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Meera- Ek Prem Katha | मीरा - एक प्रेम कथा Part 16

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मीरा की 'दिखरावनी' 
मेड़ता से गये पुरोहितजी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित और उनकी पत्नी मीरा को देखने के लिये आये। राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है। चारों और एक चैतन्यता, सजगता दृष्टिगोचर हो रहे है। मीरा को जैसे वह सब दिखकर भी दिखायीं नहीं दे रहा है। उसे न कोई रुचि है और आकर्षण। दूसरे दिन प्रातः झालीजी वस्त्रभूषण लेकर दासी के साथ मीरा के पास आयीं। मीरा गा रही थी-
पिया मोहि आरत तेरी हो।
आरत तेरे नाम की मोहिं साँझ सबेरी हो॥
या तन को दिवला करूँ मनसा की बाती हो।
तेल जलाऊँ प्रेम को बालूँ दिन राती हो॥
पटियाँ पाडूँ गुरु ज्ञान की बुद्धि माँग सवारूँ हो।
पिया तेरे कारणे धन जोबन गालूँ हो॥
सेजाँ नाना रंगरा फूल बिछाया हो।
रैण गयी तारा गिणत प्रभु अजहूँ न आया हो॥
आया सावण भादवा वर्षा ऋतु छायी हो।
स्याम पधारया मैं सूती सैन जगायी हो॥
तुम हो पुरे साँइयाँ पुरो सुख दीजे हो।
मीरा व्याकुल बिरहिणी अपणी कर लीजे हो॥
माँ को प्रणाम कर वह उनके समीप ही बैठ गयी। 
'ये भूषण-वस्त्र पहन ले बेटी ! चित्तौड़ से पुरोहितानीजी तुझे देखने आयी हैं। वे अभी कुछ समय पश्चात यहाँ आ जायँगी। बड़ी भाग्यशाली है मेरी बेटी ! इतने…