भोजराज ने प्रभावित होकर सर्वथा अनहोनी-सी बात कही। 

न चाहते हुए भी केवल उनका सम्मान रखने के लिये ही जयमल बोले- 'यह क्या फरमाते हैं आप ? पधारो।' 

उन दोनों ने सिंचाई के लिये बनी बहती नाली में हाथ-पैर धोये और मन्दिर में प्रवेश किया। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भोजराज ने सुना- 

नरसी मेहता रे मायरे सगा में राखी बात। 
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर भव में पकड़ो हाथ॥

वह भजन पूरा होते ही मीरा ने दूसरा आरम्भ कर दिया- 

गिरधरलाल प्रीत मति तोड़ो। 
गहरी नदिया नाव पुरानी अधबिच में काँई छोड़ो॥
थें ही म्हाँरा सेठ बोहरा ब्याज मूल काँई जोड़ो। 
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर रस विष काँई घोलो॥ 

एक दृष्टि मूर्ति पर डालकर भोजराज ने उन्हें प्रणाम किया। गायिका पर दृष्टि पड़ी। अश्रुसिक्त मुख और भरे कंठ से हिय की बात संगीत के सहारे वह अपने आराध्य से कह रही थी। पतली उँगली इकतारे को झंकृत कर रही थी और नेत्रों से बहते आँसू वक्षस्थल भिगो रहे थे। उस मुरझाई कुमुदिनी को, जिसने अभी यौवन की देहरी पर पग धरा ही था -अंतर के रूप की शह पाकर स्थूल रूप मानो अपरूप हो उठा था। यह देखकर युवक भोजराज ने अपना आपा खो दिया। भजन पूरा होते ही जयमल ने चलने का संकेत किया। भोजराज को चेत हुआ, तब तक मीरा ने इकतारा एक और रखकर प्रणाम किया और आँखे खोली, मानो सूर्योदय होने पर कमल की पंखुरी खुली हो। जयमल ने कुँवर का हाथ पकड़कर बाहर चलने के लिये पाँव उठाया, तभी मीरा ने तनिक दृष्टि फेरी और पूछा- 'कौन है ?'

जैसे आम की डाली पर बैठी कोयल बोली हो। 'आहा, कितना मीठा स्वर है !' -भोजराज के मन ने कहा। 

'मैं हूँ जीजा !' -भोजराज का हाथ छोड़कर त्वरित गति से मीरा की और बढ़ते हुए स्नेहयुक्त स्वर में जयमल ने कहा। समीप जाकर और घुटनों के बल पर बैठकर अंजलि में बहन का आँसुओं से भीगा मुख लेते हुए आकुल स्वर में पूछा- 'किसने दुख दिया आपको ?' कहते-कहते बहन की पीठ पर हाथ रखा तो उसके रुदन का बाँध टूट गया। भाई की छाती पर माथा टेक मीरा फूट-फूटकर रो पड़ी। आप मुझसे कहिये तो ! जयमल प्राण देकर भी आपको सुखी कर सके तो स्वयं को धन्य मानेगा।' दस वर्ष का बालक जयमल जैसे अभिभावक हो उठा। 

मीरा क्या कहे, कैसे कहे ? उसका यह दुलारा छोटा भाई कैसे जानेगा कि प्रेम-पीर क्या होती है ? वह क्या जाने कि नारी पर एक ही बार तैलवान (विवाह की एक रस्म) चढ़ता है। जगत के व्यवहार और अंतर के भावों से अनजान यह क्या जाने कि यह शीतल दाह कैसे प्राणों को सुखा देता है। यह स्वयं बालक है, अतः मेरी विपत्ति में कैसे सहायता कर पायेगा, पर डूबते हुए को तिनके से भी अवलम्ब की आशा होती है। 

जयमल जब भी श्यामकुंज अथवा रनिवास में जाता और उसकी यह बड़ी बहन सामने पड़ जाती तो अभिवादन करने पर सदा ही हाथ जोड़ मुस्कुराकर कहती -जीवता रीजो जग में, काँटो नी भाँगे थाँका पग में (लम्बी आयु हो तुम्हारी, तुम्हारे पाँव में कभी काँटा भी न गड़े) !' अथवा 'शत शरद देखे वीर मेरा। हों गुल नसीब उनको, रहै पासबाँ अश्क मेरे।'

वह एकदम फड़क उठता- 'वाह, जीजा ! वाह ! कैसी सुन्दर बात कही आपने, भाई हमेशा खुश रहे और बहन रोती रहे। क्या कहने हैं हमारी राजपूती शान के। ऐसी आशीष अब कभी मत दीजियेगा। आपके इस छोटे से भाई में इतना बड़ा आशीर्वाद झेलने का बल नहीं है।'

कभी पूछती- 'क्या सीख रहे हैं आजकल आप ?' कभी योद्धा वेष में देखकर प्रसन्न हो उठती- 'हूँ, बलिहारी म्हाँरा वीर थाँरा ई रूप माथे। उरा पधारो आपके काली टीकी लगा दूँ (मैं आपके इस रूप पर बलिहारी, मेरे भाई ! इधर पधारो आपको काला डिठौना लगा दूँ)।'

सदा हँसकर सामने आने वाली उसकी यह निर्मल ह्रदया बहन आज यों छाती में मुख देकर रो पड़ी तो जयमल तड़प उठा- 'एक बार, अपने इस छोटे भाई को हुकम देकर तो देखिये जीजा ! मैं आपको यों रोते नहीं देख सकता।'

'भाई ! आप मुझे बचा लीजिये, मुझे बचा लीजिये !' -मीरा भरे गले से हिल्कियों के मध्य कहने लगी- 'सभी लोग मुझे मेवाड़ के महाराज कुँवर से ब्याहने को उतावले हो रहे हैं। स्त्री के तो एक ही पति होता है भाई ! अब गिरधर गोपाल को छोड़ ये मुझे दूसरे को सौंपना चाहते हैं। इस पाप से मुझे बचा लीजिये। भगवान आपका भला करेगा। आपकी गिनती तो अभी से वीरों में होने लगी है। तलवार के घाट उतार मुझे आत्महत्या के पाप से भी बचाओ.... ! मुझसे यह दुख अब सहा नहीं जाता....। मैं आपके.... हाथ जोड़ती हूँ.... भाई.... मुझे.... बचा लो.... मेरी.... राखी का.... यही मूल्य.... दो मुझे !'

बहन की बात सुनकर जयमल सन्न रह गये। यह क्या माँगा जीजा ने ? मेरे पौरुष को, मेरी वीरता को, मेरे इस खंग का.... आर्त-रक्षा के स्थान पर भगिनी-हन्ता का पुरस्कार ही क्या सर्वप्रथम प्राप्त होना था ? हाय, मैंने पूछा ही क्यों जीजा से ? अब क्या करूँ ? बहन का दुःख, अपनी असमर्थता और वचन-भंग के कष्ट से जयमल असंयत हो उठे। उनकी आँखों से झरते आँसू मीरा के सिर को भिगोने लगे। असहाय स्वर में बोले- 'जीजा ! मेरी माँ ! यह क्या चाहा आपने अपने इस निकम्मे भाई से ? यह तलवार.... यह हाथ आप पर उठें, इससे पूर्व जयमल के प्राण देह ही न छोड़ देंगे ?'

वे दुःख से अवश हो बहन को बाँहों में भर रोते हुए बोले- 'मेरे वीरत्व को धिक्कार है कि आपके किसी काम न आया। आज ही तो बहन ने मुझसे कुछ माँगा और अकर्मण्य भाई ना कहते तनिक भी न लजाया। मुझे क्षमा कर दीजिए जीजा ! अन्यथा छाती फट जाएगी....। आज मालूम हुआ कि जयमल महाकंगाल है।'

दोनों भाई-बहन भूल गये कि श्यामकुंज के द्वार पर एक पराया व्यक्ति, सम्माननीय अतिथि खड़ा आश्चर्य से उन्हें देख और सुन रहा है। उन्हें ज्ञात ही न हुआ कि कब भोजराज उन दोनों के समीप आकर खड़े हो गये।

'देवी ! -उन्होंने सीधे-सीधे मीरा को ही सम्बोधन किया। उनका स्वर सुनते ही दोनों भाई-बहन चौंककर अलग हो गये। मीरा ने मुँह फेरकर उघड़ा हुआ सिर ढँक लिया। पलक झपकते ही वह समझ गयी कि यह विनय, अधिकार, तनिक दुःख और गरिमायुक्त अनचिन्हा स्वर और किसी का नहीं, मेवाड़ के महाराज कुमार भोजराज का है। थोड़े संकोच के साथ उसने उनकी और पीठ फेर ली। जयमल ने साफे के पल्ले से आँसू पोंछ सिर झुका लिया।

'देवी ! आत्महत्या महापाप है और गुरुजनों की आज्ञा का उल्लंघन भी इससे कम नहीं ! इससे सृष्टि का संचालक अप्रसन्न होता है, ऐसा मैंने सज्जनों के मुख से सुना है। आपने जिस चित्तौड़ के राजकुँवर का नाम लिया, वह अभागा अथवा सौभाग्यशाली जन आपके सामने उपस्थित है। इस भाग्यहीन के कारण ही आप जैसी भक्तिमती कुमारी को इतना परिताप सहना पढ़ रहा है। उचित तो यही है कि मैं ही देह छोड़ दूँ जिससे सारा कष्ट कट जाय, किन्तु क्या इससे आपकी समस्या सुलझ जायगी ? राजपूतों की स्त्रियाँ बाँझ तो नहीं हैं। मैं नहीं तो मेरा भाई दूसरा, वीरों की क्या कमी ? हम लोगों का अपने गुरुजनों पर बस भी नहीं चलता ! वे भी क्या करें ? कभी किसी ने सुना कि बेटी बाप के घर कुँवारी बैठी रह गयी हो ? पीढ़ियों से जो होता आया है, उसी के लिये तो सब प्रयत्नशील हैं। कहाँ किसी के घर में आप जैसी कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं कि कोई अन्य मार्ग उनके लिये निर्धारित हुआ ? इस उलझन का मुझे तो एक ही हल समझ में आया है। माता-पिता और परिवार के लोग जो करें, सो करने दीजिये और अपना विवाह ठाकुरजी के साथ कर लीजिये। यदि ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया तो.... तो मैं वचन देता हूँ कि केवल दुनियाँ की दृष्टि में बींद बनूँगा, आपके लिये नहीं। जीवन में कभी भी आपकी इच्छा के विपरीत आपकी देह को हाथ नहीं लगाऊँगा। 'आराध्य मूर्ति की भाँती.... 'भोजराज का गला भर आया। एक क्षण रुककर वे बोले- आराध्य मूर्ति की भांति आपकी सेवा ही मेरा कर्तव्य रहेगा। आपके पति गिरधर गोपाल मेरे स्वामी और आप.... आप.... मेरी स्वामिनी।'

भोजराज साफे के पल्ले से आँसू पोंछते हुए पलट करके मन्दिर की सीढियाँ उतर गये। शराबी.... नहीं-नहीं, सर्वस्व हारे हुए जुआरी की भाँति डगमग चाल से वे बाहर आये। अँधेरे में जैसे पथ खोजते हों, ऐसे पाँव घसीटते वे पानी की नाली पर आकर बैठे। दोनों हाथों से अंजली भर-भर करके मुँह पर पानी छीटने लगे, किन्तु आँसुओं के झरने जो खुले, सो खुले ही रहे; किसी प्रकार ओट लगने में ही न आती थी। विवेक समझा रहा था कि जयमल आते होंगे, उन्हें इन आँसुओं की क्या कैफियत दी जा सकेगी ? किन्तु कौन सुने ? मन ने तो जैसे नेत्रों की राह बाह जाने की सौगन्ध खा ली हो। तभी पीछे से पदचाप सुनायी दी। देह की सारी शक्ति लगाकर वे उठ खड़े हुए और आगे चल पड़े।

जयमल शीघ्रतापूर्वक चलकर समीप आये। उन्होंने देखा-आते समय भोजराज प्रसन्न थे, परन्तु अब तो मुख से उदासी झर रही है। जयमल ने मन-ही-मन सोचा- 'जीजा के दुःख से संभवतः दुःखी हुए हैं, तभी तो ऐसा वचन दिया। कुछ भी हो, इनसे विवाह कर जीजा सुखी ही होंगी।'

और भोजराज ? वे सोच रहे थे कि कोई एकान्त स्थान मिले तो अन्तर्दाह बाहर निकले। जयमल को उन्होंने बीच से ही विदा कर दिया।

मीरा चरित्र से प्रेरित

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