Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 15



भोजराज की अन्तर्वेदना और अन्तर्द्वन्द

डेरे पर आकर वे कटे वृक्ष की भाँती पलंग पर जा गिरे। पर वहाँ भी चैन ना मिला, लगा पलंग पर अंगारे बिछे हों। वे धरती पर जा पड़े। कमर में बँधी कटार चुभी। खींचकर दूर फेंकने लगे कि कुछ सोचकर ठहर गये-उठ बैठे। कटार को म्यान से निकाला, एक बार अँगूठा फेरकर धार देखी और दाहिना हाथ ऊपर उठाकर उसे छाती पर तान लिया....। एक क्षण.... जैसे बिजली चमकी हो, अंतर में मीरा आ खड़ी हुई। उदास मुख, कमल- पत्र पर ठहरे ओस-कण से आँसू गालों पर चमक रहे हैं। जलहीन मत्स्या-सी आकुल-व्याकुल दृष्टि मानो कह रही हो- 'मेरा क्या होगा ?' उन्होंने तड़पकर कटार फेंक दी। मरते पशु-सा धीमा आर्तनाद उनके गले से निकला और वे पुनः भूमि पर लौटने लगे।

मेदपाट का स्वामी, हिन्दुआ सूर्य का जेष्ठ कुमार और लाखों वीरों का अग्रणी, जिसका नाम सुनकर ही दुष्टों के प्राण सूख जाते हैं और दीन-दुःखी श्रद्धा से जय-जय कर उठते हैं। रनिवास में प्रवेश करते ही दासियाँ राई-लूण उतारने लगती हैं और दुलार करती माताओं की आँखों में सौ-सौ सपने तैर उठते हैं। जिसे देखकर एकलिंगनाथ के दीवान की छाती गौरव से फूलकर दुगुनी हो जाती है, और उमराव अपने भावी नायक को देखकर संतोष की साँस लेते हैं। वहीं.... वहीं.... वहीं नरसिंह आज घायल शूर की भाँति धरा पर पड़ा तड़फ रहा है। आशा-अभिलाषा और यौवन की अर्थी उठ गयी। उनका धीर-वीर हृदय प्रेम पीड़ा से कराह उठा। एकलिंगनाथ के लाडले का कलेजा, जो सहस्त्रों बैरियों को देखकर उत्साह से उछल पड़ता था, आज पानी हो नेत्रों की राह बह गया। चित्तौड़ का युवराज आज दिन-हीन हो धूल में लौट रहा है। जिसके पसीने के स्थान पर हजारों वीर रक्त बहाने को तैयार रहते हैं, जिसकी एक हाँक पर वन-व्याघ्र तक हम उठते हैं, उसकी आँखों में अंधेरा छा गया, महँगे राजसी वस्त्र और केश धूलि-धूसरित हो गये। इस दुःख में भाग बाँटने वाला, धीरज देने वाला उन्हें कोई दिखायी नहीं दिया। तब.... तब.... कहाँ जाकर ठंडे हों ? यह धीमा दाह.... कैसे.... शांत हो ? पर शांत हो कैसे ? यही तो वे नहीं चाहते। यह व्याकुलता, पीड़ा चरम सीमा तक बढ़े, पर प्राण न जायँ....!

'थे ही म्हाँरा सेठ बोहरा ब्याज मूल काँई जोड़ो। गिरधर लाल प्रीत मति तोड़ो।'

भोजराज के बहरे कान सुन रहे हैं-

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रास में विष काँई घोलो।

'बावजी हुकम ! बावजी हुकम !' बाहर से पुरुष कंठ का स्वर आया।

वे चौंककर उठ बैठे- 'आह भोज ! तेरे भाग्य में एकान्त का सुख ही कहाँ लिखा है ? उठ; उठ जा।'

'खट..., खट..., खट...।' द्वार पर फिर खटका हुआ और भोजराज का गम्भीर कंठ पुकार उठा- 'कौन है ?'

'यह तो मैं हूँ हुकम ! पूरणमल।'

'क्या है ?' जैसे घन गरज उठे हों। आखेट पर पधारने के सभी प्रबन्ध हो गये। मैं शस्त्र धारण कराने हाजिर हुआ हूँ।'- पूरणमल ने विनम्रता से उत्तर दिया।

मन में आया, कह दूँ कि सिर में दर्द है, किन्तु नहीं। अभी भुवासा फूफोसा और सब लोग इकट्ठे हो जायेंगे। खुशी पूछने का जो सिलसिला आरम्भ हुआ तो दो-तीन दिन तक समाप्त ही नहीं होगा। निश्वास छोड़कर बोले- 'थोड़ा ठहर ! अभी खोलता हूँ।'

उन्होंने खड़े होकर वस्त्र झड़काये। मुँह धोया, पानी पिया, गीले हाथ केशों पर फेरकर साफा बाँधा, कटार उठाकर कमरबंध में लगायी और आरसी में मुँह देखा। आश्चर्य और दुःख से उनका मुँह खुल गया। अपना ही चेहरा अनजाना लगा उन्हें। आँखें सूज गयी हैं, होंठ सूखे और मुँह उतरा हुआ। उन्होंने होठों पर जीभ फेरकर मुस्कुराने का प्रयत्न किया, किन्तु मुस्कान के बदले होठों पर एक करुण रेखा खिंचकर रह गयी।

वे हारकर पलंग पर बैठ गये- 'क्यों आ गया मैं यहाँ ? बाई हुकम (माँ) ने तो ना फरमाया था; मैंने ही जिद्द की। हाय, कैसा दुर्भाग्य है इस अभागे मन का ? कहाँ जा लगा यह, जहाँ इसकी रत्ती भर परवाह नहीं, चाह नहीं। पाँव तले रुँदने का भाग्य लिखाकर आया बदनसीब। 'मीरा !' कितना मीठा नाम है यह, जैसे अमृत से बना हो- सींचा गया हो। अच्छा इस नाम का अर्थ क्या है भला ? नहीं जानता न तू ? पर पूछूँ किस्से ? पूरणमल जानता होगा ? हिस्स ! किसी से नहीं पूछा जा सकता। अब तो.... अब तो.... उन्हीं से पूछना होगा। चित्तौड़ आने पर....।'

उनके होठों पर मुस्कान, हृदय में बिजली तरंग थिरक गयी। वे मीरा से मानो प्रत्यक्ष बात करने लगे- 'मुझे केवल तुम्हारे दर्शन का अधिकार चाहिये.... तुम प्रसन्न रहो.... तुम्हारी सेवा का सुख पाकर यह भोज निहाल हो जाय ! मुझे और कुछ नहीं चाहिये.... कुछ नहीं।'

'बावजी हुकम !'

भोजराज जैसे स्वप्न से जगे- एकलिंगनाथ ! मेरी लज्जा रखना प्रभु !' मन में कहते हुए उन्होंने उठकर द्वार खोल दिया।

'शीघ्रता कीजिये बावजी हुकम ! फुफोसा हुकम और भाणेज बना भी पधार गये हैं।'- पूरणमल जल्दी-जल्दी हथियार बाँधते हुए बोला- 'ये वस्त्र तो मैले हो गये हैं। दूसरे धारण करा दूँ ? ऐसी धूल कहाँ लगी ?'

'कहाँ लगी और कहाँ न लगी, सो सभी कैफियत अभी देनी होगी ? समय तो शस्त्र बाँधने का भी नहीं है और तू वस्त्र बदलने की बात कर रहा है।'

'बाहर सब लोग हैं इसी से....।'

'सो क्या तेरी सगाई करनी है कि लोग सोचेंगे मालिक इतना गंदा है तो सेवक कैसा होगा और सगाई टूट जायगी ? यह बात हो तो वस्त्र बदल लूँ।- भोजराज ने हँसकर कहा। पूछा- 'घोड़ी तैयार है ?'

'हुकम ! तैयार है।'- पूरणमल ने लजाते हुए कहा।

'अब भुवासा पधारें तो शीघ्र विदा कराकर घर चले चलें। मुझे तो घर की, चित्तौड़ की याद आती है।'

सुना है....।' -पूरणमल कहते-कहते ठहर गया। मन में सोचा कि कौन जाने बावजी हुकम को बात अच्छी न लगे, सुनकर कहीं अप्रसन्न न हों।

'क्या सुना है ?' भोजराज ने पूछा।

'सरकार नाराज तो नहीं होंगे ?'

'क्यों, नाराज होने जैसी बात है ? यदि ऐसा है तो कहने को उतावला ही क्यों हुआ ?'

'बात तो पुरस्कार पाने जैसी है, पर बड़े लोगों के मन की कैसे जान सकते हैं।'

'पुरस्कार भले न मिले, पर दृष्टता का दण्ड भी न मिलेगा। अब आफरा झाड़ले अपना। कह दे !' -भोजराज ने हँसकर कहा।

'सुना है अपने साथ यहाँ के पुरोहितजी महाराज भी चलेंगे।'

'क्यों ?'

रावले छोटे भाई रतनसिंहजी की पुत्री के सम्बन्ध का प्रस्ताव लेकर वे श्रीजी के सम्मुख उपस्थित होंगे। सुना यह भी है कि बाईसा सुन्दर, गुणवती, कवि और भक्त हैं। किसी योगी से उन्होंने योग और संगीत की शिक्षा भी पायी है। स्वभाव तो ऐसा है, मानो गंगा का नीर हो।' -पूरणमल ने प्रसन्न स्वर में कहा।

'तुझे कैसे ज्ञात हुई इतनी सारी बातें ?' -पूरणमल की बातें भोजराज के हृदय की प्यासी धरती पर प्रथम मेघ-सी बरसीं, जिसकी एक-एक बूँद आतुरतापूर्वक उन्होंने सोख ली।

'कुछ तो सरदारों की बातों से ज्ञात हुई, कुछ मैंने स्वयं ही इधर-उधर सेवकों-बालकों से जानकारी ली।'

'क्या आवश्यकता पड़ी थी तुझे ?' -भोजराज ने देह कंप से लड़ते हुए पूछा।

'सरकार ! वे कल हमारी स्वामिनी होंगी। बालकों को, सेवकों को उत्सुकता रहती ही है। यदि यह सब सच है और मेवाड़ को ऐसी महारानी मिल जाय तो सोने को सुगन्ध प्राप्त हो और भाग्य खुल जाय हमारा।'

'तुझे कुछ बोलने की अकल भी है ? क्या कह गया तू ? पता नहीं, किसको महारानी बनाने के सपने देख रहा है। दाजीराज (पिताजी) को पूछा भी है ? वे इस आयु में विवाह करना चाहते भी हैं ? कोई राजनैतिक कारण भी दिखायी नहीं देता। मेड़ता तो पहले ही अच्छे सम्बन्ध हैं, फिर ?' भोजराज ने अनजान बनते हुए कहा।

'अरे सरकार ! यह श्रीजी के विवाह की बात नहीं है।' -पूरणमल को अपनी भूल ज्ञात हुई। वह सुधारते हुए बोला- 'यह तो राज के सम्बन्ध की बात है।'

हृदय और देह की पुलक को छिपाते हुए भोजराज ने कृत्रिम क्रोध दिखाया-
'क्यों रे अकल के दुश्मन ! पता नहीं, तू कौन-सी बाईसा को मुझ से जोड़कर कब से महारानी-महारानी करके मुझे दाजीराज के सामने ही सिंहासन पर बिठाना चाहता है या उनके कैलाशवास की सूचना भी तुझे किसी ज्योतिषी ने दी है ?'

एकदम चौंकाने से पूरणमल के हाथ रुक गये। वह घबराकर बोल उठा- 'क्षमा, क्षमा सरकार ! मेरे मन में ऐसी दुर्भावना नहीं थी ।जाने कैसे जीभ फिसल गयी।'

'ठीक है, अब जीभ को, बुद्धि की डोरी से बाँधकर रखा कर ! समझा ? तेरे मुख से निकली बात मेरे मन की बात समझी जाती है। यह बात समझ ले पूरणमल, कि चित्तौड़ का राज्य एकलिंगनाथ का है। इसके दीवान जिस सिंहासन पर बैठते हैं, त्याग और बलिदान उसकी सीढ़ियाँ हैं। मुझ जैसे सैकड़ों भोज और तुझ जैसे हजारों पूरणमल उसकी मर्यादा पर न्योछावर की जा सकते हैं। कभी यह न समझ लेना कि मुझे उस सिंहासन का लोभ है।'

उसी क्षण पूरणमल पर मानो सैकड़ों घड़े पानी पड़ गया, वह सहमकर बोल उठा- 'हुकम सरकार !'

'अब तो एकाध दिन में विदा लेकर चित्तौड़ चले चलें ?' -भोजराज ने कवच कड़ियाँ ढीली करने का संकेत करते हुए कहा।

कड़ियाँ ढीली करके तरकस के फीते बाँधते हुए पूरणमल ने सोचा- 'कैसा पत्थर मन का है यह युवराज ! न इसे राज्य का लोभ है न सगाई की बात में रुचि। एक मुस्कान भी तो नहीं आयी होठों पर, न ही कुछ पूछा उन बाईसा के विषय में। साधारण युवक तो प्रसन्नता सँभाल ही नहीं पाते। पर ये क्या साधारण व्यक्ति हैं ? चार वर्ष से इनकी सेवा में हूँ। कभी व्यर्थ बात और व्यर्थ चेष्टा नहीं देखी। साथियों से विनोद भी करते हैं तो ऐसा कि अन्य को शिक्षा मिले। अन्याय के प्रति जितने असहनशील हैं, गुरुजनों के प्रति, धर्म और न्याय के प्रति उतने ही सहनशील हैं। राजसिंहासन पर बैठने वाले के हृदय को भगवान पत्थर का बनाकर धरती पर भेजता है, तभी राज्य चलते हैं। सच भी है, पत्थर के भगवान ही तो पूजे जाते हैं।'

दूसरे दिन सचमुच ही भोजराज ने वीरमदेवजी से विदा माँगी। यह सुनकर और भतीजे का मलिन मुख देख गिरजाजी ने हँसकर पूछा- 'क्यों बावजी ! रणाँगण में भी आपको घर याद रहता है ?'

आप रण की बात फरमाती हैं भुवासा ! चित्तौड़ तो मुझे कैलाश में भी याद आयगा।' -भोजराज ने उत्साह से कहा।

'और बाई हुकम (माँ) ? विवाह के बाद भी बाई हुकम इतनी ही याद रहेंगी ?'

भुवा के सम्मान में उन्होंने मस्तक झुका लिया, पर विवाह की बात सुनते ही एक अश्रुसिक्त मुख अन्तर में उदभासित हो उठा।

यद्यपि वीरमदेवजी की सभी पत्नियों को भोजराज अपने सगे भतीजे से प्रिय लगते, वे सभी उनका दुलार करते न थकतीं, भोज भी उन सभी का समान सम्मान करते, पर अब यहाँ मेड़ता में मन नहीं लगता।

उनका मन तो अब चित्तौड़ में भी नहीं लगता। न जाने क्यों, एकान्त अधिक प्रिय लगने लगा। एकान्त होते ही उनका मन श्यामकुंज के भीतर घूमने लगता। रोकते-रोकते भी वह बड़ी-बड़ी झुकी-झुकी आँखों, पाटल वर्ण से छोटे-छोटे अक्षरों, स्वर्ण गौर वर्ण, सुचिक्कण कपोलों पर ठहरी अश्रु बूँदों, सुघर नासिका, उसमें लगी हीरक कील, कानों में लटकती झूमर, वह आकुल-व्याकुल दृष्टि, उस मधुर कंठ-स्वर के चिन्तन में खो जाता। वे सोचते- 'एक बार भी तो उसने आँख उठाकर नहीं देखा मेरी ओर। क्यों देखें ? क्या पड़ी है उसे ? उसका मन तो अपने आराध्य में लगा है। यह तो तू ही है, जो खो आया है अथवा पुष्प की भाँति चढ़ा आया है अपना हृदयधन, जहाँ स्वीकृति के कोई आसार नहीं, कोई आशा नहीं।'

लोगों ने भोजराज का बदला हुआ स्वभाव देखा तो सोचा- 'अब महाराज कुमार का बचपन गया। उसकी ठौर यौवन की धीरता ने ले ली है। सम्भवतः विवाह सम्बन्ध की बातों से लाज के कारण एकान्त में रहने लगे हैं।'


मीरा चरित्र से प्रेरित



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